लेखिका
" अग्नि परीक्षा की घड़ी आ गई है। अगर तुम पतिपरायण , कर्तव्यनिष्ठ रही हो तो इस परीक्षा को उत्तीर्ण करो।" नेपथ्य से आवाज आई।
सबको नमन करती हुई औरत ईश्वर का ध्यान कर अग्निकुंड में उतर गई।
" ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति है औरत। अपनी खुशियों के लिए नहीं दूसरों की खुशियों के लिए जीवन मिला है तुम्हें।", पोथियों और मालाओं को संभाले तेजस्वी वर्ग ने शिक्षा दी और नारी खुशी-खुशी बलिवेदी पर चढ़ गई। हर तरफ से गूंजती जय-जयकार की आवाजों में नारी की आवाज दब कर रह गई।
" पुरुष गलत नहीं होता। नारी को पुरुष की आज्ञा शिरोधार्य करनी चाहिए। सृष्टि के संतुलन का यही नियम है।", अपने अधिकारों के लिए सजग होकर खड़ी औरत को उसी के आस- पास की औरतों ने ही हाथ पकड़ कर गिरा दिया।
" तुमने प्रेम नहीं, पाप किया है। बलात्कार के लिए तुम ही उकसाती हो। अपनी आंखें नीची करो क्योकि दोषी तुम ही हो।", प्रेमी, पति और अपने गुनहगारों को एक जैसे चेहरों वाली भीड़ में शामिल होते देख विस्मय और दुख से औरत मर गई।
" बस, अब बहुत हुआ।", सदियों से चुप औरत को देखकर वह चुप न रह सकी और उसने रुढियों की चादर के टुकड़े- टुकड़े कर के उड़ा दिये।
विगत तीन सालों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। लेखिका और कवियत्री के रूप में आप एक ख्यातनाम हस्ताक्षर हैं। विभिन्न साहित्यिक सम्मानों से आप सम्मानित हैं। शीर्षक साहित्य परिषद की उपसचिव हैं और परिषद की गतिविधियों को नियमित संचालित करते हुए युवा हस्ताक्षरों को आगे लाने में आप महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह सफलता पूर्वक कर रही हैं। एम पी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
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तुमने प्रेम नहीं, पाप किया है। बलात्कार के लिए तुम ही उकसाती हो। यह तो आज के कलियुग में हम अपने चारों तरफ घटते हुए देख ही रहे हैं। महिला ही महिला की शत्रु बनने के कई किस्से सबने ही सुन रखे हैं या पढ़ रखे हैं। सच में युग कोई भी रहा हो नारी की स्थिति न पहले बदली थी न आज बदली है। अगर इसको कोई बदल सकता है तो वो खुद नारी है...। जब वह रूढ़ियों को तोड़कर बाहर निकलती है तो पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर वह पुरुष के एकाधिकार वाले सारे काम करते हुए अंतरिक्ष की यात्रा तक कर लेती है... कल्पना चावला की तरह...।
बहुत बहुत बधाई... मेघा जी... और आपके बहाने पूरी आधी आबादी को....आज के दिवस की..।
शैलेश तिवारी संपादक
क्योंकि तुम औरत हो
" अग्नि परीक्षा की घड़ी आ गई है। अगर तुम पतिपरायण , कर्तव्यनिष्ठ रही हो तो इस परीक्षा को उत्तीर्ण करो।" नेपथ्य से आवाज आई।
सबको नमन करती हुई औरत ईश्वर का ध्यान कर अग्निकुंड में उतर गई।
" ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति है औरत। अपनी खुशियों के लिए नहीं दूसरों की खुशियों के लिए जीवन मिला है तुम्हें।", पोथियों और मालाओं को संभाले तेजस्वी वर्ग ने शिक्षा दी और नारी खुशी-खुशी बलिवेदी पर चढ़ गई। हर तरफ से गूंजती जय-जयकार की आवाजों में नारी की आवाज दब कर रह गई।
" पुरुष गलत नहीं होता। नारी को पुरुष की आज्ञा शिरोधार्य करनी चाहिए। सृष्टि के संतुलन का यही नियम है।", अपने अधिकारों के लिए सजग होकर खड़ी औरत को उसी के आस- पास की औरतों ने ही हाथ पकड़ कर गिरा दिया।
" तुमने प्रेम नहीं, पाप किया है। बलात्कार के लिए तुम ही उकसाती हो। अपनी आंखें नीची करो क्योकि दोषी तुम ही हो।", प्रेमी, पति और अपने गुनहगारों को एक जैसे चेहरों वाली भीड़ में शामिल होते देख विस्मय और दुख से औरत मर गई।
" बस, अब बहुत हुआ।", सदियों से चुप औरत को देखकर वह चुप न रह सकी और उसने रुढियों की चादर के टुकड़े- टुकड़े कर के उड़ा दिये।
मेघा राठी , भोपाल
------------------परिचय
मेघा राठी देश के दिल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की रहने वाली हैं।विगत तीन सालों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। लेखिका और कवियत्री के रूप में आप एक ख्यातनाम हस्ताक्षर हैं। विभिन्न साहित्यिक सम्मानों से आप सम्मानित हैं। शीर्षक साहित्य परिषद की उपसचिव हैं और परिषद की गतिविधियों को नियमित संचालित करते हुए युवा हस्ताक्षरों को आगे लाने में आप महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह सफलता पूर्वक कर रही हैं। एम पी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर... आधी आबादी का पूरा सच जैसा आलेख "क्योंकि तुम औरत हो" लेखिका ने लिखा है। इसमें काल गणना भले ही नहीं की गई हो लेकिन अग्नि परीक्षा की स्थिति यह रेखांकित करने के लिए काफी है कि त्रेता युग में सीता को अग्नि परीक्षा के माध्यम से ही अपनी पवित्रता सिद्ध करना पड़ी थी। ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति है औरत.... यह लाइन हमें सतयुग काल की देवहूति की स्मृति दिलाते हैं जिन्हें उनके पति कर्दम पुत्र कपिल के पास छोड़कर खुद वन को चले जाते हैं। यह वाक्य द्वापर की कुंती और द्रोपदी के प्रसंगों की याद भी दिलाता है। नारी को पुरुष की आज्ञा शिरोधार्य करना चाहिए... यह पंक्ति मुझे तो गांधारी की याद दिलाती है जो भीष्म के आदेश और पिता के आग्रह पर सर्वथा योग्य होते हुए भी धृतराष्ट्र जैसे जन्मांध को व्याह दी जाती है।तुमने प्रेम नहीं, पाप किया है। बलात्कार के लिए तुम ही उकसाती हो। यह तो आज के कलियुग में हम अपने चारों तरफ घटते हुए देख ही रहे हैं। महिला ही महिला की शत्रु बनने के कई किस्से सबने ही सुन रखे हैं या पढ़ रखे हैं। सच में युग कोई भी रहा हो नारी की स्थिति न पहले बदली थी न आज बदली है। अगर इसको कोई बदल सकता है तो वो खुद नारी है...। जब वह रूढ़ियों को तोड़कर बाहर निकलती है तो पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर वह पुरुष के एकाधिकार वाले सारे काम करते हुए अंतरिक्ष की यात्रा तक कर लेती है... कल्पना चावला की तरह...।
बहुत बहुत बधाई... मेघा जी... और आपके बहाने पूरी आधी आबादी को....आज के दिवस की..।
शैलेश तिवारी संपादक


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