लेखिका
वो दूसरा पत्र
वो शाम सच में कुछ अजीब थी।मन भी तो उस शाम की खामोशी में खोया ,यादों के गलियारों में भटक रहा था।जाने इस गीत से क्या लगाव था या उसके मन में समाया था कि दिन में पचास बार भी सुन लेती ,दिल नहीं भरता था।लब भी अनायास ही गुनगुनाने लगते "वो शाम कुछ अजीब थी ,ये शाम भी अजीब है ,वो कल भी आस पास थी ,वो आज भी करीब है"।
फ़र्क मात्र यही था कि वो पात्र उसकी शामों को उदास करती नहीं करता था।वो आज भी करीब था ,कल भी करीब था।मनु ..!!उसका निक नेम नहीं था बल्कि उसका खुद का रखा हुआ था।वो अक़्सर कहता था ...मनोहर नहीं ..मनु कहा करो।और श्यामल अक्सर ताना कसती।
"जो नाम है ,वही सही है।किस हक़ से मनु कहूँ और क्यों कहूँ ?"
"यार कमाल है ,तुम भी अजीब हो।दोस्ती यारी में हक़ ,अधिकार सब तो होता है।मैं भी तुम्हें अपनी ओर से नाम देना चाहता हूँ जो केवल मेरा हो बस।लेकिन तुम्हारे नाम में भी न एक कशिश है ,एक पूर्णता है जिसका तोड़मरोड़ नहीं कर सकता ।नाम का प्रभुत्व ही खत्म हो जाएगा न !"मनोहर एक प्यारी सी दलील देकर उसे एक टक देखने लगता।
"तो फिर व्यर्थ की ज़िद क्यों मनु?"
"तुम मुझे कुछ अधिकार दो न दो ,मैं खुद ही लेना चाहता हूँ।बाकी तुम्हारी मर्ज़ी।"
"देखो ,ये ठंडी आह के साथ या बेमन होकर जो तुम तुम्हारी मर्ज़ी पर अपनी बात कह कर छोड़ देते हो न ,वहाँ तो अपनेपन का अधिकार यूँ भी दम तोड़ने लगता है मनु।तुम चाहते हो तो रख लो ,लेकिन ध्यान से।कहीं किसी के सामने मत पुकार लेना।"श्यामल हिदायतों के साथ उसे मंजूरी देती लेकिन श्यामल नाम को बदलने की उसकी हिम्मत या इच्छा जवाब दे देती। श्यामु या श्यामा उसे पसन्द नहीं था ।तो वो श्यामल ही रही हर पल ,हमेशा ।
"श्यामल ,कभी जो तुम्हारी ज़िन्दगी में न रहा तो तुम मुझे जल्दी बिसरा दोगी !"
"हट ..पागल हो क्या ?ऐसी बातें क्यूँ करते हो ?"
"अरे बस यूँ ही कह दिया न ! गलत भी क्या है ?"
"अब तुमसे कौन बहस करे ?"
"मत करो ,यह बताओ कि तुम्हारे वे गीत जो तुम लिख रही थी ,उनका क्या हुआ ?"
"क्या लिखना यार !फ़िलहाल तो मन मसोस कर बैठे हैं और एक दिन यूँ ही दम भी तोड़ जायेंगे।"
"क्यों दम तोड़ेंगे भला ? मैं हूँ न ..उन्हें ज़िन्दगी देने के लिए।"
"बड़ी बड़ी बातें मत किया करो।एक औरत जो विवाहित है ,दो बच्चों की माँ है उसकी जिंदगी में इन सब बातों का कोई स्थान नहीं।तुम मेरे पापा के दोस्त के बेटे या सहपाठी न होते तो तुम भी न होते मेरी ज़िंदगी में मिस्टर मनोहर !"
"यार ,तुम ज़िन्दगी में शामिल रखो न रखो ये बड़ा सा नाम मत लिया करो।सच्ची पल भर मेंआसमान से ज़मीन पर गिरा देती हो ,मिस्टर मनोहर कहकर।"सिगरेट का एक बड़ा सा कश खींचते हुए मनु उलाहना देता।
"तुम्हीं बताओ फिर क्या करूँ ? ख़ैर ,घर में सब कैसे हैं ?"
"बीवी बच्चे परफ़ेक्ट और व्यस्त और अपुन हो चुके अस्त।"
"फिर वही ..आज तुम्हारी जॉब छूट गई तो कल कोई और मिल जाएगी।चिंता मत करो।"
"हाँ ,माँ भी यही दोहराती हैं और तुम्हें याद फ़रमाती हैं ।"
मनु का अंदाज़ कई बार शायराना हो जाता बात करते हुए।माँ का नाम लेते हुए अक्सर उसकी आँखों में एक चमक आ जाती ।वही चमक लिए वो श्यामल की तरफ देखता।
"क्या कहा माँ ने इस बार ?"श्यामल सब समझते झिझकते एक प्रश्न रखती जिसका उत्तर एक होता था।
"क्या कहेंगी ..! तुम्हें याद करती हैं बस।हाल चाल पूछती हैं और ..इस बार तो कुछ नया ही शगुफ़ा छेड़ दिया माँ ने तुम्हें लेकर।"
"अ.. अच्छा ..!वो क्या ?"
"कहती है कि तुम श्यामल को लेकर आओ घर पर कभी।"
"नामुमकिन है..शब्द गले में ही अटक गया।हर बार इसी शब्द ने ही तो उसे कर्तव्यों और परिवार की बेड़ियों में बांधे रखा।बात बदलने हेतु कहा
"मनु ,कॉफ़ी पियोगे ?"
"हाँ ,कॉफ़ी ही पिला दो।ज़िंदगी मे यही तो रह गया है।"
"एक हारे हुए जुआरी या प्रेमी की तरह बातें मत किया करो।अपनी सीमा तुम भी जानते हो और मैं भी।पता नहीं कौन सी आस लिए मुझे भी अजीब सी कशमकश में डाल देते हो मानो मैंने तुम्हारा दिल तोड़ दिया हो।"
कॉफ़ी से उठती भाप का सहारा लिए श्यामलअपने ज़ज़्बातों की भाप को यूँ उड़ा देती कि केवल एक अनाम रिश्ते की सतह वाला कॉफ़ी का मग रह जाता दोनों के दरम्यां जो अगली कॉफ़ी से पहले धुल कर उसके मन की तरह रिक्त सा एक तरफ पड़ा रहता।उम्मीद की एक कॉफ़ी फिर बनती और फिर वही धुलना।यही नियति उसकी भी थी।मनु के मन की थाह तक पहुंचना आसान तो था लेकिन उसे पाना मुमकिन और मुनासिब नहीं था।
"यार ,जो बात माँ समझ सकती हैं ,वो तुम क्यों नहीं ? ग़लत होता तो माँ हर बार क्यों पूछतीं ?"
"तुम न आँटी की बात का अलग ही मतलब निकालने लगे हो मनु। जानती हूँ कि हम दोस्ती के बंधन में बंधे हैं इसलिए वो इज़्ज़त देती हैं इस रिश्ते को।वरना कौन मां अपने बेटे की बनी बनाई गृहस्थी में आग लगाना चाहेंगी ? इधर समीर को भी मालूम है ,एक विश्वास है हमारी दोस्ती पर।मुझे कभी किसी बात की सफ़ाई नहीं देनी पड़ी तुम्हें लेकर।यही क्या कम है ?"
"यार मैंने कब कहा कि मैं तुम्हारा प्रेमी हूँ ।मुझे केवल दोस्त बने रहना भी मंज़ूर है बशर्ते मुझे एक हक मिले बस।"
"कौन सा हक ?"
"समय आने दो बताऊँगा एक दिन।बस वादा करो कि तुम इंकार नहीं करोगी।"
"बिना जाने कैसे वादा करूँ ? "
"भरोसा नहीं तो रहने दो..!"कॉफ़ी का खाली मग मेज़ पर इस तरह रखा मनु ने कि उसकी नाराज़गी का शोर दिखलाई दे नाकि उसके काँच का होने का।मनु कभी सब समझती तो कभी अनजान बन जाती।उसे लगता मनु के सामने अनजान बने रहना ही सही है चाहे वो उसे इसकी बेवकूफ़ी करार दे या भोलापन।
"अच्छा ,छोड़ो यार ! मुझे यह बताओ कि तुम अपने कितने गीत लिख चुकी हो ?मेरी एक पहचान का बन्दा है ,मुम्बई में ।गीतों की एक फाइल बना कर दो।मैं बात करता हूँ ।"
"अरे यार मनु , मेरी तुकबन्दी को गीत का नाम न दो।मैं टाइम पास के लिए लिखती हूँ ।तुम भी न ..!''
"क्या तुम भी ..अपने ही हुनर की कद्र नहीं करोगी तो और कौन करेगा।मुझे नहीं लगता कि समीर तुम्हें कुछ करने से रोकेंगे ।"
"नहीं जानती ..लेकिन तुम बस रहने दो।मेरी अमानत मेरे पास ही ठीक हैं ।उन्हें हवा मत दो ,अलमारी में ही रहने दो।"एक हँसी में उड़ा दिया श्यामल ने मनु की बात को।वही हँसी तो समीर के चेहरे पर देखी थी जब उसने अपने शौक और मनु की इच्छा बताई थी।
"देख लो ..भई !"समीर के इन तीन शब्दों में क्या था ?कटाक्ष या अविश्वास ? यदि अविश्वास तो किसके प्रति ?उसके अपने गीतों पर या मनु के उसके प्रति भरोसे पर? पूरी रात समीर के इन तीनों शब्दों को ले आत्ममंथन करती रही।एक पल को लगा कि समीर से ही पूछ लें कि इस देख लो भई का क्या अर्थ है ?लेकिन इससे आगे पूछना भी तो व्यर्थ था।ये तीन शब्द आरम्भ से अधिक अंत को उजागर कर रहे थे कि इसके आगे समीर के पास कुछ भी नहीं कहने को।आत्ममंथन की वह रात एक फैसले की सुबह में तब्दील हो चुकी थी।यही तो नियति थी हर उस औरत की तरह उसकी भी जो कभी रसोई तो कभी बिस्तर पर टूट जाती थी।कभी ज़िम्मेदारियों में तो कभी पुरुष की अहं की चारदीवारी में खो जाती थी।श्यामल ने न तो समीर से बहस की ,न ही मनु को कुछ बताया।मन उखड़ा तो शब्द उखड़े और शब्द एक फाइल में कैद होकर रह गए ।मनु के बार बार उकसाने और पूछने पर श्यामल ने सच बता दिया।
"तो देख लो भई का तुम्हारे हिसाब से क्या अर्थ हुआ ?"
"यही कि उसकी मर्जी नहीं !"
"यह भी तो हो सकता है कि तुम गर कुछ करना चाहो तो कर सकती हो।वही गिलास आधा खाली आधा भरा वाली पॉलिसी समझो।"मनु ने मुस्कुराते हुए अपना पक्ष रखा।
"क्या मतलब मनु ?"
"यही कि तुम इस न में भी हाँ ही समझो। दी बॉल इज़ इन योर कोर्ट नाउ "
"समीर ने जिस तरह से कहा न मनु ,वो न ही है ।अपनी सहूलियत से ज़बरदस्ती हाँ में बदल नहीं सकते उसकी न को।"
"जिस तरह से तुम अर्थ का अनर्थ बना रही हो वह भी तो ज़बरदस्ती है न डियर।समीर ने न भी तो नहीं की न ?तो बस इसी में अपनी मर्ज़ी का "देख लो " ढूँढ लो।कह दो कि मैंने देख लिया कि मुझे आगे बढ़ना है इस क्षेत्र में।"
"तुम्हारे लिए आसान है ,मेरे लिए नहीं।हर कोई मनोहर नहीं।"
"मनोहर नहीं ,मनु !एक बार और मनोहर कहा न ,यहीं तुम्हारे घर की खिड़की से कूद जाऊँगा।"
"उफ़्फ़ ..तुम तो नाम को लेकर बच्चे बन जाते हो।"
"जब सामने कोई महिला बुज़ुर्गीयत ओढ़े बैठी हो ,तो उसके सामने बच्चा बनना ही बेहतर ऑप्शन है।"
मनु की हँसी में श्यामल के दिल को कुछ हद तक सांत्वना तो मिलती लेकिन भीतर कहीं असंख्य गीत अपनी लय गति से इतर बनते बिगड़ते रहते।बातों बातों में मनु ने श्यामल से उसकी गीतों की फ़ाइल ले ली और श्यामल ने बिना न नुकर के यह सोच दे दी कि कुछ हो न हो ,एक दोस्त के पास तो रहेंगे न उसके शब्द ,उसके गीत।
वक़्त अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा।मनु को फाइल ले जाने के चार महीने बाद ही दूसरे शहर में नौकरी मिल गई।पहले रोज़ बात होती ,लेकिन व्यस्तता बढ़ती गई तो मनु का फ़ोन पर बतियाना सप्ताह में एक दो बार ही होता।कहीं न कहीं वह मनु को मिस तो करती लेकिन कह नहीं पा रही थी।सप्ताह जब महीनों के सफ़र तय करने लगे तो बेचैनी बढ़ने लगी।श्यामल का तन मन बोझिल सा रहता।समीर ने एक दो बार पूछ कर अपने फ़र्ज़ की इतिश्री कर ली कि " क्या हुआ ,तुम्हारी तबीयत ठीक नही तो किसी डॉक्टर को दिखा दें ?"
श्यामल के पास मनु की पत्नी ,बच्चों का और उसकी मम्मी का फोन नंबर भी था। दिल दिमाग की ज़द्दोज़हद में दिल की ही सुननी पड़ी।उसने मनु की माँ को फ़ोन मिला लिया।औपचारिकता का निर्वहन करते हुए बातचीत में मनु के बारे पूछा तो जो खबर मिली ,उसे सुन उसके पाँव तले की ज़मीं ही खिसक गई।
"आँटी ,मनु ने नहीं बताया तो आप ही बता देंती।आप तो जानती हैं न कि हम दोस्त हैं।क्या मेरा इतना हक भी नहीं था जानने का ?"भरे स्वर में श्यामल ने पूछा।
"बेटा ,हमें भी कहाँ मालूम था कि उसे कैंसर है और वो भी लास्ट स्टेज का।।हमें तो अपनी सुध बुध ही नहीं थी। हमारी तो दुनिया ही लुट गई है ,बेटा।"कहकर आँटी फूट फूट कर रोने लगी।उस पल उसे मनु पर गुस्सा आया कि उसने बताया तो होता।रोज़ नहीं तो कभी कभी ही सही ,मनु की पत्नी पुनीता से तो बात होती थी ।क्या वह उनके लिए इतनी गैर थी कि उसे खबर देना भी किसी ने उचित नहीं समझा ? आखिर क्या कारण रहा होगा ?"
श्यामल का दिल चाह रहा था कि उड़ कर पहुँच जाए मनु के पास और उसे झंझोड़ कर कहे कि एक सन्देशा तो पहुँचा देता किसी भी तरह।अगर आज वह मजबूर होकर उसकी माँ से बात न करती तो उसे आज भी कहाँ मालूम होता कि उसका यह नटखट, मसखरा दोस्त किस स्थिति से गुज़र रहा है ?
बार बार मनु का हँसता हुआ चेहरा श्यामल की डबडबाई पलकों में स्वरूप गढ़ता और फिर आंसुओं से धुंधला हो जाता।आज घर पर कोई नहीं था इसलिये उसे आज रोने की पूरी आज़ादी थी।भीगे तकिए को अपनी दुख से उपजी बेबसी में उठा कर पटक दिया।मनु तो था नहीं पास वरना आज गुस्से से उसे दो चार जड़ देती उसकी बेवक़ूफ़ी पर।लास्ट स्टेज का सोचकर डर और दर्द की एक तेज़ लहर से उसका पूरा वज़ूद काँप उठा ।है ईश्वर ! मनु को कुछ मत होने देना।उसे जल्द से जल्द ठीक कर दो।
प्रार्थनाएँ करते करते रात का खाना बनाया और समीर और बच्चों को खिला दिया ।फिर खुद को संभालते हुए समीर को मनु की तबीयत से अवगत करवाया।
"समीर ,आँटी बहुत टूट गईं हैं।हमें एक बार चलना चाहिए।
"ठीक है ,कल चलते हैं।"
श्यामल हैरान थी कि आज उसने जो कहा वही तो अक्सर मनु समझाता था कि अपनी ज़िंदगी के कुछ फैसले लेने का हक़ तुम्हें खुद होना चाहिए।क्या करना है ,कहाँ जाना है का फैसला।छोटी छोटी बातों पर भी पति या बच्चों की आज्ञा लेने की आवश्यकता आपकी आदत बन जाती है और वही फिर पंगु बना देती है।आज मनु के घर जाने के लिए उसने खुद ही समीर को अपना फैसला बता दिया कि जाना चाहिए।श्यामल को आज मनु की कही बात का भाव समझ आने लगा था।उसे याद आया कैसे मनु की पत्नी केवल बताती थी कि आज वह कहां जा रही है या क्या करने जा रही है।मनु उसे अपनी मस्ती में कहता "जा न डार्लिंग ,रोका किसने है ?"तब श्यामल को लगता कि कहीं न कहीं मनु उसकी मजबूरी का मज़ाक उड़ा रहा है।पुनीता को आज़ादी देकर वह उसे जता रहा है कि मैं अपने पति के हाथ की कठपुतली हूँ।फिर दूसरे पल ही वह अपने आप को दिलासा देती यह सोचकर कि जिनकी पत्नियाँ पति के नियंत्रण में नहीं होते अक्सर वही खोखले प्रदर्शन करते हैं अपनी मर्दानगी के।यही बात तो उसने एक बार खीज कर मनु को जता भी दी थी और मनु ने यही कहा "जिस दिन अपनी मर्ज़ी से एक काम भी कर लोगी न उस दिन अपनी आज़ादी को महसूस कर पाओगी।तब मैं नहीं गलत लगूँगा मैडम।"
अगली सुबह जब मनु के घर जाने के लिए निकलने लगे तभी उसकी माँ का फोन आया कि वे लोग पुनीता
के मायके वालों के साथ मुम्बई ही जा रहे हैं मनु के इलाज के लिए। श्यामल की मनु से एक बारमिलने और देखने की इच्छा मन में ही रह गई जब उसे पंद्रह दिन बाद ही एक अनहोनी खबर मिली कि मनु अब नहीं रहा।सुनकर आंसुओ को रोक नहीं पाई।समीर भी सुनकर केवल एक आह भर कर रह गए।श्यामल की हालत से बेखबर ,बस मनु के रिश्तेदारों से औपचारिक सांत्वना प्रकट कर अपने काम में व्यस्त हो गए।इधर श्यामल अपना दुख किसी से बाँट नहीं पा रही थी क्योंकि मनु की माँ कुछ दिनों के लिए लखनऊ चली गईं।पुनीता से तो कोई खास रिश्ता बना भी नहीं और बचा भी नहीं था।
वक़्त मरहम का काम कर ही रहा था कि छह महीने बाद मनु की माँ ने लौट कर श्यामल को अपने घर बुलाया।
मनु की मधुर स्मृतियों से बंधी जब श्यामल उनके पास गईं तो पुनीता कहीं बाहर गई हुई थी ।श्यामल ने कांपते हाथों से नमस्कार करते हुए हाथ जोड़े तो उन्होंने उसके हाथों को थाम लिया और रो पड़ीं।दो रिश्ते जो मनु के करीब थे ,आज एक दूसरे को सिवाए दिलासा देने के क्या कर सकते थे ? कुछ पलों की खामोशी के बाद मनु की माँ ने एक पत्र और एक फ़ाइल श्यामल के हाथों में थमा दी।पत्र में मनु ने लिखा था
"ऐ श्यामल..सुन।तेरे गीतों को संगीत देने का मैंने पुख़्ता इंतज़ाम कर लिया है। मेरा एक संगीतकार मित्र तुझसे बात करेगा ।देखो, तुम मुझे ज़रा भी मानती हो ,मुझे याद करती हो तो आगे ज़रूर बढ़ना ।यदि अभी भी हिम्मत नहीं तो जिस दिन हिम्मत आ जाये उस दिन माँ से मेरा दूसरा पत्र ले लेना। समय कम था इसलिए केवल इतना ही कर सका तुम्हारे लिए।बाकी का रास्ता तुम खुद तय करना ।
तुम्हारा दोस्त मिस्टर मनोहर नहीं ...मनु ! याद है न ?"
पत्र पढ़कर ,आँसू पोंछ कर श्यामल ने आगे बढ़ मनु की माँ में पाँव छू लिए और कहा
"आँटी जी ,मुझे मनु का दूसरा पत्र और आशीर्वाद दोनों दीजिये।"
मनु की माँ ने श्यामल के सर पर आशीष भरा हाथ रख ,उसे दूसरा पत्र भी थमा दिया जिस में लिखा था
"यस यू कैन डू इट ..!"
उस शाम श्यामल बार बार मनु के पत्र को पढ़ती हुई मनु के पसंदीदा गीत को सुनती रही।वो जितनी बार सुनती ,उसे लगता मनु उसके आसपास ही है ,उसके करीब ही है।सिगरेट के कश खींचता हुआ ..आधे खाली गिलास को आधे भरे गिलास की कहानी सुनाता हुआ ! उसके वज़ूद में समाया हुआ ..उसका प्यारा सा दोस्त ! वो कैसे उसे बिसरा सकती है ? उसने फिर से वही गीत ऑटो रीप्ले पर सैट कर दिया
"वो शाम भी कुछ अजीब थी ,ये शाम भी अजीब है "
- रश्मि तारिका, सूरत, गुजरात
--------------------रश्मि तारिका मूलतः पंजाब का प्रतिनिधित्व करती हैं। आजकल गुजरात के सूरत शहर में रहकर साहित्य से जुड़ी रहती हैं। कहानी संग्रह कॉफी कैफे प्रकाशित हो चुका हैं आजकल एक बायोग्राफी पर काम कर रही हैं। समाज के सम सामयिक मुद्दों पर आपकी लेखनी बेहतर चलती रहती है। उन्होंने एम पी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी कहानी "वो दूसरा पत्र" प्रेषित की है।
आपका स्वागत और आभार...
संपादक- शैलेश तिवारी


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