लेखक
अभी तो...
मैं तुम्हारी बाहरी
खूबसूरती-भर -पर
फ़िदा हूँ,
जानता कहाँ मन की
सुन्दरता तुम्हारी,
लावण्या तो
तब ही दिखेगा
तुम्हारा,
जब दिखाओगी
रूप अपने
अलग-अलग
तुम
अलग-अलग परिवेश में,
द्वेष में, आवेश में,
स्वभाविकता में,
विशेष में,
देश में, विदेश में,
प्रेम में, अप्रेम में,
क्रोध में, खीज में
चिढ़ में, आवेश में
अलग-अलग संदर्भ में,
वासना के गर्भ में,
एकांत में या सर्व में,
अभी तो...
जानता ही कहाँ हूँ ?
मैं तुम्हें?
समझना है मुझे,
कैसे करोगी तुम
मेरे परिजनों से व्यवहार ।
क्या होगा तुम्हारा जवाब
जब जताएंगे वे
अपनापन और प्यार ।।
क्या होगा तुम्हारा जवाब
वे यदि खायेंगे,
तुमसे खार ।।
अभी तो...
मानता ही कहाँ हूँ ?
मैं तुम्हें?
अब तक तो तुमने
कुछ क्षणों की
भेंट भर की
है मुझसे,
और लुटाया
अपरिमित प्यार ।
कह दिया
मुझी को अपना
सर्वस्व संसार ।।
प्रवाह में, राह में, दाह में, चाह में ।
पल-पल, क्षण-क्षण,
हर पहर, हर दिन हर माह में ।।
पर संदेह को सच मे बदलते
देर नहीं लगती ।
आशंकाओं से मेरा मन काँप
उठता है ।
क्यों?
क्योंकि
मैं तुम्हारे प्रेम में पड़ चुका हूँ।
तुम्हारे विरुद्ध
किसी को झेल ना पाउँगा।
और न ही तुम्हारे किसी
अन्य रूप को सह जाउँगा ।।
सभी प्रिय जो है ।
किसी से रूठना चाहता नहीं मैं ।
किसी को लूटना चाहता नहीं मैं ।।
सभी संबंधों को
बस
ऐसे ही पड़े रहने दो।
छेड़छाड़ मत करो ।
ये संबंध बगीचा नहीं,
अरण्यों के पौध-झाड़ी-वृक्ष हैं ।
अभी तो...
तुम भी नहीं
जानती मुझको...
आपके काव्य संग्रह कलम अभी ज़िंदा है , झरोखा-२०००, झरोखा-९९ प्रकाशित हो चुके हैं और महज़ इतनी-सी तो बात थी... नामक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। कई सम्मान आपको प्राप्त हो चुके हैं। कवि सम्मेलनों में आपकी सक्रियता रहती है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
अभी तो...
मैं तुम्हारी बाहरी
खूबसूरती-भर -पर
फ़िदा हूँ,
जानता कहाँ मन की
सुन्दरता तुम्हारी,
लावण्या तो
तब ही दिखेगा
तुम्हारा,
जब दिखाओगी
रूप अपने
अलग-अलग
तुम
अलग-अलग परिवेश में,
द्वेष में, आवेश में,
स्वभाविकता में,
विशेष में,
देश में, विदेश में,
प्रेम में, अप्रेम में,
क्रोध में, खीज में
चिढ़ में, आवेश में
अलग-अलग संदर्भ में,
वासना के गर्भ में,
एकांत में या सर्व में,
अभी तो...
जानता ही कहाँ हूँ ?
मैं तुम्हें?
समझना है मुझे,
कैसे करोगी तुम
मेरे परिजनों से व्यवहार ।
क्या होगा तुम्हारा जवाब
जब जताएंगे वे
अपनापन और प्यार ।।
क्या होगा तुम्हारा जवाब
वे यदि खायेंगे,
तुमसे खार ।।
अभी तो...
मानता ही कहाँ हूँ ?
मैं तुम्हें?
अब तक तो तुमने
कुछ क्षणों की
भेंट भर की
है मुझसे,
और लुटाया
अपरिमित प्यार ।
कह दिया
मुझी को अपना
सर्वस्व संसार ।।
प्रवाह में, राह में, दाह में, चाह में ।
पल-पल, क्षण-क्षण,
हर पहर, हर दिन हर माह में ।।
पर संदेह को सच मे बदलते
देर नहीं लगती ।
आशंकाओं से मेरा मन काँप
उठता है ।
क्यों?
क्योंकि
मैं तुम्हारे प्रेम में पड़ चुका हूँ।
तुम्हारे विरुद्ध
किसी को झेल ना पाउँगा।
और न ही तुम्हारे किसी
अन्य रूप को सह जाउँगा ।।
सभी प्रिय जो है ।
किसी से रूठना चाहता नहीं मैं ।
किसी को लूटना चाहता नहीं मैं ।।
सभी संबंधों को
बस
ऐसे ही पड़े रहने दो।
छेड़छाड़ मत करो ।
ये संबंध बगीचा नहीं,
अरण्यों के पौध-झाड़ी-वृक्ष हैं ।
अभी तो...
तुम भी नहीं
जानती मुझको...
अखिलेश हठीला
----------------परिचय
अखिलेश हठीला ‘सरल’ हैदराबाद तेलंगाना मे निवास करते हैं। सीहोर के यशस्वी और आशु कवि स्व. रमेश हठीला के पुत्र हैं। आप अध्यापन से जुड़े हुए हैं। अध्यात्म में विशेष प्रवीणता है। नाट्य कला में भी आपकी रुचि है।आपके काव्य संग्रह कलम अभी ज़िंदा है , झरोखा-२०००, झरोखा-९९ प्रकाशित हो चुके हैं और महज़ इतनी-सी तो बात थी... नामक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। कई सम्मान आपको प्राप्त हो चुके हैं। कवि सम्मेलनों में आपकी सक्रियता रहती है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक


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