आजादी के पहले से लेकर आजादी के कुछ सालों बाद तक मीडिया के नाम पर सिर्फ अखबार हुआ करते थे और इस दौर में प्रेस की भूमिका एक मिशन की तरह रही। नागरिकों की नजरों में पत्रकार का पेशा सम्मानीय हुआ करता था और जो घर फूंके अापना साथ हमारे होय..... की कबीर वाली सूक्ति को जिया करता था वो खबरनाबीस...। देश को आजादी मिली तो स्थाई विपक्ष की भूमिका को भी पत्रकार ने सहर्ष स्वीकार किया। 
वक्त बदलने के साथ मीडिया में पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रवेश भी हुआ और धीरे धीरे मीडिया एक प्रोफेशन भी बन गया। फिर सोशल मीडिया और बेब मीडिया ने भी अपनी जगह बनाई और पीत पत्रकारिता के साथ साथ चाटुकारिता के दौर में मीडिया प्रवेश कर गया। अखबारों की विश्वनीयता का इस दौर में बने रहना राहत देता रहा और पत्रकारिता को जीने वालों के लिए ओक्सिजन भी बना रहा। इस बेहाल से दौर में कस्बे नुमा शहर सीहोर में नवगठित प्रेस क्लब के सदस्य खड़े होते हैं उस घर के लिए जिसके सपने कुछ ही घंटों में खाक हो गए थे। हकीकत की कठोर और पथरीली जमीन पर उन आँखों में केवल आँसू थे। यही पर एक और पत्रकार योगेश उपाध्याय का जिक्र करना लाजिमी है जिसने खडा किया था ऊँगली डॉट कॉम नाम का एक सोशल ग्रुप....।  उद्देश्य केवल तंत्र में सुधार के लिए ऊँगली करना ही रहा होगा शायद...। लेकिन ऊँगली दिखाना, ऊँगली करना, ऊँगली उठाना, ऊँगली से इशारे करना, जैसे तमाम मुहावरों में से इस ग्रुप ने शनैः शनैः अपना उद्देश्य बना लिया ऊँगली थमाना.... उन मजबूर और बेसहारा लोगों को, जिन्हें किसी सहारे की जरूरत थी अलग अलग रूप में। कड़कड़ाती ठंड में सुबकते गरीबों को गर्म कंबल ले जाकर देना या फिर किसी जरूरतमंद को उसके ग्रुप का खून उपलब्ध कराने जैसे सराहनीय काम को बखूबी अंजाम दिया। इनके साथ ही खड़ी थी संडे के शुकुन की टीम...। 
बीते एक मार्च को रात में गेस सिलेंडर में लीकेज की वजह से एक ऐसा भीषण अग्निकांड घटा शहर की देवनगर कालोनी में कि, उस घर में दो बेटियों की शादी की तैयारियां चल रही थी। सपने अपने पूर्ण यौवन पर घर में खुशियों की महक महका रहे थे। लेकिन सपने अपने कहाँ हो पाते हैं, ऐसा ही इस घर में भी हो गया...। राख हो गया सपनों का महल....। प्रेस क्लब और ऊँगली डॉट कॉम ग्रुप ने पहल की पीड़ित परिवार की खुशियाँ लौटाने की..... एक अपील हुई... और कारवां बनता गया.... पीड़ित परिवार की सहायता के लिए लोग आगे बढे... और ऐसे बढे..... कि पंक्तियाँ लिखे जाने तक भी कोई न कोई, किसी न किसी चीज की घोषणा करता हुआ या नकद राशि की सहायता के लिए आगे आते रहे। पहले दो बिटियाओं का विवाह होना तय था लेकिन अब एक ही बेटी का विवाह किया जाएगा आने वाली.... 26 अप्रेल को....। पूरा शहर बनेगा घराती और जोरदार अगवानी होगी बराती की....। खाक में मिले सपनों के बाद बची तन्हाई.... एक बार फिर से शहनाई की गूँज से तोड़ने की तैयारी.... नगर के दान दाताओं ने कर ली है...। यह एक ऐसा खुशनुमा अहसास है उस दौर का... जब आदमी को अपने से फुर्सत नहीं मिल पा रही है और रक्षा नगर की बिटिया बन गई....। उसकी विदाई में अब न जाने कितनी आँखें नाम होंगी...। यह है उस सामाजिक एकता का उदाहरण.... जिसके लिए ईश्वर ने मानव को मानव बनाया....। अब वह पूरी तरह आश्वस्त है कि उसने सीहोर शहर में इंसान के साथ जो इंसानियत दी थी, वो जिंदा है और लोगों के दिल में धड़क भी रही है।
शैलेश तिवारी 
Share To:

Post A Comment: