जनता है मालिक, लोकतंत्र की जीत
भाजपा हुई बेगानी, आप से कर ली मीत
एक्जिट पोल के बाद से ही अंदाज लग गया था कि दिल्ली में आने वाले पांच साल.... सी एम होंगे केजरीवाल...। लेकिन एक्जिट पोल को नकारा जाता रहा...। भाजपा की पूरी फौज को.... अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों की छोटी सी टोली के सामने जबरदस्त पराजय का मुँह देखना पड़ा। चुनाव के परिणाम और रुझान गवाही दे रहे हैं केजरीवाल की हैट्रिक की...। भाजपा ने केजरीवाल को रोकने के लिए पी एम सहित केंद्रीय मंत्री मंडल के मंत्रीगण दिल्ली में रैलियां करते रहे। कई राज्यों के मुख्यमंत्री और नेता नुक्कड़ सभाएं लेते रहे...। दो सौ से ज्यादा सांसद गली गली में भाजपा के पक्ष में प्रचार करते रहे...। दुनियाँ के सबसे बड़े राजनैतिक दल का दावा करने वाले दल के लाख कार्यकर्ता घर घर मोदी... की अलख जगाते रहे...। और तो और संघ के स्वयं सेवक भी भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने निकले...। इन सबके अलावा संसाधनों से भी संपन्न भाजपा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी कि, केजरीवाल को पटखनी दे दी जाए...। इसके लिए उसके सांसद और नेताओं ने भी तरह तरह के सुर अलाप कर महफ़िल जमाने में पूरा दम लगा दिया। भारत - पाकिस्तान का मैच तक करार दिया। लेकिन होनी तो होकर रहती है.... वक्त का साथ भाजपा के साथ नहीं था। केजरीवाल के जन हित मुद्दों वाले घोषणा पत्र से जनता प्रभावित हुई और वंदे मातरम तथा इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाने का मौका केजरीवाल के हिस्से में आ गया।
चुनाव परिणाम से लगता था कि बिगड़े बोलों पर लगाम कस जाएगी.... परंतु ऐसा हुआ नहीं... भाजपा समर्थकों ने दिल्ली की जनता को मुफ्त खोर कह दिया... उनके ही समर्थक चैनल ने इसे ....."मुफ्त में मारी गई बीजेपी"..... करार दे दिया। और भी जितना बोला गया.... उसका जिक्र करने में भी हाथ काँप जाते हैं...। मुफ्त के मुद्दे के बारे में उन्हें कौन समझाए कि... किसानों को छः हजार देने या ढाई लाख रुपये पी एम आवास के लिए देना..... क्या मुफ्तखोरी से इतर है..। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि यही असल लोकतंत्र है। जहाँ आशंकाओं के बीच भी जनमत वो आता है जिसकी जरूरत होती है। यही खुशी की बात है... खुशी को लेकर सोशल मीडिया में यह बहुत ट्रोल हो रहा है कि आप इसलिए खुश है कि फिर से दिल्ली जीती... कांग्रेस इसलिए खुश है कि भाजपा हार रही है.... भाजपा इसलिए खुश है कि कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला.... और दिल्ली के साथ साथ देश इसलिए खुश है कि नागरिकों को आपस में बाँटने वाली राजनीति हार गई...। इसका संदेश दूर तक सुनाई देगा, जब भाजपा और कांग्रेस दोनों चिंतन मंथन करेंगे कि जनता वाकई में विकास चाहती है। सबका साथ... सबका विकास.. सबका विश्वास.... हकीकत में चाह है जनता की...।
और अंत में.........
ना बोलने का हुक्म था
ना सुनने की थी हिम्मत,
खामोशियों की कैद में
बसरता चला गया लोकतंत्र... ।
भाजपा हुई बेगानी, आप से कर ली मीत
शैलेश तिवारी
दिल्ली... जो दिल वालों की है,..... जो भ्रम को तोड़ने वाली है.... जिसकी धड़कनों में बसा है लोकतन्त्र.....। दिल्ली.... जहाँ भारत के हर प्रांत का वासी बसा है....। मिनी भारत भी कहा जा सकता है दिल्ली को...। विधान सभा चुनावों के नतीजे आ रहे हैं और साफ होती जा रही तस्वीर आने वाली सरकार की.... साफ हो गया भाजपा का दावा भी... साफ हो गया कि दिल्ली के दिल में जन हित के मुद्दे धड़कते हैं...। कांटे की मानी जाने वाली टक्कर किस तरह एक तरफा जीत में बदल गई कि आशंकाओं के बादल तितर बितर हो गए।एक्जिट पोल के बाद से ही अंदाज लग गया था कि दिल्ली में आने वाले पांच साल.... सी एम होंगे केजरीवाल...। लेकिन एक्जिट पोल को नकारा जाता रहा...। भाजपा की पूरी फौज को.... अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों की छोटी सी टोली के सामने जबरदस्त पराजय का मुँह देखना पड़ा। चुनाव के परिणाम और रुझान गवाही दे रहे हैं केजरीवाल की हैट्रिक की...। भाजपा ने केजरीवाल को रोकने के लिए पी एम सहित केंद्रीय मंत्री मंडल के मंत्रीगण दिल्ली में रैलियां करते रहे। कई राज्यों के मुख्यमंत्री और नेता नुक्कड़ सभाएं लेते रहे...। दो सौ से ज्यादा सांसद गली गली में भाजपा के पक्ष में प्रचार करते रहे...। दुनियाँ के सबसे बड़े राजनैतिक दल का दावा करने वाले दल के लाख कार्यकर्ता घर घर मोदी... की अलख जगाते रहे...। और तो और संघ के स्वयं सेवक भी भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने निकले...। इन सबके अलावा संसाधनों से भी संपन्न भाजपा ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी कि, केजरीवाल को पटखनी दे दी जाए...। इसके लिए उसके सांसद और नेताओं ने भी तरह तरह के सुर अलाप कर महफ़िल जमाने में पूरा दम लगा दिया। भारत - पाकिस्तान का मैच तक करार दिया। लेकिन होनी तो होकर रहती है.... वक्त का साथ भाजपा के साथ नहीं था। केजरीवाल के जन हित मुद्दों वाले घोषणा पत्र से जनता प्रभावित हुई और वंदे मातरम तथा इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाने का मौका केजरीवाल के हिस्से में आ गया।
चुनाव परिणाम से लगता था कि बिगड़े बोलों पर लगाम कस जाएगी.... परंतु ऐसा हुआ नहीं... भाजपा समर्थकों ने दिल्ली की जनता को मुफ्त खोर कह दिया... उनके ही समर्थक चैनल ने इसे ....."मुफ्त में मारी गई बीजेपी"..... करार दे दिया। और भी जितना बोला गया.... उसका जिक्र करने में भी हाथ काँप जाते हैं...। मुफ्त के मुद्दे के बारे में उन्हें कौन समझाए कि... किसानों को छः हजार देने या ढाई लाख रुपये पी एम आवास के लिए देना..... क्या मुफ्तखोरी से इतर है..। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि यही असल लोकतंत्र है। जहाँ आशंकाओं के बीच भी जनमत वो आता है जिसकी जरूरत होती है। यही खुशी की बात है... खुशी को लेकर सोशल मीडिया में यह बहुत ट्रोल हो रहा है कि आप इसलिए खुश है कि फिर से दिल्ली जीती... कांग्रेस इसलिए खुश है कि भाजपा हार रही है.... भाजपा इसलिए खुश है कि कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला.... और दिल्ली के साथ साथ देश इसलिए खुश है कि नागरिकों को आपस में बाँटने वाली राजनीति हार गई...। इसका संदेश दूर तक सुनाई देगा, जब भाजपा और कांग्रेस दोनों चिंतन मंथन करेंगे कि जनता वाकई में विकास चाहती है। सबका साथ... सबका विकास.. सबका विश्वास.... हकीकत में चाह है जनता की...।
और अंत में.........
ना बोलने का हुक्म था
ना सुनने की थी हिम्मत,
खामोशियों की कैद में
बसरता चला गया लोकतंत्र... ।


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