लेखिका 


मौसम ने फागुनी रंग बरसाया
जगती का तन मन हरषाया
धरा ने ओढ़ी सुनहरी चूनर
नभ भी जोगी बनकर आया

बहकी बहकी पवन चली 
तन मन में नव उंमग जगी
धूप में रश्मि चमकने लगी
जगमग हरियाली महक उठी

दुलारे लगने लगे ऋतु के नजारे
नदी के साथ चलते जैसे किनारे
फागुन में खिलने लगे दरख़्त
प्रकृति भी लगी रूप बदलने

सांझ रक्तिम आभा लिए आई
हर पल कुछ नया गुनगुनाई
रंग बिरंगी बयार बहने लगी
सोच सोच कर आंखें भर आई

अमलतास सिदुरी रंग बिखराये
गुड़हल अपना रंग महकाए
भंवरो को गुंजायमान होते देख
तितली उड उड कर नृत्य दिखाएं

रंग अब अंग अंग महकने लगे
चेहरे भी अब रंग बदलने लगे
खत्म हुई पतझड़ की शिकायत
 पूरी हो गई पनपती हसरतें

नवयौवना के रुखसार को देखकर
प्रकृति नित नयी छटा रोज बिखराएं
नभचर कलरव करते मधुर गान सुनाएं
देख देख फागुन मन ही मन मुस्कराए

शोभा गोयल

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परिचय

 शोभा गोयल जयपुर राजस्थान से हैं। वहाँ के सचिवालय में अपनी सेवाएं देने के साथ आप कविता और लघुकथाओं सहित अन्य विधाओं से साहित्य के सेवा में भी अनवरत रूप से सलंग्न हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे भी प्रकाशित होती रहती हैं।एमपी मीडिया पॉइंट के साहित्य सोपान में आपका स्वागत हैं।
संपादक
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