जब पक्के आवास की आस छूटी तो मजबूरी में "लेवे" से ही बनाने लगे मकान
राजेश बनासिया, भाऊँखेड़ी
एमपी मीडिया पाइंट
इछावर,ब्लाक के गाँव भाऊँखेड़ी में आज जो नजारा देखा, उसे देखकर पुराने जमाने में जो लोग मकान बनाते थे उन मकानों की याद एक बार फिर ताजा हो गई।
मगर एक तरफ सरकार कहती है कि 2022 तक सभी को पक्के मकान मुहैय्या करा देंगे फिर आखिर ग्रामीण अंचलों के गांवों में अब भी कच्चे मकान क्यों बन रहे हैं ।
इस संबंध में जब मकान निर्माण कर रहे ग्राम के किसान चंदरसिंह से जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि 2011में ग्राम में सर्वे हुआ था जिसमे जिनके कच्चे मकान थे उन्हें उस लिस्ट में जोड़ा गया था मगर 10 साल बीत गए पर आवास नही मिला व जो पुराना आवास था वो भी जर्जर हो गया था जिससे मकान धराशयी हो गया था,इसलिए मजबूरी में बनाना पड़ रहा है।जब उनसे पूछा गया कि वापस आप इसे "लेवे" से ही क्यों बना रहे हो तो उन्होंने बताया की पहले गांव में आसानी से रेत मिल जाती थी अब रेत भी नही मिल रही है,तो मजबूरी में हमे मकान का निर्माण "लेवे"से ही करना पड़ रहा है।
यह तस्वीर कही न कहीं पीएम आवास योजना की पोल भी खोल रही है इससे भी कतई इंकार नही किया जा सकता है।
राजेश बनासिया, भाऊँखेड़ी
एमपी मीडिया पाइंट
इछावर,ब्लाक के गाँव भाऊँखेड़ी में आज जो नजारा देखा, उसे देखकर पुराने जमाने में जो लोग मकान बनाते थे उन मकानों की याद एक बार फिर ताजा हो गई।
मगर एक तरफ सरकार कहती है कि 2022 तक सभी को पक्के मकान मुहैय्या करा देंगे फिर आखिर ग्रामीण अंचलों के गांवों में अब भी कच्चे मकान क्यों बन रहे हैं ।
इस संबंध में जब मकान निर्माण कर रहे ग्राम के किसान चंदरसिंह से जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि 2011में ग्राम में सर्वे हुआ था जिसमे जिनके कच्चे मकान थे उन्हें उस लिस्ट में जोड़ा गया था मगर 10 साल बीत गए पर आवास नही मिला व जो पुराना आवास था वो भी जर्जर हो गया था जिससे मकान धराशयी हो गया था,इसलिए मजबूरी में बनाना पड़ रहा है।जब उनसे पूछा गया कि वापस आप इसे "लेवे" से ही क्यों बना रहे हो तो उन्होंने बताया की पहले गांव में आसानी से रेत मिल जाती थी अब रेत भी नही मिल रही है,तो मजबूरी में हमे मकान का निर्माण "लेवे"से ही करना पड़ रहा है।
यह तस्वीर कही न कहीं पीएम आवास योजना की पोल भी खोल रही है इससे भी कतई इंकार नही किया जा सकता है।


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