लेखक
ऐ मेरी, जोहरा ज़बीं...
वैसे तो लॉकडाउन के चलते यह तय हुआ था कि सोसाइटी के गार्डन में भी नहीं आयेंगे। रात जब घड़ी में 12 बजने की मुनादी होने को थी और नींद पूछ रही थी आऊँ क्या... झपकी ले रहा मोबाइल खांसा।देखा तो दास बाबू का संदेश था। लिखा था, ई कोरोना हिन्दुस्तानी नहीं है। चीन हमसे 2 घंटा और इटली 8 घंटा आगे है दिन निकलने में। कोरोना महाशय तबतक बाग बगीचों से भ्रमण करके दूसरे काम-धंधे में लग जाते होंगे। हम उधर ही योगा करके इम्यून सिस्टम को स्ट्रांग करेंगे। गुप्ता, शर्मा और वर्मा भी आयेंगे।
बात में वज़न देख ओके लिखकर भेज दिया।
सुबह साढ़े पांच बजे अलार्म के मुर्गे की बांग से जागकर मार्निंग कॉल अटैंड की और बूट-जुराब पा के आ गये गार्डन में।
कल से एक वाट्स एप परिभ्रमण में है जिसमें कुछ लोग चिंतित हैं कि अगर वो न रहे तो उनके आने वाली पीढ़ी को आज की बातें जो उस समय इतिहास बन जायेंगी, कौन सुनाएगा ? और वो पीढ़ी एक महत्वपूर्ण युग से अनभिज्ञ रह जायेगी। इसलिए मरना नहीं है। जिंदा रहना है।
आज इसी बासी कढ़ी को उबाल कर ताजादम करने की नीयत से गुप्ता ने मैसेज का पूरे मन व हाव-भाव से वाचन किया।
तिरोहित भाव था अभी न सोचो मरने का, के इतिहास अभी बना नहीं......
बंगाली आदतन खी खी कर हँसने लगा।
"ऐसे क्यों हँस रहे हो दादा..."?
"तूने जोकिच ऐसा सुनाया।"
"ये जोक नहीं है। सच्चाई है।"
गुप्ता ने ऐसे कहा जैसे पान की पावर कम होने पर चूने की उँगली चाटी जाये या थोड़ा जर्दा फांका जाये।
बंगाली दादा अभी भी मुस्कुरा रहा था। शरारत का घूँघट सरका कर बोला "मतलब साला जीना भी आने वाली नस्लों के लिए है। ओ अक्ल के बनिये, अगर ऐसा सोच लेने से ही मौत टल रही है तो डर क्यों रहा है। पोते-पोती न हुए इच्छा मृत्यु का प्रीमियम हो गये। भरो और पाओ सुविधा।"
"दादा... हर बात में मजाक। अरे ऐसा कहकर ही अगर लोगों को रोका जा सकता है घरों में तो अच्छा है न।"
" इस वर्मा से कहो न सारी बातें जिन्हें बताना चाहते हो अपनी अगली से अगली पीढ़ी को लिखकर रख दे कम्प्यूटर में। पढ़ लेंगे वो बच्चे और जान जायेंगे इतिहास।"
" और फिर कोई यह कहकर कि इतिहास गलत लिखा है, ऐसा था ही नहीं रोटी सेंकने लगा तो...." शर्मा इतनी देर में चार्ज हुआ पहली बार।
मैंने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की नीयत से अँगूठा ई-अटेंडेंस डिवाइस में डाल दिया यह कहते हुए, इस बात में ज्यादा दम है। इतिहास ही वो चीज है जिसके साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ के मामले दर्ज हैं।
जिसे बुजुर्ग खालिस सोने के गहने की सूरत में देकर गये थे सहेजने के लिए, उसे बदलते समय के फैशन के मुताबिक तुड़वा कर नई डिजाइन में गढ़वा लिया गया। इतनी बार टूट कर बना कि अब सोना रहा ही नहीं टांके का तांबा रह गया है।
"मतलब, हमको ही जीना होगा बताने के लिए।" गुप्ता जोश में भर गया था।
बंगाली की खुराफात रुकने के लिए कब होती है। मासूमियत से पूछा फिर "चल मान लिया बणिये तू जिंदा रह गया। सुनाने लगा कहानी अपने पोते को, ये पंडित भी तो रहेगा फिर। इसने कुछ जोड़ घटा दिया तो... मतलब इसके पोते और तेरे पोते का इतिहास तो अलग-अलग होगा न। क्यों दुश्मन बना रहे हो उन मासूमों को।"
पहली बार गुप्ता के चेहरे पर चिंता दिखी असली वाली। कुछ सोचते हुए बोला,"फिर क्या करें ? जिंदा रहने के लिए कुछ तो बहाना चाहिए।"
"अरे मूर्ख! जिंदा रहने के लिए बहानों की नहीं साँसों की जरूरत होती है। साँसें उस तेरे से बड़े बनिये की बही में लिखी हैं हर किसी की। कैसे बदलेगा... बता... तेरा हिसाब कोई बदल पाया कभी...." ।
इस बार गुप्ता नर्वस हो गया। निराशा उसके माथे पर तेल लगी लट सी लटक गई।
बंगाली दादा ने उसकी हालत देखी और गंभीरता से कहा,"तू तो अभी से मर गया। अरे मेरे कहने का मतलब समझ। साँसें फिक्स हैं। मगर उनपर ब्याज तो आरबीआई के निर्देशानुसार घटता-बढ़ता है। उसे बढ़ा। जितना ज्यादा ब्याज उतनी ज्यादा साँसें.... समझा।"
"नही समझा। ब्याज कैसे बढ़ाऊँ...." ।
"डरना छोड़। जीना सीख। पोते-पोतियों के लिए नहीं, खुद के लिए। उनके लिए तूने जो दौलत जोड़ ली है वही काफ़ी है। इतिहास बताने का काम समय पर छोड़ दे। अब हर पल जिया कर जी भरकर। रहा ब्याज बढ़ाने का तो, जॉगिंग कर, हेल्दी डाइट ले। हल्का खाना खा, एंटी आक्सीडेंट, विटामिन सी वाला। पानी ज्यादा पी और जम कर सो.... भाभी से इश्क लड़ा।"
"दादा... आप भी। अब इश्क़... इस उम्र में.... "
"अबे इतिहास बताने के लिए उम्र चाहिए। इश्क़ के लिए फिर कैसा बंधन। और इश्क़ का मतलब कौन सा फरहाद बनकर पहाड़ तोड़ने का कह रहा हूँ... भाभी जब नहा धोकर शृंगारदान के सामने कंघी-बिंदी करे, देखना और कान पे हाथ रखकर, जमीन पर बैठकर गाना "ऐ मेरी.. जोहरा ज़बीं ! तुझे मालूम नहीं !! तूअभी तक है हँसी और मैं जवान......"
देखना फिर, सचमुच जवान वाली फीलिंग आयेगी।
एक जोरदार ठहाके के साथ सभा विसर्जित हुई, कल फिर यहीं, कोरोना के जाने के बाद और आने के पहले मिलने के वादे के साथ।


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