शैलेश तिवारी 


नए युग का करें स्वागत..... 


पंडित जी ब्रह्म मुहूर्त में ही जाग कर जुट गए थे... आज को खास बनाने के लिए..। नित्य कर्म से फ़ारिग होकर... नलकूप का बटन दबाकर... ताज़ा पानी आने का इंतजार करने लगे... कुछ  ही सेकेंड में बाल्टी जल से पूर्ण हो गई..। प्राची की लालिमा उदघोष कर रही थी... नव संवत्सर के भुवन भास्कर के उदय होने का...। मंत्रोच्चार के साथ स्नान किया और यज्ञोपवीत भी बदला...। नहा धो कर तांबे के कलश में जल लिया, गंध और रक्त पुष्प से परिपूर्ण किया...। सीढ़ियां चढ़कर जब छत पर पहुंचे तो... नारंगी रंग का अर्द्ध सूर्य झांक रहा था पूर्व दिशा से..। मानो देख रहा हो.. कौन कौन उसके स्वागत को तैयार है.. जिन्हें उपहार में सौंपना हो.. ऊर्जा, उमंग, उत्साह और दिन भर तरोतज़ा रहने का खजाना ..। गिनती के ऐसे लोगों में शामिल पंडित जी ने भी..  ऊँ सूर्याय नमः.... के मंत्र के साथ अर्ध्य देना शुरु किया..।  जलधारा के बीच से रवि की रश्मियों की झिलमिलाहट.... जीवन का गीत गुनगुनाती लगी...। नीचे आकर पहले नित्य पूजा और बाद में नये पंचांग का विधि विधान से पूजन किया.. फल श्रुति का पठन किया....। तत्पश्चात नीम की कोपलों और काली मिर्च के मिश्रण से तैयार तीन छोटी छोटी गोलियों को पानी के साथ गटका...। कुछ देर खुद के अंदर की यात्रा को प्राणों को आयाम देते हुए प्रारम्भ किया...। साँसों को गुरु मंत्र के साथ साधने के बाद घडी पर नजर गई तो सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे...। तभी मोबाइल की घंटी घनघनाई... देखा तो अंकिता का वीडियो काल... फोन को कनेक्ट किया... तस्वीर उभरी एक युवती की... प्रणाम करते हुए उसने नव संवत्सर की बधाई दी..। पंडित जी ने भी यथायोग्य उत्तर दिया...। 
अंकिता ने कहा... गुरुदेव सरिता और कपिल को भी कनेक्ट कर लूँ...। 
ऐसा क्या हुआ अंकिता...। पंडित जी ने सवाल किया। 
आज हम सब की कुछ जिज्ञासायें हैं... जिन्हें आपको शांत करना है... अंकिता ने कहा..। 
अवश्य... जितना ज्ञान है... उसके अनुसार प्रयास करूँगा.. कि आपकी जिज्ञासायें शांत कर सकूँ...। पंडित जी ने जवाब दिया.। 
और कुछ ही देर में स्क्रीन पर पहले एक और युवती का... फिर एक युवक का चेहरा उभरा। पंडित जी को समझते देर नहीं लगी कि.. इन युवाओं ने पहले से यह सवाल - जवाब का कार्यक्रम तय कर रखा था..। 
सभी के एक दूसरे को नव वर्ष की बधाई का आदान प्रदान कर लेने के बाद कपिल की तरफ से पहला सवाल आया..... गुरुजी क्या है यह नव वर्ष... अभी एक जनवरी को तो मनाया था..। अब फिर से....? जान बूझकर सवाल को अधूरा छोड़ दिया उसने...। 
पंडित मेहता जी ने गंभीर होते हुए कहा... ईस्वी सन् का केलेंडर दिन और तारीख बताते हुए अपने पन्ने पलटते जाता है...। विक्रम संवत केवल दिन और तारीख ही नहीं बताता बल्कि आने वाले साल की सूरत और सीरत कैसी होगी... ये भी बताता है....। 
लेकिन ज्यादातर लोग तो उसको ही मनाते हैं...? सवाल सरिता की तरफ से आया..। 
मैं उस को नहीं मनाये जाने की बात नहीं कर रहा हूँ.. उसे भी मनाएं.. लेकिन मेरा इतना कहना है कि भारतीय संस्कृति उदारवादी है..। सभी को अपने में समाहित करने की ताकत है इसके पास.. लेकिन मौसी को इतना न पूजा जाए कि... माँ ही बेगानी हो जाए...। ईस्वी सन् अगर मौसी है तो... विक्रम संवत हमारी माँ...। भारतीय संस्कृति की जड़...। जड़ के बिना भी कोई वृक्ष... पल्लवित, पुष्पित और फलित हो पाया है क्या..? 
मेहता जी खामोश हुए तो तन्मयता से उनकी बात सुन रही अंकिता ने कहा.... और..? 
उसके एक ही शब्द में सवालों का पिटारा नजर आया मेहता जी को...। वह पुनः बोले ईस्वी सन् के केलेंडर... केवल काल का चक्कर है... जबकि विक्रम संवत का पंचांग काल ला चक्र बताता है... कौन सा ग्रह कि चाल से.... कि नक्षत्र के माध्यम से किस राशि पर भ्रमण कर रहा है...। काल, समय, पल, क्षण, निमिष, विपल, लव, कोष्ठ, आदि की सूक्ष्म से सूक्ष्म गणना सनातन काल की गणित से संभव है। यही सालों पहले बता देता है कि अमुक अंग्रेजी तारीख को चंद्र या सूर्य ग्रहण.. इतने समय से इतने समय तक प्रभावी रहेगा..। 
कुछ देर सांस लेने के लिए रुकने के बाद.. उन्होंने अपनी धीर गंभीर वाणी में अपनी बात जारी रखी.... काल की पूजा किए जाने की पद्धति हमारे पास है... महाकाल के रूप में काल यानि समय को ही पूजा जाता है... जिसे आज  का युग टाइम मैनेजमेंट कहता है..। 
रात बारह बजे साल के जश्न मनाने में बर्बादी ज्यादा है.. आचरण की, नैतिकता की, संस्कार की... लेकिन नव संवत.. इन्ही को पुष्ट करने का उत्सव है...। वह कुछ देर रुके..। 
सरिता ने बीच में ही अपना सवाल दाग दिया... लेकिन विश्व में मान्य तो आंग्ल वर्ष ज्यादा है...? 
पंडित जी ने गिलास के पानी से गला तर किया और बोले... यह सच है... क्योंकि इसमें दिनांक का घटना बढ़ना नही होता... इस वजह से याद रखना आसान होता है...। यह सोर्य वर्ष आधारित है... जैसे हमारा शक संवत... वह भी सूर्य पर आधारित है। विक्रम संवत चन्द्र पर आधारित है... इसलिए तिथी में घटना बढ़ना होता है...। इसके बाद भी यह बात याद रखने वाली है कि.. दुनिया के तमाम मापने वाले पैमानों को मिट्रिक प्रणाली में यानि उसकी इकाई को सौ के हिसाब में बदल देने वाला आधुनिक विज्ञान समय को... मीट्रिक प्रणाली में नहीं बदल पाया... इसकी इकाई आज भी साठ ही है। एक घंटा साठ मिनट का... मिनट साठ सेकंड का..। सप्ताह सात दिन का ही है... पूरी दुनिया में... इसको भी दस दिन का नहीं बनाया जा सका...। वार का उदय भी एक शानदार किस्से से है... जिसको फिर कभी विस्तार से बताऊंगा..। लेकिन काल गणना में पैमाना भारत का ही चल रहा है...। 
सरिता, अंकिता और कपिल ने एक साथ ताली बजाकर नई जानकारी का स्वागत और पंडित जी का आभार व्यक्त किया...।
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