लेखिका
सुनो!
क्या तुम बन सकते हो
मेरी
"आखिरी मंज़िल"
क्यूँ कि
आखिरी मंज़िल को पाने में
कभी कोई
विकल्प साथ नहीं देते!
और मैं तुम्हें
विकल्प की श्रेणी में रखकर
प्रेम को "आकर्षण" का नाम
देकर
खुद को या तुमको
भयभीत नहीं करना चाहती
पता नहीं
मैं नहीं जानती कि
ये बातें
सिर्फ़ कहने भर के लिए ही होती है
या फिर
इनकी अपनी एक बोली भी होती है?
और इनकी फैली ख्यातियां
कितनी सच साबित होती है
इसमें कुछ कहा नहीं जा सकता
पर हां,
मन की सुईयों ने
दिल को इस
आखिरी मंज़िल के बारे में बताया
उसने बताया कि
ये आखिरी मंज़िल
प्रेम की तरफ बढ़ने वाले क़दम है
आहिस्ता क़दम
जो चलते चलते छोड़ते है
कई निशां।
ये निशां
बेचैनी,इन्तज़ार
ख्व़ाब- ओ -ख्य़ाल
और मिलने की आस
के रूप में उभरते है
इनके उभरने में
छुपा रहता है
प्रेम।
तो क्या तुम बन सकते हो
अब मेरा आखिरी प्रेम
आखिरी मंज़िल
सुनो!
क्या तुम बन सकते हो
मेरी
"आखिरी मंज़िल"
क्यूँ कि
आखिरी मंज़िल को पाने में
कभी कोई
विकल्प साथ नहीं देते!
और मैं तुम्हें
विकल्प की श्रेणी में रखकर
प्रेम को "आकर्षण" का नाम
देकर
खुद को या तुमको
भयभीत नहीं करना चाहती
पता नहीं
मैं नहीं जानती कि
ये बातें
सिर्फ़ कहने भर के लिए ही होती है
या फिर
इनकी अपनी एक बोली भी होती है?
और इनकी फैली ख्यातियां
कितनी सच साबित होती है
इसमें कुछ कहा नहीं जा सकता
पर हां,
मन की सुईयों ने
दिल को इस
आखिरी मंज़िल के बारे में बताया
उसने बताया कि
ये आखिरी मंज़िल
प्रेम की तरफ बढ़ने वाले क़दम है
आहिस्ता क़दम
जो चलते चलते छोड़ते है
कई निशां।
ये निशां
बेचैनी,इन्तज़ार
ख्व़ाब- ओ -ख्य़ाल
और मिलने की आस
के रूप में उभरते है
इनके उभरने में
छुपा रहता है
प्रेम।
तो क्या तुम बन सकते हो
अब मेरा आखिरी प्रेम


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