लेखक 

पत्रकार की नौकरी मतलब या तो कोई काम नहीं या कभी भी फुर्सत नहीं। कब कोई घटना हो जाए, कोई कार्यक्रम की सूचना अचानक या किसी विभाग की अव्यवस्था को लेकर कहीं हंगामा हो जाए। पता नहीं होता और हम जुट जाते हैं मिशन पर फिर खबर लिखे जाने तक फुर्सत नहीं रहती और कई बार कोई काम ही नहीं बस अपने स्टोरी आईडिया पर काम करो। 
वाक्या 25 जनवरी दिन शुक्रवार की देर रात का है। करीब 10.30 बजे एक प्रसूता की मौत अस्पताल में हो गई। परिजनों ने अस्पताल में जम कर हंगामा किया। ऐसे मामलों में हमारे शहर के लोग जागरूक हैं। लापरवाही पर तुरंत आवाज बुलंद हो जाती है। अस्पताल में हंगामा होने लगा। हंगामा खत्म हुआ, खबर लिखी, भोपाल मेल की और ऑफिस से निकल गया घर के लिए।
बाइक से घर जा रहा था। दिसंबर का महीना था। ठंड बहुत थी। रात करीब 1 बजे घर पहुँचा। हालांकि मेरा काम रोज ही रात 9 बजे तक चलता है। इसके बाद ऑफिस बंद करते 9.30 बज जाता है। फिर कुछ मित्रों के साथ गप्पे मारना और करीब 11 बजे घर पहुँचता हूँ, उस रात 1 बजे घर पहुँचा था। तो सोया भी देर तक, तो अगले दिन सुबह 8 बजे तक बिस्तर में ही था। वैसे मैं 7 बजे उठ जाता हूँ। 8 बजे भी फोन की घ्ान्न्... घन्न्... की आवाज जो तकिये के नीचे से आ रही थी उसे सुनकर जागा। रजाई से पहले चेहरा बाहर निकाला। फिर फोन जो ठंड के कारण तकिए के नीचे दुबक कर सो रहा था, उसे निकाला,  ठंड के कारण दोनों फिर रजाई में दुबक गए। मोबाइल के बीच में बने एक गोले को उसी के ठीक ऊपर बने हरे गोले तक अंगूठे से खींच कर ले गया और कहा हेलो। फोन स्टेशन रोड पर स्थित जायका रेस्टोरेंट के मालिक और मेरे दोस्त अमित का था। 
वो बिना हेलो हाय किए सीध्ाा बोला- भाई यहाँ आ जाओ एक जेसीबी वाले ने एक आदमी को कुचल दिया। शायद मर गया। 108 को फोन किया है। हमारे सूत्र ऐसे ही होते हैं।
मन तो नहीं था जाने का, पर जाना जरूरी था। यदि स्थानीय आदमी को कुचला है तो हंगामा होगा। हंगामा बड़ा हो जाता तो कुछ भी हो सकता था। जल्दी से चेहरे पर पानी मार कर और मोश्चारईजर लगाकर चल दिया। मैं जब घटना स्थल पर पहुँचा तो वहाँ से उस घायल व्यक्ति को कुछ लोग अस्पताल लेकर चले गए थे। घ्ाटना स्थल पर खून था, कुछ कपड़े और एक बैग पड़ा था। यहाँ से गाड़ी मोड़ी और सीधे अस्पताल पहुँच गया। जहाँ उस व्यक्ति को मृत घोषित  कर दिया गया था। अब उसे पीएम रूम ले जाया जा रहा था। पीएम रूम में उसके शव को रखा गया। अब उसकी शिनाख्त की जानी थी। उसके पास न कोई मोबाईल, आईडी और न ही कोई अन्य  दस्तावेज थे। जेब में 183 स्र्पए थे। शिनाख्त कर पाना मुश्किल था। पुलिस मृतक की जानकारी जुटाने में जुट गई और हमें एक सिंगल कॉलम खबर लिखनी थी और उसका नाम पता जानना था। नहीं तो अज्ञात की मौत और पुलिस  जांच में जुटी लिखना था। 
अब मैं घ्ार लौट आया था। शाम तक पीएम नहीं किया गया क्योंकि डॉक्टरों से कहने वाला कोई परिजन नहीं था इसलिए वे भी बेफिक्र थे। शाम तक पीएम नहीं हुआ। पीएम रूम में बिजली नहीं थी। इसलिए शाम को पीएम नहीं किया गया। शव रात भर पीएम रूम में ही रखा रहा। सुबह मैं वहाँ पहुँचा। खबर थी कि 24 घ्ांटे तक शव पीएम रूम में रखा रहा और पीएम नहीं किया। पीएम रूम खुला। अंदर जा कर देखा तो शव रात भर से पत्थर की टेबल पर ही पड़ा था। जिसके शरीर पर कुछ जगह काटने के निशान थे। वहाँ का चौकीदार जो पीएम से पहले की जाने वाली तैयारियों में जुट था। कुछ ब्लेड, सुई, ध्ाागा, स्र्ई के बंडल और बड़ी-बड़ी बाटल शव के पास वाली टेबल पर रख रहा था। उनका नाम राम किशन था। उनसे मैंने पूछा ये काटने की निशान कैसे हैं। 
तो वे बोले- चूहों ने कुतर दिया होगा। 
मैंने कहा- तो शवों को हिफाजत से क्यों नहीं रखते। 
इस पर रामकिशन दादा बोले- साहब‍‍ चूहों से तो मैं बचा लूंगा, पर इन्हें इंसानों से कौन बचाएगा?
यह सुन मैं चौंक गया। राम किशन दादा की तरफ देखा। 
तभी वहाँ डॉक्टर आ गए। तेजी से अंदर आए। ऐसा लग रहा था बहुत जल्दी में है। शायद डॉक्टरों को खबर लग गई थी कि कोई पत्रकार पीएम रूम में पहुँच गया है। जो कल आए शव के पीएम न होने को लेकर खबर बना रहा है। 
आते ही डॉक्टर साहब ने मुझे समझाना शुरू कर दिया। क्या करें पत्रकार साहब। वहाँ ओपीडी में जिंदा लोगों की लाइन लगी है और यहाँ मरे हुए को भी हमारा इंतजार है। किसका ध्यान रखें? रामकिशन दादा चुप हो गए थे। मैं भी वहाँ से आ गया। खबर लिखी और भोपाल भेज दी, लेकिन अब तक मृतक की पहचान नहीं हुई थी। उसके शव को श्मशान के एक कोने में तहसीलदार की मौजूदगी में दफन कर दिया गया। यदि शिनाख्त होगी तो शव को निकाल कर परिजन को सौंप देंगे। 
शव तो दफन हो गया था, पर मेरे जहन में एक सवाल बार-बार आ जाता कि साहब चूहों से तो मैं बचा लूंगा, इन्हें इंसानों से कौन बचाएगा? राम किशन दादा ने यह क्यों कहा? यह मेरे दिमाग में कभी भी आ जाता। यह सब चलता रहा, पर कभी उनसे बात करने का मौका ही नहीं मिला। 
कुछ दिन बाद भोपाल ऑफिस से फोन आया कि जिलों के पीएम रूम में शासन की ओर से फ्रीजर दिए जा रहे हैं। शवों को रखने के लिए। अभी पीएम रूम की क्या स्थिति है? या पीएम रूम नया बनाया जाएगा या फ्रीजर वहीं रखे जाएंगे? इस िवषय पर खबर बनाओ। खबर को लेकर तथ्य जुटाने मैं पीएम रूम पहुँचा। 
यहाँ पीएम रूम के बाहर एक बैंच जो जर्जर थी। उस पर राम किशन दादा बैठे थे। मैं उनके पास जा कर खड़ा हो गया। मैंने उनसे पूछा क्या हाल हैं।
 वो बोलेे- बढिया। 
उनसे पीएम रूम के संबंध्ा में तमाम जानकारियां प्राप्त की। उन्होंने सब खुल कर बताया कि यहाँ कोई व्यवस्था नहीं है। कई बार चूहे, बिल्ली और ऊदबिलाव शवों को नोंच देते हैं। उन्हें कुतर देते हैं। रात को बिजली नहीं होती। डर के कारण यहाँ कोई नहीं स्र्कता। मैं स्र्कता था पहले, अब उम्र हो गई तो नाईट ड्यूटी नहीं करता और वो चुप हो गए। 
अब मुझे उस सवाल का जवाब चाहिए था जो मेरे दिमाग में जगह कर गया था। मैंने पूछा- दादा आप उस दिन कुछ कह रहे थे। 
दादा बोले- क्या? 
मैंने कहा- आपने कहा था कि चूहों से तो शव को बचा सकते हैं, पर इंसानों से कौन बचाए?
दादा मुस्कुराए और बोले- छोड़ो और उन्होंने अपनी कमीज की जेब में रखा बीड़ी का बंडल और माचिस निकाली, वो बीड़ी पीने लगे। वो मेरी तरफ देख भी नहीं रहे थे। 
मैंने जोर देकर पूछा- बताओ तो...
उन्होंने एक जोर का कश लिया और बोले- यहाँ रात को लोग आने से डरते हैं। उन्हें आना भी नहीं चाहिए, यहाँ रात को भूत आते हैं। भूत जो किसी को नहीं छोड़ते। थोड़ी सी शराब के कारण हैवानियत इतनी बढ़ जाती है कि वो भूत वो सब करते हैं। जो किसी ने सोचा भी न हो। हैवानियत का नंगा नाच होता है यहाँ। 
मैं कुछ समझ नहीं पाया था, मैंने पूछा- मतलब।
उन्होंने फिर एक कश लिया। धुआँ आ बाहर निकाला कुछ देर चुप रहे। मेरी आँखों में आँखें डाली और फिर बोले- साहब यहाँ के स्वीपर और चौकीदार नशे में ध्ाुत होकर हैवान हो जाते हैं। सब नहीं, कुछ ही ऐसे लोग हैं जो शवों के साथ दरिंदगी करते हैं। अपनी वासना शवों के साथ मिटाते हैं। यहाँ आने वाली सुंदर लड़कियों के शवों के साथ तो सामूहिक दुष्कृत्य होता है। 
मैंने पूछा- पीएम के दौरान डॉक्टरों को पता नहीं चलता ये सब।
दादा बोले- पता तो सबको है, पर बात का बतंगड़ बनने के डर से कोई कुछ नहीं कहता। डॉक्टर भी चुप रहते हैं। 
अब मैं समझ नहीं पा रहा था क्या कहूँ और क्या न। 
कुछ देर शांति रही और इस बार मेरे बिना कुछ बोले बीड़ी बैंच के कोने पर बुझाते हुए दादा फिर बोले। 
ऐसा नहीं है कि यह सब सिर्फ यहीं होता है। कई दूसरे शहरों के पीएम रूम हैं। जहाँ ये सब होता है। लगातार शवों के साथ रहने वाले और लंबे समय तक नाईट ड्यूटी करने वाले कर्मचारी नशे में ध्ाुत रहते हैं। उनकी भी गलती नहीं। बिना नशा किए वीराने में लाशों के बीच कौन स्र्क सकता है, पर जो हैवानियत उन पर हावी हो जाती है। उससे ऐसा लगता है कि यहाँ कोई दानव है जो इंसान को हैवान बना देती है और यह सब होता है। 
राम किशन दादा पीएम रूम में नाईट ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों की हैवानियत के किस्से सुनाते रहे। मैं सुनता रहा। बहुत कुछ कहा जो लिख नहीं सकता। बस इतना कह सकता हूँ कि वो हैवान शवों के साथ अपनी हर वासना की पूर्ति करते हैं और ये शव किसी से नहीं कह सकते मी-टू। 

आकाश माथुर 

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परिचय


आकाश माथुर... सीहोर मध्यप्रदेश के निवासी हैं और युवा पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर हैं...। पत्रकारिता की विरासत को संभालने के साथ आप एक लेखक भी हैं। कुछ समय पहले ही उनकी पुस्तक "मी टू " का प्रकाशन हुआ..। उसी पुस्तक की एक कहानी एमपी मीडिया पॉइंट के लिए आपने प्रेषित की है। आपका स्वागत है.. आकाश भाई....।
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समीक्षा


शव गृह के दानव.... दरिंदगी की पराकाष्ठा...

 किससे कहे लाश #me too....। 

कहानी का ताना बाना एक पत्रकार की खोजी प्रकृति के साथ बुना गया है। ऐसी विभत्स करतूतों तक आम आदमी की पहुँच भी नहीं होती। जब मैंने पहली बार महाभारत की उस कथा को पढ़ा था कि अभिमन्यु को कौरवों के महारथियों ने घेरकर मारा और उसके शव के साथ जो कृत्य किया उसका चित्रण वेद व्यास जी ने शब्दों मे जो किया है। उस पांच हजार साल पुरानी घटना को पढ़कर तब गुस्सा अपने चरम पर पहुँच गया था। लेकिन #me too... की इस पहली कहानी को पढ़कर खुद के मानव होने से ही घृणा होने लगती है। लगता है हैं उस वहशी कौम के नुमाइंदे हैं जो जानवरों से भी ज्यादा गिरी हुई है। हालांकि लेखक ने इशारे मे ही घटनाक्रम घटित करने वालों की दरिंदगी पेश की है फिर भी शर्मनाक तो है। रामकिशन दादा की बीड़ी सुलगने के साथ ही पाठक का दिल धुँआ धुँआ होने लगता है। आखिरी कश लेकर जब राम किशन दादा बेंच के कोने से बीड़ी को मसलता है तब लगता है संपूर्ण मानवता के पाठ मसला गए हों। अच्छा शब्द चित्र बनाया है। रंग का सामयिक चुनाव विषय के प्रति आकृष्ट करता है। हाँ एक बात है जब लेखक कहानी के प्रारम्भ मे जनवरी महीने की तारीख के साथ कथानक का श्री गणेश करता है। उसके बाद बाइक पर घर लौटते समय दिसंबर की कड़कती सर्दी मे उसका ठिठुर जाना अखरता है। कई पढावो के बाद कहानी पुस्तक मे शामिल होकर पाठक के हाथों पहुंचती है तो ऐसी चूक अखरती है। बहरहाल पहली कहानी की रवानगी से लगा नही कि लेखक का यह पहला प्रयास है। आकाश लगे रहो... आगे बढो.... शाबाश.....।
संपादक-शैलेश तिवारी
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