लेखक 

एक सड़क हुई गुमशुदा  !!


दस साल बाद अपने गाँव लौटा बजरंगी... गाँव की खस्ता हालत देख कर दुखी था ..जबकि सरकारी आंकड़ों में झूमरी तलइया एक आदर्श ग्राम का तमगा रखता था ! ( इक्कीसवीं सदी में इसे स्मार्ट सिटी के नाम से जाना जाता है ) खैर .. कुछ ही महीनों में सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा कर वह समझ चुका था ..! यहां दाल में काला नहीं काली दाल है ।

नक्कार खाने में तूती की आवाज कोई नहीं सुनता !

सीधी उंगली से घी न निकलना था न निकला .. सो उसने उंगली टेढ़ी की ...मंजे बजरंगी थाने पहुंचे ....फिर जो हुआ .. आपके सामने है ।

दृश्य…..एक 

:दरोगा जी रपोट लिखिये 

:का हुआ बजरंगी ..हुआ क्या ?

:दरोगा जी ... हमारे गाँव की सड़क गुम हो गई है ..

:सड़क और गुम ? होश की दवा करो ... तुमरा दिमाग तो जगह पर है बजरंगी ..खुद फूटते हो यहाँ से या मैं फोड़ू ...!

:रिपोर्ट लिखो दरोगा जी ... झूमरी तलैय्या से थाने तक जो रोड बनी थी ....पूरी की पूरी चोरी हो गई है ! ...और सुनो ...भूलो मत अभी तक मैंने एल एल बी की डिग्री सरेंडर नहीं की है .. न ही अदालतें ऐतिहासिक स्मारक बनीं है ...याद रहे लाल किला भले ही राज दरबार का रसूख न रखता हो ..पर झंडा तो कभी भी फहराया जा सकता है ।....तुम सड़क चोरी की रपोट लिखो ।

(थानेदार ! और वकील का याराना साँप और नेवले सा है..कौन साँप और कौन नेवला ये वक्त फैसला करता है ।..सो दरोगा जी ने जिरह शुरू की !)

इधर बजरंगी ... को पता था ... बेसिर पैर का रोजनामचा ..ही न्याय का ऐतिहासिक दस्तावेज बनेगा .. कसाब हो या निर्भया के आरोपी जब तक दस साल सरकारी बिरयानी न खा लें ...न्याय की बक़रीद नहीं मनती !... अब न्याय के बकरे का "उठावना" चल पड़ा था ..अंतिम यात्रा पर ..इसलिये राम नाम सत्य है ...का मन्त्रर जाप तो होना ही था ..सो एक एक कर सारे जवाब दिये ..बजरंगी ने ।

उधर दरोगा ने हमेशा की तरह सवालों का लाठी चार्ज बजरंगी पर खोल दिया ..उनका अनुभव था ...आधे से जियादा कम्प्लेंट तो इस लाठी चार्ज से शहीद हो जाती हैं ..और जो दो चार बचती हैं ..उनको कोर्ट में लटका कर ख़त्म कर देते हैं ..और जो एकाध में फरियादी को न्याय मिलता है वही "सीप का मोती" है ..उसी न्याय के भरोसे न्याय व्यवस्था वेंटीलेटर पर जिंदा है ।

:बोलो बजरंगी ? कौन सी सड़क थी .. ? नाम क्या था ?

:जी सड़क का नाम था ..स्मृति रोड़

:कहाँ तक पढ़ी थी ?

:जी पढ़ी तो बारहवीं तक थी ..मगर डिग्री ग्रेजुएट की रखती थी ।

:सड़क के बाप का नाम .. ?

:बाप का नाम ... प्रधानमंत्री... ( सड़क योजना )
जी ..वो क्या है पढ़ाई लिखाई में वो बाप पे गयी थी !

:जितना पूछें उतना जवाब दो ..जियादा हुशियारी नहीं ...मतलब बाप दिल्ली में ..सड़क यहाँ ..फिर तो आवारा होगी ?

:नहीं ..पी डब्लू वाले साब लोकल गार्जियन भी थे ..उनके भरोसे छोड़ी थी ..

:जन्म तारीख बोलो .. ?

:जी .. छबीस जनवरी ..वर्ष के लिये सरकारी दस्तावेज दिखवाने पड़ेंगे ... 

:आखरी बार सड़क कब और किसके साथ देखी गयी थी ?

:दरोगा जी कल रात को देखी थी ....मैं रात में सड़क को सड़क पर छोड़ कर आया था ....सुबह मॉर्निंग वॉक के लिये उठा तो पैरों के नीचे से सड़क गायब थी ..!!

:नाबालिग थी .? रात में ही भागी होगी ?

:बालिग थी साब ! ..बीस साल से तो हम ही देख रहे थे हमरे साथ ही जवान हुई थी ..साथ साथ खेले हैं".... पले बढ़े हैं !

:किसी के साथ कोई विशेष मेल जोल था ?

:साब .. यूँ तो सबके साथ एक सा व्योहार था .दो चार गलियां उससे मिलती जुलती थी ...स्वाभाव एकदम .सर्वधर्म समभाव सा ..और खुद वैशाली की नगरवधू सी ...एक दम "सेकुलर" सड़क थी ... और और इधर उधर जाने का तो सवाल ही नही होता सीधी झूमरी तलैय्या से निकलती थी उधर थाने के पास जाकर चुपके से "हाइवे" से जाकर मिलती थी और मिलकर सीधी थाने से होती हुई वापिस झूमरी तलैय्या वापस आती थी ।

: ये थाने का नाम बार बार क्यों ले रहे हो ..और कैसी दिखती थी ?
: साहब ..थाने की नाक के नीचे से गायब हुई है .. तो नाम तो आयेगा ही बीच में ....औरर साब बला की सुंदर थी ! उसका सांवला चमकता रंग ..कसम से जब बल खाते हुए बाज़ार से निकलती थी तो अच्छे अच्छे उस सड़क पर मर मिटते थे ... !

:कोई लेटेस्ट फ़ोटो साथ लाये हो ?
:हाँ जी ... सारे धरने प्रदर्शन इसी सड़क पर होते थे प्रदर्शनकारियो का मालिकाना हक था सड़क पर ..मजाल है कभी उफ करी हो उसने । .. 

:मंजे कैसी दिखती थी यार ?
:साँवली थी ..उमर के साथ चेहरे पर थोड़े गड्ढे पड़ गये थे ..अपनी उमर में तो खूब सुंदर रही होगी ।

: कोई गवाह है ..सड़क के होने का ?

:है साब ...कहो तो मुख मंत्री से गवाही दिलवा दें ..तीन तीन बार मुख मंत्री बनाया है इसी सड़क ने उनको ......हाँ बताय देते हैं ..हमरे झुमरी तलैया में प्रजातन्त्र की शान हैं सड़क .... जे बिजली और पानी ... का सड़क से गठ बन्धन है ..ससुरे तीनो साथ चलते हैं .. जे सड़क देवी जिससे रूठी उसे सड़क पे अपने संग बिठा लिया ! ..और जिसपे मेहरबान तो समझो "गधा भी पहलवान " का समझे ।

: दरोगा जी बस करो ... के बी सी मत खेलो ...और सड़क को ढूंढो !

: ठीक है ... सड़क की गुमशुदगी की मुनादी करवा देते है ..चिंता मत करो ..सड़क को जिंदा या मुर्दा ढूंढ कर निकाल लेंगे ..अभी तुम जाओ ...!!

बजरंगी ..मन ही मन मुस्करा रहा था ..उसकी योजना कामयाब हो चली थी ।...

क्रमश :

दृश्य दो में आगे ...पढिये ..सड़क की बरामदगी और कोर्ट में चालान पेश ...!! आपकी पसन्दगी ही ...इस व्यंग्य को अंजाम तक पहुंचाएगी ...जिसमे पूरे भृष्टतंत्र को रंगे हाथों गिरफ्तार किया जायेगा ।

विनय चौधरी - भोपाल

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परिचय


विनय चौधरी जबलपुर मध्यप्रदेश के मूल निवासी  हैं। वर्तमान में भोपाल में निवासरत हैं। एमकाम तक शिक्षा प्राप्त , प्राइवेट संस्थानों मे सेवारत रहे हैं। लिखने का जुनून तो महाविद्यालयीन काल से रहा लेकिन 2013 से समसामयिक माहौल पर लेखन शुरू हुआ। आपकी व्यंग्य रचना सहित एमपी मीडिया पाइंट मे आपका स्वागत है।
संपादक
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