लेखिका
घर में निस्तब्धता को तोड़ती केवल कुछ सिसकियाँ थी जो आज बन्द कमरे से बाहर सुनाई दें रहीं थीं।बाहर हॉल में अरविंद जी पत्नी के साथ खामोश बैठे अपनी बेटी के बाहर आने का इंतज़ार कर रहे थे।सोच रहे थे ,अच्छा ही है कि मन का ग़ुबार निकल जाए बच्ची का।आजकल के बच्चे ज़िन्दगी को जितना आसान लेकर चलते हैं ,उतनी आसान वह है नहीं।आँखों के कोरों से बहते आँसुओं को उन्होंने भी बह जाने दिया।अपमान के आँसूं बह ही जाएँ तो बेहतर हैं वरना बार बार दुखी मन को और दुखी करते हैं।डबडबाई आंखों से कुछ समय पहले घटित घटना को याद करते हुए उनके दुख और आक्रोश से हाथ पाँव काँप रहे थे।मालती जी उनके पास आईं और उन्होंने उनके हाथों पर अपना हाथ रख ,नम आंखों से ही धीरज रखने को कहा।दोनों के ही बेचैन मन न चाहते हुए भी घटना की पुनरावृत्ति करने लगे।
सुबह से ही आरुषि अपनी मनपसंद साड़ी के संग मनपसन्द ज़ेवर की मैचिंग बनाकर खुशी के आसमान पर उड़ रही थी।आज उसे समर के घर पर उसकी होने वाली सास ने बुलाया था ।सबके मिलने के प्रयोजन के सँग उनके विवाह की तारीख भी पक्की करनी थी।अरविंद जी होने वाले समधियों के पास पूरी तैयारी के साथ जा रहे थे ।एक ही तो बेटी है आरुषि ,सब लाड़ पूरे करने की उनकी हर सम्भव कोशिश रहती थी इसलिए उन्होंने बेटी की पसन्द समर पर भी अपनी रज़ामंदी की मोहर लगा दी थी।
एक आलीशान बंगले के बाहर जब उन्होंने अपनी गाड़ी खड़ी कि तो बेटी के भाग्य और भविष्य के लिए सन्तुष्ट हो गए।समर और आरुषि बड़ों के समक्ष बैठे मुस्कुराते झिझकते हुए से अपनी भावी ज़िन्दगी के सपनों में खोए थे।
"बहनजी ,ये आपके घर के दरवाज़े पर कुछ लिखा था ..हां ...जी आया नूँ ! इसका क्या मतलब हुआ जी ?" अरविंद जी ने जिज्ञासावश पूछा।
"ओ जी ,भाईसाब ..ऐन्दा मतलब है जी आपका स्वागत है ।हमारे पंजाबियों की बोलचाल में अक्सर कहते हैं "जी आया नूँ "।वैसे भी असि वड्डे दिल नाल सबदा स्वागत करने हां जी। समझ लो जी ऐ साडे संस्कार ने।" समर की माँ सुदेश जी ने मुस्कुराते हुए बताया और फिर पंडित जी को जल्दी से शादी की तारीख निकालने के लिए कहा।
इधर अरविंद जी समधियों की मिलनसार प्रवृति के प्रभाव में खोए मुस्कुरा रहे थे और उधर पंडित जी बच्चों की ज़िंदगी के भविष्य की कुंडली मिलान में गणना कर रहे थे।अचानक अरविंद जी से गोत्र पूछते ही पंडित जी हक्के बक्के से दोनों पक्षों को देखने लगे।समर के माता पिता को अलग कमरे में ले जाकर पंडित जी ने वस्तुस्थिति से अवगत कराया।
"माफ़ कीजिये ,भाईसाब यह रिश्ता नहीं हो सकता।कुंडली मिल नहीं रही।"सुदेश जी ने कमरे से बाहर आकर कुछ उखड़े स्वर में अपना फैसला सुनाया।
"ऐसे कैसे ..मेरा मतलब कि अचानक यह सब कुंडली का न मिलना ?मैं समझा नहीं बहनजी।"घबराए स्वर में अरविंद जी ने पूछा ।
"न असि कोई झूठ बोल रहे ? आपकी न जाति मिले न गोत्र हमसे तो फिर कैसे रिश्ता हो सकता है ।"
"पर हम लोग अंतरजातीय विवाह के लिए तैयार थे तभी तो इस रिश्ते को लेकर आगे बढ़े न ।अब आप मना कर रहीं हैं ?"
"अंतरजातीय में कोई और जात होती तो हम सोच लेते पर आपकी निम्न जाति का हमसे कोई मिलान नहीं।अब हम आगे बहस नहीं करना चाहते ,आप यहाँ से जा सकते हैं।"
बेहद बेरुखी से आरुषि के परिवार को वहाँ से जाने के लिए कहा गया। समर ने बीच में आकर अपने माता पिता को समझाने का प्रयास किया पर उसे भी अपनी कसमें और ज़ायदाद से बेदख़ल करने की धमकी से चुप करा दिया गया।
समर की चुप्पी से आहत और अपमान का घूँट पीकर आरुषि ने अपने माता पिता का हाथ थाम उन्हें वहाँ से चलने को कहा ।
भारी कदमों से घर से बाहर निकलते हुए अरविंद जी दो पल दरवाज़े पर रुके और अपनी पत्नी और बेटी के रोकने के बावज़ूद वापस घर के अंदर दाखिल हुए।
"हुन की हो गया ...वेखो जी ,जिन्नी मर्ज़ी वारी कह लो ,ऐ रिश्ता नहीं हो सकदा।समझ लो तुस्सी बस ।"सुदेश जी ने उन्हें वापिस आया देख एक बार फिर अपने फैसले से अवगत करवाया और गुस्से से चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
"बहन जी , आप चिंता न करो।हमें समझ आ गया है और आपसे अब हम खुद रिश्ता जोड़ना भी नहीं चाहते।मैं तो बस यह कहने आया था कि आपने जो यह घर के बाहर "जी आया नूँ "का बोर्ड लगवाया है न उसे उतार फेंकिये क्योंकि आपसे अपने बेटे की खुशी का स्वागत नहीं किया गया ,आप किसी और का स्वागत क्या करेंगी ? "
अरविंद जी ने बाहर आकर एक उचटती सी नज़र से ऊंचाई पर लगे उस बोर्ड को देखा और अपनी बेटी हाथ थाम लिया।उन्हें फ़ख्र था कि उनका आत्मसम्मान उस बोर्ड पर लिखी सोच और किसी भी जाति से कहीं अधिक बड़े थे।
-------------
आपका स्वागत और आभार...
संपादक
--------------------
शैलेश तिवारी
जी आया नूँ
घर में निस्तब्धता को तोड़ती केवल कुछ सिसकियाँ थी जो आज बन्द कमरे से बाहर सुनाई दें रहीं थीं।बाहर हॉल में अरविंद जी पत्नी के साथ खामोश बैठे अपनी बेटी के बाहर आने का इंतज़ार कर रहे थे।सोच रहे थे ,अच्छा ही है कि मन का ग़ुबार निकल जाए बच्ची का।आजकल के बच्चे ज़िन्दगी को जितना आसान लेकर चलते हैं ,उतनी आसान वह है नहीं।आँखों के कोरों से बहते आँसुओं को उन्होंने भी बह जाने दिया।अपमान के आँसूं बह ही जाएँ तो बेहतर हैं वरना बार बार दुखी मन को और दुखी करते हैं।डबडबाई आंखों से कुछ समय पहले घटित घटना को याद करते हुए उनके दुख और आक्रोश से हाथ पाँव काँप रहे थे।मालती जी उनके पास आईं और उन्होंने उनके हाथों पर अपना हाथ रख ,नम आंखों से ही धीरज रखने को कहा।दोनों के ही बेचैन मन न चाहते हुए भी घटना की पुनरावृत्ति करने लगे।
सुबह से ही आरुषि अपनी मनपसंद साड़ी के संग मनपसन्द ज़ेवर की मैचिंग बनाकर खुशी के आसमान पर उड़ रही थी।आज उसे समर के घर पर उसकी होने वाली सास ने बुलाया था ।सबके मिलने के प्रयोजन के सँग उनके विवाह की तारीख भी पक्की करनी थी।अरविंद जी होने वाले समधियों के पास पूरी तैयारी के साथ जा रहे थे ।एक ही तो बेटी है आरुषि ,सब लाड़ पूरे करने की उनकी हर सम्भव कोशिश रहती थी इसलिए उन्होंने बेटी की पसन्द समर पर भी अपनी रज़ामंदी की मोहर लगा दी थी।
एक आलीशान बंगले के बाहर जब उन्होंने अपनी गाड़ी खड़ी कि तो बेटी के भाग्य और भविष्य के लिए सन्तुष्ट हो गए।समर और आरुषि बड़ों के समक्ष बैठे मुस्कुराते झिझकते हुए से अपनी भावी ज़िन्दगी के सपनों में खोए थे।
"बहनजी ,ये आपके घर के दरवाज़े पर कुछ लिखा था ..हां ...जी आया नूँ ! इसका क्या मतलब हुआ जी ?" अरविंद जी ने जिज्ञासावश पूछा।
"ओ जी ,भाईसाब ..ऐन्दा मतलब है जी आपका स्वागत है ।हमारे पंजाबियों की बोलचाल में अक्सर कहते हैं "जी आया नूँ "।वैसे भी असि वड्डे दिल नाल सबदा स्वागत करने हां जी। समझ लो जी ऐ साडे संस्कार ने।" समर की माँ सुदेश जी ने मुस्कुराते हुए बताया और फिर पंडित जी को जल्दी से शादी की तारीख निकालने के लिए कहा।
इधर अरविंद जी समधियों की मिलनसार प्रवृति के प्रभाव में खोए मुस्कुरा रहे थे और उधर पंडित जी बच्चों की ज़िंदगी के भविष्य की कुंडली मिलान में गणना कर रहे थे।अचानक अरविंद जी से गोत्र पूछते ही पंडित जी हक्के बक्के से दोनों पक्षों को देखने लगे।समर के माता पिता को अलग कमरे में ले जाकर पंडित जी ने वस्तुस्थिति से अवगत कराया।
"माफ़ कीजिये ,भाईसाब यह रिश्ता नहीं हो सकता।कुंडली मिल नहीं रही।"सुदेश जी ने कमरे से बाहर आकर कुछ उखड़े स्वर में अपना फैसला सुनाया।
"ऐसे कैसे ..मेरा मतलब कि अचानक यह सब कुंडली का न मिलना ?मैं समझा नहीं बहनजी।"घबराए स्वर में अरविंद जी ने पूछा ।
"न असि कोई झूठ बोल रहे ? आपकी न जाति मिले न गोत्र हमसे तो फिर कैसे रिश्ता हो सकता है ।"
"पर हम लोग अंतरजातीय विवाह के लिए तैयार थे तभी तो इस रिश्ते को लेकर आगे बढ़े न ।अब आप मना कर रहीं हैं ?"
"अंतरजातीय में कोई और जात होती तो हम सोच लेते पर आपकी निम्न जाति का हमसे कोई मिलान नहीं।अब हम आगे बहस नहीं करना चाहते ,आप यहाँ से जा सकते हैं।"
बेहद बेरुखी से आरुषि के परिवार को वहाँ से जाने के लिए कहा गया। समर ने बीच में आकर अपने माता पिता को समझाने का प्रयास किया पर उसे भी अपनी कसमें और ज़ायदाद से बेदख़ल करने की धमकी से चुप करा दिया गया।
समर की चुप्पी से आहत और अपमान का घूँट पीकर आरुषि ने अपने माता पिता का हाथ थाम उन्हें वहाँ से चलने को कहा ।
भारी कदमों से घर से बाहर निकलते हुए अरविंद जी दो पल दरवाज़े पर रुके और अपनी पत्नी और बेटी के रोकने के बावज़ूद वापस घर के अंदर दाखिल हुए।
"हुन की हो गया ...वेखो जी ,जिन्नी मर्ज़ी वारी कह लो ,ऐ रिश्ता नहीं हो सकदा।समझ लो तुस्सी बस ।"सुदेश जी ने उन्हें वापिस आया देख एक बार फिर अपने फैसले से अवगत करवाया और गुस्से से चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
"बहन जी , आप चिंता न करो।हमें समझ आ गया है और आपसे अब हम खुद रिश्ता जोड़ना भी नहीं चाहते।मैं तो बस यह कहने आया था कि आपने जो यह घर के बाहर "जी आया नूँ "का बोर्ड लगवाया है न उसे उतार फेंकिये क्योंकि आपसे अपने बेटे की खुशी का स्वागत नहीं किया गया ,आप किसी और का स्वागत क्या करेंगी ? "
अरविंद जी ने बाहर आकर एक उचटती सी नज़र से ऊंचाई पर लगे उस बोर्ड को देखा और अपनी बेटी हाथ थाम लिया।उन्हें फ़ख्र था कि उनका आत्मसम्मान उस बोर्ड पर लिखी सोच और किसी भी जाति से कहीं अधिक बड़े थे।
-------------
परिचय
रश्मि तारिका मूलतः पंजाब का प्रतिनिधित्व करती हैं। आजकल गुजरात के सूरत शहर में रहकर साहित्य से जुड़ी रहती हैं। कहानी संग्रह कॉफी कैफे प्रकाशित हो चुका हैं आजकल एक बायोग्राफी पर काम कर रही हैं। समाज के सम सामयिक मुद्दों पर आपकी लेखनी बेहतर चलती रहती है। उन्होंने एमपी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी कहानी "वो दूसरा पत्र" प्रेषित की है।आपका स्वागत और आभार...
संपादक
--------------------
समीक्षा
"जी आया नूँ"...... लेखिका रश्मि तारिका की उस कहानी का शीर्षक है..... जो बंद कमरे की सिसकियों से शुरू होती है.... और खुले वातावरण की आह बन जाती है....। कहानी की रफ्तार एक ऐसी लय में चलती है.. जो अरविंद जी के आखिरी सुर पर.. इतनी बेहतरीन ताल मिलाती है कि.... मुखोटे में छिपे असली चेहरे सामने आ जाते हैं...। नकाब हटने के साथ ही... समाज की विसंगतियों पर भी कहानी सशक्त प्रहार करती है.... उम्मीद की जाना चाहिए कि... इन्हीं प्रहारों से... वो विसंगतियां, वो कुप्रथाएँ, वो परम्पराएँ... दरक जाएं.... जो बेड़ियों की तरह हम इक्कीसवीं सदी में भी... अपने पैरों में अपने ही हाथों से बांधे खड़े हैं...। ख़ैर चर्चा कथानक की ....अरविंद जी बिटिया आरुषि की खुशी के लिए.... उसकी पसंद समर को अपनाने को तैयार हैं.... तमाम तैयारियों के बाद समर के माता पिता.. होने वाले संबंध के बीच अचानक जाति की दीवार खड़ी कर देते हैं...। यह वह खाई है जो आज भी समाज को कई हिस्सों में बाँट रही है... वह भी नफरत की हद तक..। इसके अलावा कहानी... हमारे द्वारा दोहरा चरित्र जीने के मुखोटे को भी उतार फेकती है... जब समर की माँ अरविंद जी के पूछने पर , दरवाजे के बाहर लगे .....जी आया नूँ.... के बोर्ड का मतलब जानते हैं... बताया जाता है कि सबका स्वागत है.....। और समर के माता पिता के इंकार के बाद जब अरविंद जी कहते हैं कि.... अपने बेटे की खुशियों का स्वागत तो कर नहीं पाते.... आप क्या सबका स्वागत करोगे... उतार दीजिये इस बोर्ड को...। आज 20 मार्च को जब अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस है... उस मौके पर खुशियों को लौटा देने वाली कहानी पढ़ कर समाज की मानसिकता का पता चलता है। बात खुशी पाने की... लेकिन काम दुःखी होने के....। कथानक हमारी कथनी और करनी के अंतर को भी स्पष्ट करतवा है। पंजाबी पृष्ठ भूमि पर लिखी गई कहानी... बिना रुके पूरी पढ़कर.. जो सवाल जन्म लेते हैं... उन्हीं के जबाव की तलाश इस कहानी का संदेश माना जा सकता है...। शानदार कहानी के लिए.... जानदार बधाई.... रश्मि जी...।शैलेश तिवारी


Post A Comment: