लेखिका 

चूड़ी

 चूड़ी की दुकान पर तरह तरह की चूड़ियां सजी हुई थीं। लाल चूड़ी, हरी चूड़ी, सुनहरी और धानी रंग की भी। खूबसूरत, नाज़ुक और डिजाइनर। उन्हें देख कर ही लग रहा था वे नाज़ुक कलाइयों के श्रंगार के लिए बनी हैं। उन्हीं के साथ कोने में सादी सी, थोड़ी मोटी चूड़ियां भी थीं जो एक कोने में रखी थीं। बाकी चूड़ियां उन्हें देख नाक भौं सिकोड़ने लगीं, 'ये कैसी चूड़ियां हैं? लगता है इन्हें चूड़ी बनाने वाले ने बड़े ही बेमन से बनाया है।'  

  'नहीं! हमें भी चूड़ी बनाने वाले ने उतनी ही मेहनत और प्यार से बनाया है जितना कि तुम्हें। बल्कि सच कहूं तो उसने हमें बनाने में ज्यादा मेहनत की है।' इतनी देर से ख़ामोश बैठी साधारण चूड़ियों ने कहा।
   'फिर तुम्हें ऐसा को बनाया है। बदसूरत! बेडौल!' धानी रंग की चूड़ी ने व्यंग्य से पूछा।
    'मेरे कहने पर! क्योंकि मैं तुम्हारी तरह नाज़ुक कलाइयों को नहीं बल्कि मेहनतकश कलाइयों को सजाना चाहती हूं।

-अंकिता भार्गव
संगरिया/ हनुमानगढ़(राजस्थान)
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समीक्षा 

चूड़ी... 
यही है अंकिता भार्गव की... लघु कथा का शीर्षक..। मेरे हिसाब से इसका शीर्षक...चूड़ी की इच्छा...  होना चाहिए। जब चूड़ी नाजुक, नर्म कलाइयों की शोभा बनने को आतुर हों, व्याकुल हों...। और स्वय को भली भाँति श्रंगारित करने की मनुहार चूड़ी बनाने वाले से कर खुद को संजी संवरी दिखाकर नवयोवनाओं के मन को रिझा रहीं हों  
ऐसे में एक चूड़ी चूड़ी बनाने वाले से खुद को बदडोल, बदरंग मोटी सी चूड़ी बनाने का आग्रह करती हो तब समझा जा सकता है कि मेहनतकश कलाई जो निर्मात्री है महलों की, उन चमकते कंगूरों की जो लालायित करते हैं व्यक्ति को आगे बढ़ने के जज्बे को जगाते हुए..। बहुत शानदार अंकिता जी... बधाई।
- शैलेश तिवारी
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परिचय 

 अंकिता भार्गव उच्च शिक्षित हैं और गज़ब की बात यह है कि लेखन को ही अपना कैरियर बनाने का सपना पूरा करने की ठान चुकी हैं। राजस्थान के कस्बे सगरिया जिला हनुमान गढ़ में रहने वाली अंकिता जी लघु कथा के साथ साथ कहानी, कविता और उपन्यास लिख चुकी हैं। शायरी की बारीकियों ने अभी आपको आकर्षित कर रखा है। एक उपन्यास "अनुगूँज" धारावाहिक के रूप में मेरठ के एक अखबार में प्रकाशित हो रहा है। 
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संपादक
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