समीक्षक 

मिथक और सत्य के मध्य अटकी स्त्री का इतिवृत्त : सिधपुर की भगतणेंउपन्यास : लक्ष्मी शर्मा

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पुस्तक समीक्षा 


सृष्टि के आरम्भ से ही आचरण की समस्त संहिताओं के पालन की जबावदेही स्त्री के नाम लिख दी गई है।
यह पितृसत्तात्मक समाज का पाखंड है अथवा निरंकुशता जिसमें स्त्री की अभिव्यक्ति को ध्वंसित कर उसके लिए लोकतांत्रिक संवेदना के सभी द्वार अवरुद्ध कर दिए गये हैं।
किसी भी काल में स्त्री के अस्तित्व का, उसकी कठिन यात्रा व संताप का आकलन ही नहीं किया और हमारी तथाकथित सामाजिकता में तरह-तरह के यातना-गृह बनाकर उसे प्रताड़ित कर याचना पर विवश किया गया है।
जब कभी स्त्री ने तय मापदंडों व रास्तों को त्याग कर अपने निर्वसन स्व को पाने के लिए, निष्कवच मन की सुरक्षा के लिए राह बनानी चाही है, स्वयंभू न्यायाधीशों ने स्वतंत्रता को खारिज कर दोषी करार दिया है और अपेक्षा की है वो सिर झुकाकर उसे स्वीकार करे।
यंत्रणा का यही अतिरेक विद्रोह में बदलकर  मुखरित हुआ और जन्म हुआ भगतण का।
भगतण वो नहीं जो भक्ति से सराबोर हो लीन हो जाये ईश आराधना में, भगतण मतलब कामणगारी, जादूगरनी, छल-प्रपंच रचने वाली डायन जिसके लिए अनेक कथाएँ गढ़ ली जाती हैं।
इसी मिथक व सत्य के मध्य अटकी स्त्री का इतिवृत्त है लक्ष्मी शर्मा का उपन्यास #सिधपुर_की_भगतणें।
हवेली की दो बहुएँ भजन व गुलाब अपनों के अत्याचार की वजह से, बेटी सौभाग्य अपनी ज़िंदगी को अपनी तरह जीने के लिये व एक मदरासन ललिता समाज के भेड़ियों से स्वयं को बचाने के लिए जिस जीवन शैली को अपनाती हैं,  उसका व्यंग्यार्थ या ध्वन्यार्थ प्रकटीकरण है शब्द "भगतण" ।
लेखिका ने इन्हें परिभाषित करते हुए लिखा है "भगतणें, जो स्त्रियां हैं, लुगाई-जात होने का डांड अपनी ही देह के ब्याज से भरती, अपनी कुंवारी इच्छाओं के साथ बढ़ाती, अपनी देह की रुदालियों को मन के एकांत में सुनती हैं, अपनी हँसी के जरजराते कपड़े की तह में दु:ख के जून-पुराने सिक्के छुपा के रखती, अपने आँसुओं में अपनी कामनाओं को धोती-सुखाती, दु:खों को सीमन्त के काले-सफेद केशों में छुपाकर ऊपर से सिन्दूर भर लेती हैं और अपनी ही मुट्ठियां मार के उजाड़ी अपनी कोख में आप ही मर जाती हैं।"
इतिहास साक्षी है, राजमहलों व हवेलियों में संतानप्राप्ति का लक्ष्य अभीष्ट रहा है। माता सत्यवती ने भी ऋषि व्यास का उपयोग किया था इसी आकांक्षा में।  पुत्र की अक्षमता व वंशबेल की कामना में एक साधारण स्त्री ने जब दोहराया इतिहास तब वर्तमान सह न सका और स्त्री बनी भगतण। 
चारों मुख्य पात्रों के साथ कुछ और भी किरदार साथ चलते हैं परन्तु किसी भी स्थान पर ये न तो अपरिचित लगे न थोपे हुए।
पाठक कथानक के साथ इस तरह जुड़ा रहता है जैसे वो स्वयं इसका एक हिस्सा है।
सहज, सरल व साहित्यक भाषा में देशज शब्द स्वर्णाभूषण में जड़े रत्न का प्रभाव उत्पन्न करते प्रतीत होते हैं।
राजस्थान की परम्परागत संस्कृति, वैवाहिक रीति-रिवाज व स्थान तथा घटनाओं का शब्दांकन इस तरह से हुआ है कि दृष्टिपटल पर दृश्य चलायमान प्रतीत होते हैं।
उपन्यास को पढ़ते हुए पाब्लो नेरूदा के शब्द याद आते हैं कि "लेखक का काम केवल लिखना नहीं है, बल्कि एक तरह से वह सामाजिक प्रतिक्रिया की शक्तियों का सामना करने की चुनौती भी स्वीकारता है और यह एक बड़ा जोखिम का काम है, क्योंकि लेखक फिर सच्चाई के रखवाले की तरह से बात करता है।"
लक्ष्मी शर्मा ने अपने लेखन को जिस सोंदर्य के साथ संजोया है, सामाजिक परिवर्तन व संस्कृति के प्रति उनके अगाध विश्वास का परिचायक होने के साथ स्त्री विमर्श का नवीन आयाम भी है।
हृदयतल से बधाई लक्ष्मी शर्मा जी। 

-मुकेश दुबे

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