मिट नहीं सकती कयामत तक 
यहाँ हुकूमत राम की...... 

कोरोना से जंग में श्री राम का प्रबंधन 


राम...... एक नाम नहीं.. भारतीय जीवन शैली का परिचायक है..  यहाँ के जीवन में रचे बसे है... राम.... जिसका उच्चारण करने मात्र से मिलता है... आराम...। देखिये न.... इस आराम शब्द में भी राम ही छिपा है...। जिस राम के नाम के पत्थर सागर में तैर गए..... जिनका नाम भव बंधन से मुक्ति का मार्ग है... जिनका सिरा पाने को साधु संत... अपना जीवन होम कर देते हैं....। जिनका नाम आज भी भारतियों के दिलों पर हुकूमत करता है... जो हुकूमत कयामत तक कायम रहने वाली है.... उसी राम के काम को हमने तिरोहित कर दिया है...। आज उनके प्राक्ट्य दिवस पर... उनके ही प्रबन्धन पर विचार करने का उचित अवसर है....। 
आज की आधुनिक जीवन शैली में भी राम... प्रबंधन के गुरु हैं...। जिस राम राज्य की बातें कर के हमारे देश में सत्ताएँ बनती और बिगड़ती हैं.. उस राम राज्य को हमारी सत्ता ने कभी अंगीकार नहीं किया... बाजारवाद , उपभोक्ता वाद से पनपा पूंजीवाद अब हमें ज्यादा रास आ गया....। बातें भारत को विश्व का सिरमोर बनाने की कही जाती हैं... और अमेरिका एवं चीन को घुटने टिकाने पर मजबूर करने के लिए.... वनवासियों, पिछड़ों, वंचितों को राम की तरह गले नहीं लगाया जाता...। उन्हें राम ने उन्हें स्वावलंबी बनाकर उस समय की सर्वोच्च सत्ता... जो रावण की थी.. उस को न केवल चुनोती दी... वरन उसको परास्त कर... भारत के खोये स्वाभिमान को जगाया था....। इसके लिए उन्होंने किसी सत्ता की सहायता नहीं ली थी.... किसी उच्च घराने से हाथ नहीं मिलाया था...। राम ने वंचितों में स्वाभिमान जगाकर, उन्हें स्वावलंबी बनाकर... रावण के अहंकार को चुनोती दी थी...। 
अपने इक्षवाकू वंश के तत्कालीन परिवार को एकजुट बनाए रखने के लिए त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया...। राम दशरथ - कैकई के निर्णय के विरुद्ध बगावत कर अयोध्या के राजा बन जाते तो... जन जन के मन के राम न बन पाते...। रोम रोम में बसने वाले राम बनने के लिए.... उन्होंने जंगल जंगल भटकना पड़ा है....। याद करिए... राजकुमार राम... जब गंगा पार करते हैं... दूसरे तट पर उतरते हैं.. तभी मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाते हैं...। यह त्याग से ही संभव है...। मैनेजमेंट में भी यही सूत्र काम करता है...जब ज्यादा पाना है तो...थोड़े पर संतोष नहीं करो...। राजतिलक की तैयारियों से राम प्रसन्न नही होते... संशय की रात में सीता जी को.. मुनि विश्वामित्र को दिए वचन के पालन की याद दिलाते हैं.. उन्हें तैयार करते हैं..मानसिक रूप से...कि राम वन ही जायेंगे.... । माँ कोशल्या को समझाते हैं... पिता दिन्ह मोहे कानन राजू....। माँ पिता जी ने अयोध्या का राज्य भरत को... और मुझे जंगल का राजा बनाया है...। पिता को, गुरु वशिष्ठ को, महामंत्री सुमंत्र को... सभी को समझाते हैं....। यही वाक् चातुर्य तो आधुनिक युग में प्रबंधन में सिखाया जाता है..। 
जटायु का अंतिम संस्कार करने की आज्ञा मांगते वक्त राम उनसे कहते हैं.... तात जटायु आपने मुझे पुत्र कर्म करने का अवसर प्रदान कर मुझ पर उपकार किया है..। राम का यह वाक्य कर्तव्य बोध को जाग्रत करने का मंत्र है। जिसकी आज के युग में खास कर परिवार प्रबंधन के दौरान हर कदम पर याद रखा जाने वाला...। 
एक अंतिम प्रसंग  का उल्लेख कर लेख का समापन करना चाहूंगा....। प्रसंग है.. राम और रावण के युद्ध के समय का....। जब रावण रथ पर सवार होकर युद्ध क्षेत्र में आता है... और तब विभीषण के मन में आता है.. 

रावण रथी विरथ रघुवीरा... 
देख विभीषण भयहु अधीरा...।। 

राम के पास रथ नहीं है....उनके पास कवच नहीं है....और तो और राम के पाँव में... पद त्राण.. यानि जूते तक नहीं है...। ये कैसे रावण के मुकाबला कर पाएंगे...। ये सारी बातें विभीषण ने यह रघुपति से कही भी...। उस समय रघुनाथ जी ने जो उत्तर विभीषण को दिया..... वर्तमान परिस्थितियों में हमारे ज्यादा काम का है..... 
सोरज धीरज तेहि रथ चाका, 
सत्यशील दृड् ध्वजा पताका....। 
बल विवेक दम परहित घोरे, 
छमा कृपा समता रजु जोरे...। 
ईश भजन सारथी सजाना, 
बिरति चर्म संतोष कृपाना...। 
दान परसु बुधि शक्ति प्रचंडा, 
बर बिग्यान कठिन कोदंडा...। 

लंका कांड में वर्णित इन चौपाई का भावार्थ तो यह है कि कभी कभी युद्ध साधन से नहीं साधना से लड़े जाते हैं। अर्थ है कि शौर्य और धैर्य रथ के पहिये हैं, सत्य व शील उसकी ध्वजा पताका हैं। बल के साथ विवेक, परोपकार और इंद्रियों पर नियंत्रण रथ के घोड़े हैं। क्षमा, दया और समता की रस्सियों से ये घोड़े चलते हैं। प्रभु का भजन सारथी है। वैराग्य ढाल और संतोष तलवार है। दान परशु और शुद्ध बुद्धि प्रचंड शक्ति है। 
वर्तमान में पूरी दुनिया कोरोना से युद्ध लड़ रही है। आश्चर्य की बात है साधन संपन्न देश इस बीमारी के पूर्ण प्रकोप को भोग रहे हैं। हमारे देश में प्रकोप अभी कम है लेकिन कोरोना को हराने के लिए भगवान राम हमें साधना का मार्ग बता गए है। 
शौर्य का काम है धैर्य के साथ घर में रहना... यही आग्रह सरकार कर रही है.... पूरी सत्यता और शीलता के साथ घर में रहे। अपने बल (धन बल आदि) , विवेक का प्रयोग कर जरूरतमंद की सहायता यानि परोपकार करते रहे... यह क्षमा दया और समता के भाव से ही संभव है। दुनिया दारी भूलकर बैरागी होकर खुद को घर में रखना ही आपकी ढाल है। इच्छाओं पर नियंत्रण तलवार है और शुद्ध बुद्धि को अपनी शक्ति बना लें। ज्ञान को धनुष और मेडिकल साइंस की हिदायतों के तरकश के तीरों से कोरोना के खिलाफ चल रही इस जंग को जीत लें... जैसे राम ने विजय प्राप्त की थी अपनी साधना से.... बिना साधन के...।   जय सियाराम...। 

शैलेश तिवारी

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