लेखक
दुर्गे दुःखहरा तारा दुर्गतिनाशिनी ।
दुर्गमे शरणा विन्ध्यगिरि निवासिनी ।।
दुराराध्या ध्यानसाध्या शक्ति सनातनी ।
परात्परा परमा प्रकृति पुरातनी ।।
नीलकण्ठप्रिया नारायणी निराकारा ।
सारात्सारा मूलशक्ति सावित्री साकारा ।।
महिषमर्दिनी महामाया महोदरी ।
शिवनितम्बिनी श्यामा सर्ववाणी शंकरी ।।
विरूपाक्षी शताक्षी शारदा शाकम्भरी ।
भ्रामरी भवानी भीमा घूमा क्षेमंकरी ।।
काली कालहरा कालाकाले कर पार ।
कुलकुण्डलिनी कर कातरे निस्तार ।।
लम्बोदरी बाघम्बरा कलुषनाशिनी ।
कृदान्तदलिनी कालउरोविलासिनी ।।
(कृत्तिवासीय रामायण, लंकाकाण्ड)
देवी फिर भी प्रकट नहीं हुईं । राम की आॅखों में आॅसू आ गये । हनुमान ने एक सौ आठ नीलोत्पल दिये । राम ने माॅ के चरणों मंे कमल चढाए , किन्तु वे एक सौ सात ही थे । हनुमान ने कहा कि अब देवीदह में एक भी पुष्प नहीं है । संकल्प भंग करने और परीक्षा के लिये निस्संदेह देवी ने ही एक कमल का अपहरण कर लिया था । राम बहुत दुखी हुए । उन्होंने पुनः देवी का स्तवन किया । फिर भी देवी का साक्षात्कार नहीं हुआ । राम ने विचार किया कि मुझे लोग नीलपदमाक्ष कहते हैं । मैं अपना एक नयन जगदम्बा के चरणों में समर्पित कर दॅूगा । उन्होंने बाण से ज्यों ही नयन निकालना चाहा कि देवी ने प्रकट होकर उनका हाथ पकड़ लिया । राम को देवी का साक्षात दर्शन हुआ । राम ने देवी से रावण के संहार की अनुमति माॅगी । देवी ने कहा कि मुझे नयन नहीं चाहिये । संकल्प पूरा हो गया । अब देवी ने राम की स्तुति की -
श्मायार मनुष्य तुमि ,चतुर्बाहु ,आइले भूमि ,नाशिते राक्षस दुराचार ।
लोके जानावार जन्य ,आमारे करिले धन्य ,अवनीते करिले प्रकाश ।श्
(कृत्तिवासीय रामायण, लंकाकाण्ड)
तुम माया से मनुष्य बने हुए हो , तुम साक्षात चतुर्भुज विष्णु हो ,जो दुराचारी राक्षसों का विनाश करने के लिये धराधाम पर अवतीर्ण हुए हो । देवी ने राम से निवेदन किया कि तुमने लोक को ज्ञान कराने के लिये मेरी आराधना की । मैं धन्य हो गई । तुमने भूमंडल में मेरा प्रकाश किया ।श्देवी ने आराधना से प्रसन्न होकर रावणवध की आज्ञा दे दी । राम ने रावण का अंत करने के लिये युद्धभूमि में महासंहार यज्ञ आरंभ कर दिया ।
दशमी ते आराधना करि ,विसर्जिया महेश्वरी ,संग्रामे चलिल रघुपति ।श्(कृत्तिवासीय रामायण, लंकाकाण्ड)
दशमी के दिन अन्तिम आराधना करके श्री राम ने भगवती महेश्वरी का विसर्जन कर दिया और रावण के साथ संग्राम करने चल दिये । विजय कोदण्ड धारण कर राम रथ में आसीन हो गये । युद्ध हुआ और लंकापति रावण का वध कर राम ने सीता का समुद्धार किया । राम ने जगदीश्वरी की कृपा से विजय प्राप्त की ।
राम की शक्तिआराधना सार्थक हुई ।
राम की चंडी आराधना गतांक से आगे......
इन्द्र के निवेदन पर ब्रह्मा ने रणस्थल पर आकर राम को देवीआराधना का क्रम बताया । राम ने सागरतट पर जाकर देवी का स्तवन किया । उन्होंने विधिवत चण्डीपाठ आरंभ किया । वानरों में भी उत्साह का संचार हुआ और वे नृत्य करते हुए उत्सव मनाने लगे । राम ने मृण्मयी मूर्ति बनाई । षष्टी , सप्तमी ,अष्टमी और नवमी और दशमी को विधिवत आराधना की । राम की इस शक्तिआराधना के सभी साक्षी थे । हनुमान ने दूर दूर तक घूमघूमकर तरह तरह के पुष्प एकत्र किये । सब भाॅति उत्तम पूजन होने के बाद भी राम को देवी का साक्षात दर्शन नहीं हो सका। तब विभीषण ने राम के सम्मुख आकर निवेदन किया कि देवी को प्रसन्न करने का उपाय एक ही है उनके चरणों में एक सौ आठ नीले उत्पलों का समर्पण । नीलोत्पल एकत्र करने का दायित्व भी हनुमान ने लिया । वे देवीदह से पुष्प एकत्र करने चले गये और इधर राम ने महाशक्ति देवी दुर्गा का स्तवन किया ।दुर्गे दुःखहरा तारा दुर्गतिनाशिनी ।
दुर्गमे शरणा विन्ध्यगिरि निवासिनी ।।
दुराराध्या ध्यानसाध्या शक्ति सनातनी ।
परात्परा परमा प्रकृति पुरातनी ।।
नीलकण्ठप्रिया नारायणी निराकारा ।
सारात्सारा मूलशक्ति सावित्री साकारा ।।
महिषमर्दिनी महामाया महोदरी ।
शिवनितम्बिनी श्यामा सर्ववाणी शंकरी ।।
विरूपाक्षी शताक्षी शारदा शाकम्भरी ।
भ्रामरी भवानी भीमा घूमा क्षेमंकरी ।।
काली कालहरा कालाकाले कर पार ।
कुलकुण्डलिनी कर कातरे निस्तार ।।
लम्बोदरी बाघम्बरा कलुषनाशिनी ।
कृदान्तदलिनी कालउरोविलासिनी ।।
(कृत्तिवासीय रामायण, लंकाकाण्ड)
देवी फिर भी प्रकट नहीं हुईं । राम की आॅखों में आॅसू आ गये । हनुमान ने एक सौ आठ नीलोत्पल दिये । राम ने माॅ के चरणों मंे कमल चढाए , किन्तु वे एक सौ सात ही थे । हनुमान ने कहा कि अब देवीदह में एक भी पुष्प नहीं है । संकल्प भंग करने और परीक्षा के लिये निस्संदेह देवी ने ही एक कमल का अपहरण कर लिया था । राम बहुत दुखी हुए । उन्होंने पुनः देवी का स्तवन किया । फिर भी देवी का साक्षात्कार नहीं हुआ । राम ने विचार किया कि मुझे लोग नीलपदमाक्ष कहते हैं । मैं अपना एक नयन जगदम्बा के चरणों में समर्पित कर दॅूगा । उन्होंने बाण से ज्यों ही नयन निकालना चाहा कि देवी ने प्रकट होकर उनका हाथ पकड़ लिया । राम को देवी का साक्षात दर्शन हुआ । राम ने देवी से रावण के संहार की अनुमति माॅगी । देवी ने कहा कि मुझे नयन नहीं चाहिये । संकल्प पूरा हो गया । अब देवी ने राम की स्तुति की -
श्मायार मनुष्य तुमि ,चतुर्बाहु ,आइले भूमि ,नाशिते राक्षस दुराचार ।
लोके जानावार जन्य ,आमारे करिले धन्य ,अवनीते करिले प्रकाश ।श्
(कृत्तिवासीय रामायण, लंकाकाण्ड)
तुम माया से मनुष्य बने हुए हो , तुम साक्षात चतुर्भुज विष्णु हो ,जो दुराचारी राक्षसों का विनाश करने के लिये धराधाम पर अवतीर्ण हुए हो । देवी ने राम से निवेदन किया कि तुमने लोक को ज्ञान कराने के लिये मेरी आराधना की । मैं धन्य हो गई । तुमने भूमंडल में मेरा प्रकाश किया ।श्देवी ने आराधना से प्रसन्न होकर रावणवध की आज्ञा दे दी । राम ने रावण का अंत करने के लिये युद्धभूमि में महासंहार यज्ञ आरंभ कर दिया ।
दशमी ते आराधना करि ,विसर्जिया महेश्वरी ,संग्रामे चलिल रघुपति ।श्(कृत्तिवासीय रामायण, लंकाकाण्ड)
दशमी के दिन अन्तिम आराधना करके श्री राम ने भगवती महेश्वरी का विसर्जन कर दिया और रावण के साथ संग्राम करने चल दिये । विजय कोदण्ड धारण कर राम रथ में आसीन हो गये । युद्ध हुआ और लंकापति रावण का वध कर राम ने सीता का समुद्धार किया । राम ने जगदीश्वरी की कृपा से विजय प्राप्त की ।
राम की शक्तिआराधना सार्थक हुई ।


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