आलेख - डाॅ राजेश श्रीवास्तव (डी लिट)



वाल्मीकि रामायण में रावण पर विजय हेतु सूर्य की आराधना   की थी । बंगला कवि कृतिवास ने इसे अपनी रामायण में सात दिवसीय चण्डी आराधना   के रुप में बताया है । जिसमें राम ने 108 नीलोत्पल से देवी की आराधना   की । यह कथा शिव के चक्रदान पर आधारित कथा है जहाॅ विष्णु ने शिव से चक्र प्राप्त करने के लिए 10 कमल से आराधना  की थी । 
    राम ने शक्ति की आराधना  रावण के वध और सीता के उद्धार के लिये की थी । श्रीमददेवीभागवत, कालिकापुराण और कृत्तिवास रचित बॅगला रामायण के अध्ययन से  यह तथ्य स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि निराला की कविता के प्रेरणाग्रंथ यही हैं । शक्ति अर्थात देवी । महामाया महिषमर्दिनी भगवती मातृशक्ति की परिपूर्णतम चिन्मय प्रतीक हैं । श्री दुर्गाशप्तशती में देवताओं द्वारा देवी की स्तुति इस प्रकार की गई हैं - 
             हेतुःसमस्तजगतां त्रिगुणापि  
             दोषैर्न  ज्ञायसे  हरिहरादिभिरप्यपारा ।
             सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत
             मध्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ।।
  देवि ! आप सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति की कारणभूता हैं । आप में सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों हैं तो भी दोषों के साथ आपका संसर्ग नहीं जान पडता । भगवान विष्णु और महादेव आदि भी आपका पार नहीं पाते । आप ही सबका आश्रय हैं । यह समस्त जगत आपका अंशभूत है ,आप सबकी आदिभूता अव्याकृत परम प्रकृति हैं ।
            देवी की उपासना से रूप, जय और यश की प्राप्ति होती है । बॅगलासाहित्य के रामभक्त कवि कृत्तिवास ने अपनी सप्तकाण्डी रामायण के लंकाकाण्ड में राम के दुर्गोत्सव का विस्तार से वर्णन किया है । राम ने आश्विन शुक्लपक्ष में लंका में युद्ध करते समय रावण के विनाश और सीता के उद्धार के लिए जगदम्बा देवी शक्ति की आराधना की ।  राम ने देवी का स्मरण तब किया ,जब रावण से उनका विकट युद्ध हो रहा था । रावण वानरों का संहार कर रहा था और राम अपने आपको किसी हद तक निस्सहाय पा रहे थे । रावण रथ पर था और राम रथविहीन थे । इन्द्र के सारथि मातलि ने स्वर्ग से आकर उन्हें देवराज का रथ दिया । राम ने सर्वप्रथम रथ की परिक्रमा की फिर उस पर आरूढ हुए और रावण से घनघोर युद्ध करने लगे । 
              राम की शक्ति आराधना   की वास्तविक प्रस्तावना यहीं से आरंभ होती है । देवीआराधना   का क्रम यहीं से कृत्तिवास की रामायण में चित्रित किया गया है । रावण एक कुशल योद्धा था ,उसे युद्ध की नीतियाॅ आती थीं साथ ही देवी और शिव का भक्त भी था । वह इन्द्र के रथ को पहचान गया । लेकिन उसने संकल्प किया कि यदि मेरे प्राण इस बार बच गये तो मैं एक एक कर समस्त वानर सेना का नाश कर दॅूगा । उसने अपनी पूर्ण शक्ति से युद्धकर  राम के पक्षधरों के दाॅत खटटे करने आरंभ कर दिये । उसका भीषण रूप देखकर राम अत्यंत चिंतित हो गये । इधर रावण ने देवी का स्मरण किया और उनसे प्रार्थना की कि ...हे माॅ तारा ! आप दयामयी हैं , इस असमय में मेरी रक्षा कीजिये । संसार में मुझे अब किसी पर भरोसा नहीं है । शंकर ने भी मेरा त्याग कर दिया है । आप शक्ति ,मुक्ति और तृप्ति हैं । मेरे शोक का निवारण कीजिए । दयामयी देवी सहज प्रसन्न हो गयीं और रावण को अभयदान करने के लिये उसके रथ पर बैठ गई । रावण के रथ पर देवी को बैठा देखकर राम विस्मय में पड़ गए । उन्होंने माॅ को प्रणाम किया । राम को चिन्तित देखकर इन्द्र भी व्यथित हो गये । उन्होंने ब्रह्मा से उपाय पूछा । ब्रह्मा ने इन्द्र से कहा कि देवी आराधना  से ही रावण का संहार संभव है ।
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विशेष 

 आज जब नव संवत का आरंभ है... शक्ति की आराधना भी इसी दिन से शुरू होती है। जिसे हम चैत्र नवरात्रि के रूप में पूजते हैं। उन्हीं शक्ति के चंडी रूप की पूजा भगवान राम ने भी रावण से युद्ध करते समय की थी। इसी रहस्य को डॉ राजेश श्रीवास्तव शंबर लेकर आए हैं। शंबर जी हिंदी भाषा को लेकर कई ग्रंथों की रचना कर चुके हैं। आप रामायण केंद्र भोपाल के संस्थापक भी हैं। आपने रामायण पर केंद्रित देश विदेश में आयोजित कार्यशालाओं , चर्चाओं में न केवल सहभागिता की है वरन वहाँ से प्राप्त ज्ञान के खजाने को बाँटने के लिए स्थानीय स्तर पर भी कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
 राम की चंडी आराधना  का या आलेख हम दो भाग में आप तक पहुंचायेंगे...। चूंकि इस नवरात्रि का समापन राम नवमी को होता है। इस नजरिए से भी राम की चंडी आराधना इस मौके पर पढ़ा जाना ज्यादा प्रसांगिक हो जाता है। डॉ शंबर जी ने एम पी मीडिया पॉइंट के लिए यह विशेष आलेख भेजा है। आपका हार्दिक स्वागत है।
संपादक 
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