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शहर लॉकडाउन है, सोच खुली रखें



जिस शहर को हमेशा जागता.. भागता देखा है, वो अलसाया, उनींदा और ठहरा हुआ अच्छा नहीं लगता। शकील बदायूंनि ने बैजू बावरा का गीत "महल उदास और गलियां सूनी, चुप-चुप हैं दीवारें".... इसी दिन के लिए लिखा था जैसे। 
चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा है। अमित बालकनी की रैलिंग पर टिका देख रहा है नजारा घर के सामने वाली सड़क का। 
इक्का-दुक्का वाहन दिख रहे हैं, कर्फ्यू की तरह। रोज़ की तरह न चहल-पहल है न फुटपाथ की कुर्सी, बैंच पर जमघट है मार्निंग वॉक वालों के इंटरवल में जो लगता है। 
मोटू खन्ना का अपने जर्मन शैफर्ड का बेल्ट पकड़े लुड़कते आना। उनके दोस्त की चुटकी 'सुबह-सुबह गधे के साथ....' 
ओए अक्ल के अंधे... गधा नहीं कुत्ता है.... 
'मैंने कुत्ते से पूछा है... तू क्यों भड़क रहा है।' 
उन्मुक्त हँसी, ताजी हवा और झील का किनारा मिलकर दिन की खुशनुमा शुरुआत करते थे। 
सुधा चाय लेकर वहीं आ गई। कल तो जनता कर्फ्यू था, आज भी.... उसने सुनसान सड़क देख कर कहा। 
कल एयरपोर्ट पर कोरोना +टिव लड़की मिलने के बाद 31 मार्च तक लॉकडाउन के आदेश हो गये हैं। आफिस बंद हैं, घर से काम करना है। सिर्फ़ जरूरी चीजें मिल सकेंगी.... 
हे भगवान! कैसे होगा... कल देखा था। कैसे लोग झुंड में बाहर आ गये थे सड़क पर। जश्न देखकर लग रहा था जैसे एक दिन घर में रहकर और 5 मिनट के बजाओ ड्रिल से कोरोना को अपास्त कर दिया है। 
सुधा! Pandemic (वैश्विक महामारी) का इलाज सम्भव है मगर Stupidity का कोई इलाज नहीं है। ये लोग कोरोना से बड़े वायरस हैं।
सारी दुनिया में कहर बरस रहा है, सरकार कह रही है कि सोशल डिस्टेंसिंग ही उपाय है बचने का फिर भी हम नहीं समझ रहे हैं। इन बेवकूफों की गलत हरकत का खामियाजा न जाने कितने मासूम भुगतेंगे।

"जैसे उस 'कोरोना डॉल' के सम्पर्क में आये लोग भुगत रहे हैं..." सुधा ने कहा।

शहर पे शहर बंद किया जा रहा है। किसलिए? इसीलिए न कि यह संक्रमण फैलने से रोका जाये। लेकिन अकेले प्रशासन कुछ भी नहीं कर सकता। जब तक पब्लिक स्वयं अपनी सुरक्षा नहीं करती, मौत दबे पाँव करीब आती जायेगी। नहीं समझ आ रहा है तो इटली की हालत देखो... विश्व में दूसरा स्थान है इटली का स्वास्थ्य सुविधाओं की फेहरिस्त में। वहाँ जगह कम पड़ रही है शवों को दफनाने के लिए। 
हम उसी सूचि में 112 वें स्थान पर हैं। सोचो यह महामारी अगर अपनी विकरालता के चरम पर पहुँची तो क्या होगा। अमित के चेहरे पर दर्द से ज्यादा खौफ़ दिख रहा है बताते हुए।

मतलब... हम भी..... अब वही भय सुधा की आवाज़ में आ गया है।

बिल्कुल नहीं। इसीलिए तो यह इंतजाम किए जा रहे हैं। संयमित रहें, श्यानपंती न दिखायें। खुद को घर में रखकर अपने आप पर अहसान करें न कि दूसरों पर। खुद पर किया यह अहसान इस वक्त पूरे देश व मानवता पर अहसान है।

अमित... आपको लगता है ये मानेंगे....

सुधा, न मानने का तो विकल्प है ही नहीं। जब प्यार से नहीं समझेंगे तब उनको समझ आने वाली भाषा का प्रयोग किया जायेगा। सरकार व प्रशासन सक्षम है। जब डंडा बोलेगा तो भूत भी मानेंगे, इंसानों की बिसात क्या.... मगर तुम क्यों इतनी नर्वस दिख रही हो। अरे भाई शहर लॉकडाउन है, सोच को खुला रखो। जैसा कहा जा रहा है बस वही करो। न अभाव में जिओ न किसी के प्रभाव में रहो। कोई भी नहीं बचा पायेगा जब फैलेगी यह महामारी... कोई रहे फिर कुछ संभव नहीं होगा।

डरा भी रहे हो और कहते हो कुछ नहीं होगा। कैसे खुली रखें सोच अब और क्या करें..... सुधा ने फिर पूछा।

क्या करें.... वही जो तब करते थे जब  इससे भी बड़ी महामारी की चपेट में आये थे हम....

कौन सी महामारी की बात कर रहे हैं आप... सुधा ने हैरानी से पूछा।

वही... दुनिया जिसे इश्क़ कहती है। अमित ने शरारत से कहा।

आप भी.... क्या करते थे तब.... सुधा का चेहरा सुर्ख हो गया बोलते हुए....

वही गाना सुनाओ जिसे सुनकर मेरा दिल धड़कने लगा था मेरी जूली.....

सुधा खिलखिला उठी। माहौल की बोझिलता उस ठहाके से डर कर भाग गई। 
सुधा हेडफोन लगा कर कराओके में गा रही है - 
माय हार्ट इज़ बीटिंग... 
कीप्स आन रिपीटिंग... 
आय एम वेटिंग फॉर यू....

गिटार की कमी फर्श का पोंछा कर रहा है पूरी। 
ऐसे ही हारेगा कोरोना, घर में झाड़ू - पोंछा उठाकर जश्न मनाइये, झंडा लेकर सड़क पर आने का समय नहीं है यह। जब आयेगा, कोई नहीं रोकेगा तब। 
©मुकेश दुबे
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