लेखक
मुक्ता क्लास फोर्थ में पड़ती थी उस दिन स्कूल में उसकी इंग्लिश टीचर बच्चों को हंसेल एंड ग्रेटेल, उन दो बच्चों की कहानी सुना रही थी जिनकी सौतेली माँ उनके पापा से जबर्दस्ती दोनों बच्चों को जंगल में छोड़ आने का कहती है, क्यूंकि घर में सबके पेट भरने जितना खाना नहीं था।
मुक्ता क्लास में बैठी बैठी खुदको हंसेल और ग्रेटेल की जगह महसूस कर रही थी, करीब एक साल पहले उसकी माँ उसे छोड़ कर तारा बन गई थी, यह कहते हुए दादी ने यह भी बताया था की आज शाम उसके पापा उसकी नई माँ लाएँगे, मुक्ता यही सोच कर दिन भर बेचैन होती रही कि उसकी सौतली माँ कैसी होगी, .....क्या वो उससे उसकी माँ जितना प्यार करेगी, ........या हंसेल और ग्रेटेल की तरह पापा से कह कर उसे जंगल में छुड़वा देगी।
वो स्कूल बस से घर लौटते समय में भी यही सोचती रही कि क्या माँ जैसा खाना देगी सौतेली माँ.......या माँ जैसे मेरे लिए चूड़ी, कंगन लाएगी क्या वो? ......इन्हीं ख्यालों में कब उसका बस स्टॉप आ गया उसे पता ही नहीं चला।
उस शाम वो अपने पापा के कमरे के बगल वाले कमरे में ही घुसी रही, सौतली माँ आयी तो दरवाजे से चिपक कर उसकी एक झलक देखी, बड़ी सी बिंदी लगाए, तनी भोहों के साथ उसका गोरा चहरा चमकता था, बहुत सुंदर पर तेज़ दिखती थी वो।
मुक्ता पापा के बार-बार बुलाने के बाद भी बाहर नहीं आयी, न किसी से बात की। रात को सपने में अपनी माँ को सौतली माँ के बारे में बताया उसने, बोली, माँ ये मेरी सोशल स्टडीज वाली टीचर की तरह बड़ी बिंदी लगाती है, वो टीचर बच्चों को बहुत मारती है माँ, मुझे बहुत डर लगता है उनसे, मुझे भी मारेंगी क्या ये? मुक्ता की माँ कुछ न बोली बस उसके माथे पर हाथ रख सपनों से ओझल हो गई।
दूसरे दिन भी मुक्ता बिना किसी से बात किए बस स्टॉप पर आ गई, पापा दौड़े-दौड़े उसका लंच बॉक्स देने आए तो उनसे भी कुछ न बोली, लंच बॉक्स लिया और बस में बैठ गई। इन्ही ख्यालों में लंच ब्रेक हो गया, बेमन से उसने अपना लंच खोला, दादी बीमारी की वजह से बिस्तर पकड़े थी तो पापा बाजार से पोहे खरीद रोज लंच बॉक्स में रख देते थे, रोज वही पोहे खा-खा कर ऊब गई थी मुक्ता।
पर आज उसके पिंक लंच बॉक्स में घी से बने पराठे चमक रहे थे, एक खन में छोटी छोटी कटी भिंडी और दूसरे में स्लाइज़ किए टमाटर रखे थे, बगल में बैठी चिंकी के मुँह में भी पानी आ गया, आज पूरे एक साल बाद मुक्ता ने स्कूल में माँ के भेजे लंच जैसा खाना खाया, पराठे खत्म हुए तो देखा लंच बॉक्स के एक कोने में टिशू पेपर लपटा रखा था, खोला तो मुक्ता की आँखें चौन्धिया गईं, पेपर में लपटी रखी थी मुक्ता की पसंद की खोपरे वाली मिठाई और पेपर पे लिखा था....
आपकी सौतेली नहीं,......नई माँ....। मुक्ता के सर पर रखा सारा बोझ इन दो शब्दों ने हटा दिया।
परिचय
जयंत दासवानी.... सीहोर मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। आप शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े होने के साथ साथ एक अंग्रेजी दैनिक के लिए पत्रकारिता भी करते हैं और समय समय पर साहित्य की सेवा भी....। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचनाएँ लिखते रहते हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है...।
संपादक
--------------
कहानीकार ने इस कथानक में सौतेली माँ के प्रति बने उस प्रतिबिंब को तोड़ा है जो अधिकांशतः सभी के मन में समाया हुआ है। वक्त की क्रूरता की वजह से दूसरा विवाह का निर्णय पूर्व संतान के प्रति हमेशा गलत ही होगा, यही बात कहानी भी कह देती है। बहरहाल एक बढ़िया कथानक को गढ़ने के शब्द शिल्पी लेखक को बधाई... इसलिए भी कि कथा का प्रवाह बना रहता है... पाठक का मन भटकता नहीं है। कथा सीधे और सरल शब्दों में अपने अर्थ भाव के साथ खुद कह जाती है....।
नई माँ
मुक्ता क्लास फोर्थ में पड़ती थी उस दिन स्कूल में उसकी इंग्लिश टीचर बच्चों को हंसेल एंड ग्रेटेल, उन दो बच्चों की कहानी सुना रही थी जिनकी सौतेली माँ उनके पापा से जबर्दस्ती दोनों बच्चों को जंगल में छोड़ आने का कहती है, क्यूंकि घर में सबके पेट भरने जितना खाना नहीं था।
मुक्ता क्लास में बैठी बैठी खुदको हंसेल और ग्रेटेल की जगह महसूस कर रही थी, करीब एक साल पहले उसकी माँ उसे छोड़ कर तारा बन गई थी, यह कहते हुए दादी ने यह भी बताया था की आज शाम उसके पापा उसकी नई माँ लाएँगे, मुक्ता यही सोच कर दिन भर बेचैन होती रही कि उसकी सौतली माँ कैसी होगी, .....क्या वो उससे उसकी माँ जितना प्यार करेगी, ........या हंसेल और ग्रेटेल की तरह पापा से कह कर उसे जंगल में छुड़वा देगी।
वो स्कूल बस से घर लौटते समय में भी यही सोचती रही कि क्या माँ जैसा खाना देगी सौतेली माँ.......या माँ जैसे मेरे लिए चूड़ी, कंगन लाएगी क्या वो? ......इन्हीं ख्यालों में कब उसका बस स्टॉप आ गया उसे पता ही नहीं चला।
उस शाम वो अपने पापा के कमरे के बगल वाले कमरे में ही घुसी रही, सौतली माँ आयी तो दरवाजे से चिपक कर उसकी एक झलक देखी, बड़ी सी बिंदी लगाए, तनी भोहों के साथ उसका गोरा चहरा चमकता था, बहुत सुंदर पर तेज़ दिखती थी वो।
मुक्ता पापा के बार-बार बुलाने के बाद भी बाहर नहीं आयी, न किसी से बात की। रात को सपने में अपनी माँ को सौतली माँ के बारे में बताया उसने, बोली, माँ ये मेरी सोशल स्टडीज वाली टीचर की तरह बड़ी बिंदी लगाती है, वो टीचर बच्चों को बहुत मारती है माँ, मुझे बहुत डर लगता है उनसे, मुझे भी मारेंगी क्या ये? मुक्ता की माँ कुछ न बोली बस उसके माथे पर हाथ रख सपनों से ओझल हो गई।
दूसरे दिन भी मुक्ता बिना किसी से बात किए बस स्टॉप पर आ गई, पापा दौड़े-दौड़े उसका लंच बॉक्स देने आए तो उनसे भी कुछ न बोली, लंच बॉक्स लिया और बस में बैठ गई। इन्ही ख्यालों में लंच ब्रेक हो गया, बेमन से उसने अपना लंच खोला, दादी बीमारी की वजह से बिस्तर पकड़े थी तो पापा बाजार से पोहे खरीद रोज लंच बॉक्स में रख देते थे, रोज वही पोहे खा-खा कर ऊब गई थी मुक्ता।
पर आज उसके पिंक लंच बॉक्स में घी से बने पराठे चमक रहे थे, एक खन में छोटी छोटी कटी भिंडी और दूसरे में स्लाइज़ किए टमाटर रखे थे, बगल में बैठी चिंकी के मुँह में भी पानी आ गया, आज पूरे एक साल बाद मुक्ता ने स्कूल में माँ के भेजे लंच जैसा खाना खाया, पराठे खत्म हुए तो देखा लंच बॉक्स के एक कोने में टिशू पेपर लपटा रखा था, खोला तो मुक्ता की आँखें चौन्धिया गईं, पेपर में लपटी रखी थी मुक्ता की पसंद की खोपरे वाली मिठाई और पेपर पे लिखा था....
आपकी सौतेली नहीं,......नई माँ....। मुक्ता के सर पर रखा सारा बोझ इन दो शब्दों ने हटा दिया।
जयंत दासवानी
-------------------परिचय
जयंत दासवानी.... सीहोर मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। आप शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े होने के साथ साथ एक अंग्रेजी दैनिक के लिए पत्रकारिता भी करते हैं और समय समय पर साहित्य की सेवा भी....। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचनाएँ लिखते रहते हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है...।
संपादक
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समीक्षा
नई माँ.... कहानी का शीर्षक पढ़ने के बाद कल्पना के घोड़े जाकर सौतेली माँ... के नाम पर जाकर थमते हैं....। बाल मन की मनोदशा या कहें कि बाल मनोविज्ञान को इस कथानक में कुशलता से पिरोने का काम लेखक इतनी आसानी से शायद इस लिए कर पाएं हैं कि वह खुद शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं... और बाल मनोविज्ञान पर पकड़ भी है...। कहानी की नायिका "मुक्ता" नाम की एक चौथी क्लास में पढ़ने वाली बच्ची है जो अपनी टीचर से एक ऐसी कहानी सुन लेती है जो सौतेली माँ के अपनी सौतेली संतान पर की गई ज्यादतियों के होते हैं...। बाल मन में यह बात घर कर जाती है.... और करे भी क्यों न... कहानी से इतर कथानक भी तो कैकयी, सुरुचि जैसी सौतेली माँओं के किस्से सुनाते हैं। बच्चों को उस कुंती की कहानी इतने विस्तार से नहीं सुनाया गया कि उसने अपने तीन पुत्रों के साथ दो सौतेले बेटों नकुल और सहदेव को इतनी आत्मीयता से पाला कि दुनियाँ आज तक नहीं जान पाती है कि कुंती के पांच पांडव नहीं केवल तीन पुत्र ही थे। इसी तरह रोहिणी के कृष्ण के प्रति प्रेम को भी कम ही सुनाया जाता है।कहानीकार ने इस कथानक में सौतेली माँ के प्रति बने उस प्रतिबिंब को तोड़ा है जो अधिकांशतः सभी के मन में समाया हुआ है। वक्त की क्रूरता की वजह से दूसरा विवाह का निर्णय पूर्व संतान के प्रति हमेशा गलत ही होगा, यही बात कहानी भी कह देती है। बहरहाल एक बढ़िया कथानक को गढ़ने के शब्द शिल्पी लेखक को बधाई... इसलिए भी कि कथा का प्रवाह बना रहता है... पाठक का मन भटकता नहीं है। कथा सीधे और सरल शब्दों में अपने अर्थ भाव के साथ खुद कह जाती है....।


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