लेखिका
चाहती थी तुझमे अपना मधुमास गूंथना
चाहती थी तुझ संग प्रीत के हिंडोले पर झूलना
चाहती थी तुझ संग पीली चदरिया ओढना
चाहती थी तुझमे ॠतुराज का हर रंग उंडेलना
चाहती थी तेरी चाहत को अपनी वेणी मे संजोना
और चाहत सिर्फ़ चाहत ही रह गयी
हर बरस ॠतुराज
कुछ अंगार ही डाल गया दामन मे मेरे
अब देख कितनी संजीदगी से हर अंगार
सुर्ख पलाश सा झुलसा रहा है
और वो देख दूर खडा ॠतुराज मुस्कुरा रहा है
बेबसी की जुबान पर उगते काँटे देखे हैं कभी……
वंदना गुप्ता
-------------------परिचय
वंदना गुप्ता जी दिल्ली से हैं और आपके7 कविता संग्रह , 2 उपन्यास, 1 कहानी संग्रह , 2 समीक्षा संग्रह ...इसके अलावा 28 साझा संग्रह प्रकाशित हो चुके है।
सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं तथा वैब माध्यमों आदि पर कहानी , कविता , समीक्षा और आलेख प्रकाशित एवं कविता कोष, हिंदी समय, भारतकोश पर कवितायेँ
सम्मिलित होती रही हैं। आप आल इंडिया रेडियो पर कई बार कविता पाठ कर चुकी हैं। आपको कई सम्मान भी मिले हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक


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