लेखिका 

विजया पाठक

मध्यप्रदेश की राजनीति में बुधवार को हुए हाई बोल्टेज ड्रामे में एक बार कमलनाथ सरकार की किरकिरी हुई। इससे पहले भी उनके ही सहयोगियों के कारण सरकार घिरती और गिरती-फिरती नजर आयी। यानि सरकार के कप्तान सीएम कमलनाथ, सरकार चलाने में नाकामयाब साबित हो रहे हैं। लेकिन बुधवार को हुए घटनाक्रम में तो सरकार के सहयोगियों की नाराजगी और असंतोष चरम पर था। हालांकि फिलहाल तो स्थिति संभल गयी है लेकिन प्रदेश की राजनीति का सियासी संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। इस सरकार को पिछले 14 महिने से बचाए रखने में यदि सबसे बड़ा योगदान है तो वह दिग्विजय सिंह हैं। अगर दिग्वि‍जय सिंह अपनी ओर से प्रयास न करें तो यह सरकार कब की गिर गई होती। हाल ही में घटनाक्रम में भी दिग्विजय सिंह सरकार में संकट मोचक साबित हुए। सीएम कमलनाथ से लेकर किसी को मालूम ही नही था कि अंदरूनी राजनीति में क्या चल रहा है। सिर्फ दिग्विजय सिंह जानते थे कि आगे क्या होने वाला है, इसीलिए उन्हें  राजनीति‍ का चाणक्य  कहा जाता है। पिछले 14 माह में ऐसे कई मौके आए जब सरकार, कांग्रेस नेताओं और अन्य समर्थित विधायकों के चलते डगमगाती नजर आयी। अब सरकार के प्रति गुस्सा और नाराजगी चरम पर है। जिसका नमूना कांग्रेस के विधायक हरदीप सिंह ने इस्‍तीफे के रूप में देख सकते हैं। डंग ने अपने इस्तीफे में सीएम कमलनाथ और मंत्रियों की तरफ से हो रही उपेक्षा का जिक्र किया है। डंग ने ये इस्तीफा सीएम और विधानसभा अध्यक्ष को भेजा है। डंग का इस्‍तीफा प्रदेश की राजनीति में बड़ा भूचाल लेकर आयेगा। डंग ने सरकार पर गंभीर इल्‍जाम लगाते हुए कहा कि मेरे कोई काम नही होते हैं और सरकार में बैठे दलाल भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हैं।  उन्‍होंने अपने इस्‍तीफे में लिखा कि 14 माह बीत जाने के बाद भी विधानसभा क्षेत्र एवं संसदीय क्षेत्र में लगातार मेरी उपेक्षा की जा रही है। ताज्जुब की बात है कि सरकार के अंदर और बाहर इतना बवाल मचता रहता है और मुख्यमंत्री कमलनाथ, सरकार को संभालने के बदले अपनी हैकड़ी और अकड़ में मगरूर रहते हैं। प्रदेश के इतिहास में पहले सीएम हैं जो अपने ही सहयोगियों की नाराजगी को दूर नहीं कर पा रहे हैं और सरकार को संकट में खड़े किए हुए हैं। कांग्रेस नेता आज भले ही ये दावा कर रहे हो कि यह पूरी नौटंकी बीजेपी की थी, लेकिन सवाल उठता है कि जब सरकार के सहयोगियों में नाराजगी नही होती तो वह बीजेपी का साथ देने में क्यों राजी होते। कहीं न कहीं उनमें आक्रोश है, सरकार के प्रति असंतोष है। शायद जिसका फायदा, बीजेपी लेना चाहती है। कुल मिलाकर कमलनाथ सत्ता और संगठन दोनों को संभालने में नाकामयाब हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में एक बार फिर सरकार भीषण संकट में है। मैं ये नही मानती कि इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी का कोई रोल नहीं था। बीजेपी का रोल था, लेकिन मैं ये भी जानना चाहती हूँ कि बीजेपी को ये मौका किसने दिया। यदि सकरार में सब ठीक होता तो क्या इतने सारे विधायक बीजेपी के साथ होते, बिल्कुल नहीं। सत्ता  और सियासत में कोई उसूल नही होता। कब कौन किसके साथ हो जाए, कहां नहीं जा सकता। जरूरत सिर्फ इतनी होती है कि जो साथ हैं, जो सहयोगी हैं और जो स‍मर्पित हैं उन्हें संभालना पड़ता है। सत्ता के इस खेल में जिसने संभालना सीख लिया समझ लो उसने सिंहासन जीत लिया। राजनीति में सारा का सारा खेल संभालने का है। शायद कमलनाथ जी संभाल पाते तो उनकी सिंहासन डगमगाती नही। खैर अभी संकट टला नही है, उन्हेंं भविष्य की लकीर खींचना है तो अपने आप को बदलना होगा। व्यवहार और आदतों में बदलाव लाना होगा। नहीं तो एक दिन उनकी कथनी और करनी की सजा प्रदेश कांग्रेस को भुगतनी पड़ेगी।
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