सशक्तिकरण के दौर में...उपेक्षित महिला....
लेखिका
भारत दुनिया का वह पहला देश है, जिसने महिलाओ को वोट दे कर अपनी सरकार चुनने का अवसर सबसे पहले दिया। यह वह भूमि भी है, जहाँ नारी की पूजा में देवताओं का निवास बताया गया। महाभारत काल तक संतानों को माता के नाम से पुकारने की परंपरा का दौर भी देखा है.. यथा, गांगेय (भीष्म) कोंतेय (पांडव) राधेय (कर्ण) यशोदानंदन(कृष्ण) आदि आदि अनेक उदाहरण है..। लेकिन नारी को अबला कहने वाली कलम ने भी यहीं जन्म लिया। ये सब अब मंचो पर बोलने की शोभा है। हकीकत में स्त्री आज भी शोषित है। बहुत कम निर्भया की तरह दुनियाँ के सामने आ पाती हैं बहुतों की चीख उनके घर की देहरी पार नहीं कर पाती तो कुछ कसमसाकर रह जाती हैं। किसी की आवाज पर ताला भी इसी समाज द्वारा लगाया जाता है। जो पुरजोर तरीके से आधी आबादी को पूरा हक दिलाने की वकालत करने का ढोंग भर कर रहा है। मन को मथते इन्हीं विचारों की पहली किश्त...
हालाँकि शास्त्रों ने कहा है इसलिये हम स्त्रियां देवी हैं ।
है न "मैम" ?
पर मानता कौन है..शासन ,प्रशासन ...?
तभी तक न जब आप किसी दल की मुखिया हैं.. ?
बाद उसके आप कौन हैं ..?
स्त्री महज स्त्री । है न..?
चूँकि आप स्त्री हैं और पूजनीय देवी भी, तो आपको सौगंध है भक्तजनों की कि आँख मूँद कर घर के भीतर मूर्तिमान हो जाइये।
गली में ,नुक्कड़ पर,लंबे सड़क किसी भी बेटी -बहन की इज्जत लूटी जा रही हो,उसे जलील किया जा रहा हो,अश्लील टिप्पणी की जा रही हो,फिकरे कसे जा रहें हो उधर तनिक भी ध्यान न दीजिये।
तुच्छ जन हैं ये न ....!!!
आत्मकेंद्रित हो जाइये अपने नाम के जयकारों को सुनने के लिए हे देवि ! नहीं तो भारत भूमि पर आये दिन हो रहे जन्मी-अजन्मी बेटियों का करुण -क्रंदन आपका ध्यान भंग कर देगा।
देखिये अपने भरे खजाने के बहुमूल्य रत्नों की ओर ,जी भर कर देखिये और उसकी जगमग -जगमग में मुग्ध भूली रहिये कि आखिर ये खजाने कैसे और कहाँ से एकत्र हुए।
भूल कर भी मत पूछियेगा अपने भक्तों से देवि, कि यह रुपयों- गूँथे हारों के पुष्प लोकतंत्र के किस बाग़ से आये हैं।
किस माली ने खून -पसीने बहा कर इन्हें सींचा है ?
देवियाँ इन फज़ूल के चक्करों में नहीं पड़तीं। ये गर्विताएं कहाँ घूमती हैं मलिन बस्तियों में !! आप अकेले नहीं हैं देवि ...हम स्त्रियां आपकी अनुगामी हैं... देवि शब्द से अपार प्रेम करने वाली ,इस शब्द की उत्कट लालसा रखने वाली।हम सभी ..हम सभी।आप ही की तरह आत्ममुग्ध और आत्मकेंद्रित रहने वाली हम तभी रौद्र रूप दिखाती हैं जब अपनी और अपनों की जान पर बन आती है।जब निरंकुश विलासिता का सिंहासन डोलने लगता है।तब भी हमें सिर्फ़ अपना ही ख्याल रहता है ...सिर्फ़ अपना।कोई और बहू-बेटी मरे जिए हमसे क्या मतलब !!
एकबार मैं "स्त्री" फिल्म देख रही थी, जिसके एक दृश्य में गांव के लोग एक चुड़ैल ,जिसे 'स्त्री' के नाम से प्रचारित किया गया है, से बचने के लिए अपने -अपने घरों के सामने लाल स्याही से एक टोटका लिखते हुए दिखाई देते हैं-
"ओ स्त्री ! तुम कल आना ।"
उनका विश्वास है कि घर के बाहर यह टोटका लिख देने से वह घर वालों को अपना शिकार नहीं बनाएगी।
तभी मेरे साथ फ़िल्म देख रहे मेरे एक मित्र की आवाज आई, "कल नही, ओ स्त्री तुम कभी मत आना "
सारे लोग इस मजाक में कही गई बात पर ठहाकों लगाने लगे।
फिल्म पूरी हुई, परंतु इस मजाक में कही गई बात को ले कर मेरे ज़हन से स्वत: ही कुछ विचार उत्पन्न हुए...
वो धरती ~
जहां एक पतिव्रता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़े !
जहां एक स्त्री की कोख में जन्म से पहले ही एक भावी स्त्री को मार दिया जाता हो !
जहां आज भी एक स्त्री के विवाह में दहेज का दानव मुंह खोलकर खड़ा दिखाई देता हो !
जहां कोई स्त्री केवल तीन बार 'तलाक तलाक तलाक' सुना कर दर-दर ठोकरें खाने को छोड़ दी जाती हो!
जहां पुरुष से ज्यादा काबिलियत रखने के बावजूद एक स्त्री पुरुष से कम वेतन पाती हो !
जहां राह चलते गिद्ध एक स्त्री को अपनी आँखों से ही नोच डालते हों !
जहां एक बच्ची की कच्ची उम्र भी उसके बलात्कारियों का मन पिघला नहीं पाती हो !
जहां कार्यस्थल पर एक स्त्री का भरपूर शोषण होता हो !
जहां एक स्त्री केवल भोग की वस्तु समझी जाती हो !
तो ऐसी धरती पर 'ओ स्त्री !तुम कभी न ही आओ तो ही अच्छा हो शायद...।
वैसे मैं जानती हूं कि तुम आए बिना रहोगी तो नही, जिद्दी हो,तुमसे बड़े हौसले हैं तुम्हारे , जिनकी ताकत से एक दिन तुम स्वयंसिद्धा बन कर रहोगी ।और मुझे पूरा विश्वास है कि तब उस दिन पुरूष प्रधान समाज को भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए बिल्कुल ऐसा ही संघर्ष करना पड़ेगा जो आज तुम कर रही हो !
इसलिए -
ओ स्त्री ! तुम कल नहीं , आज ही आना... !
क्रमशः.......
रीमा मिश्रा, आसनसोल, पश्चिम बंगाल
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रीमा मिश्रा " नव्या " आसन सोल ( पश्चिम बंगाल) से हैं। पेशे से आप शिक्षिका हैं लेकिन देश के विभिन्न समाचार पत्रों पर आपके लेख प्रकाशित होते रहते हैं। आपको आसन सोल नगर निगम से हिंदी पत्रकारिता का सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। प्रकाशित लेख में लेखिका के अपने निजी विचार हैं। जिनमे लेखिका ने कोरोना के कहर के बीच अपने बुजुर्गों के सेवा और देखभाल का संदेश दिया है।
संपादक
लेखिका
भारत दुनिया का वह पहला देश है, जिसने महिलाओ को वोट दे कर अपनी सरकार चुनने का अवसर सबसे पहले दिया। यह वह भूमि भी है, जहाँ नारी की पूजा में देवताओं का निवास बताया गया। महाभारत काल तक संतानों को माता के नाम से पुकारने की परंपरा का दौर भी देखा है.. यथा, गांगेय (भीष्म) कोंतेय (पांडव) राधेय (कर्ण) यशोदानंदन(कृष्ण) आदि आदि अनेक उदाहरण है..। लेकिन नारी को अबला कहने वाली कलम ने भी यहीं जन्म लिया। ये सब अब मंचो पर बोलने की शोभा है। हकीकत में स्त्री आज भी शोषित है। बहुत कम निर्भया की तरह दुनियाँ के सामने आ पाती हैं बहुतों की चीख उनके घर की देहरी पार नहीं कर पाती तो कुछ कसमसाकर रह जाती हैं। किसी की आवाज पर ताला भी इसी समाज द्वारा लगाया जाता है। जो पुरजोर तरीके से आधी आबादी को पूरा हक दिलाने की वकालत करने का ढोंग भर कर रहा है। मन को मथते इन्हीं विचारों की पहली किश्त...
हालाँकि शास्त्रों ने कहा है इसलिये हम स्त्रियां देवी हैं ।
है न "मैम" ?
पर मानता कौन है..शासन ,प्रशासन ...?
तभी तक न जब आप किसी दल की मुखिया हैं.. ?
बाद उसके आप कौन हैं ..?
स्त्री महज स्त्री । है न..?
चूँकि आप स्त्री हैं और पूजनीय देवी भी, तो आपको सौगंध है भक्तजनों की कि आँख मूँद कर घर के भीतर मूर्तिमान हो जाइये।
गली में ,नुक्कड़ पर,लंबे सड़क किसी भी बेटी -बहन की इज्जत लूटी जा रही हो,उसे जलील किया जा रहा हो,अश्लील टिप्पणी की जा रही हो,फिकरे कसे जा रहें हो उधर तनिक भी ध्यान न दीजिये।
तुच्छ जन हैं ये न ....!!!
आत्मकेंद्रित हो जाइये अपने नाम के जयकारों को सुनने के लिए हे देवि ! नहीं तो भारत भूमि पर आये दिन हो रहे जन्मी-अजन्मी बेटियों का करुण -क्रंदन आपका ध्यान भंग कर देगा।
देखिये अपने भरे खजाने के बहुमूल्य रत्नों की ओर ,जी भर कर देखिये और उसकी जगमग -जगमग में मुग्ध भूली रहिये कि आखिर ये खजाने कैसे और कहाँ से एकत्र हुए।
भूल कर भी मत पूछियेगा अपने भक्तों से देवि, कि यह रुपयों- गूँथे हारों के पुष्प लोकतंत्र के किस बाग़ से आये हैं।
किस माली ने खून -पसीने बहा कर इन्हें सींचा है ?
देवियाँ इन फज़ूल के चक्करों में नहीं पड़तीं। ये गर्विताएं कहाँ घूमती हैं मलिन बस्तियों में !! आप अकेले नहीं हैं देवि ...हम स्त्रियां आपकी अनुगामी हैं... देवि शब्द से अपार प्रेम करने वाली ,इस शब्द की उत्कट लालसा रखने वाली।हम सभी ..हम सभी।आप ही की तरह आत्ममुग्ध और आत्मकेंद्रित रहने वाली हम तभी रौद्र रूप दिखाती हैं जब अपनी और अपनों की जान पर बन आती है।जब निरंकुश विलासिता का सिंहासन डोलने लगता है।तब भी हमें सिर्फ़ अपना ही ख्याल रहता है ...सिर्फ़ अपना।कोई और बहू-बेटी मरे जिए हमसे क्या मतलब !!
एकबार मैं "स्त्री" फिल्म देख रही थी, जिसके एक दृश्य में गांव के लोग एक चुड़ैल ,जिसे 'स्त्री' के नाम से प्रचारित किया गया है, से बचने के लिए अपने -अपने घरों के सामने लाल स्याही से एक टोटका लिखते हुए दिखाई देते हैं-
"ओ स्त्री ! तुम कल आना ।"
उनका विश्वास है कि घर के बाहर यह टोटका लिख देने से वह घर वालों को अपना शिकार नहीं बनाएगी।
तभी मेरे साथ फ़िल्म देख रहे मेरे एक मित्र की आवाज आई, "कल नही, ओ स्त्री तुम कभी मत आना "
सारे लोग इस मजाक में कही गई बात पर ठहाकों लगाने लगे।
फिल्म पूरी हुई, परंतु इस मजाक में कही गई बात को ले कर मेरे ज़हन से स्वत: ही कुछ विचार उत्पन्न हुए...
वो धरती ~
जहां एक पतिव्रता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़े !
जहां एक स्त्री की कोख में जन्म से पहले ही एक भावी स्त्री को मार दिया जाता हो !
जहां आज भी एक स्त्री के विवाह में दहेज का दानव मुंह खोलकर खड़ा दिखाई देता हो !
जहां कोई स्त्री केवल तीन बार 'तलाक तलाक तलाक' सुना कर दर-दर ठोकरें खाने को छोड़ दी जाती हो!
जहां पुरुष से ज्यादा काबिलियत रखने के बावजूद एक स्त्री पुरुष से कम वेतन पाती हो !
जहां राह चलते गिद्ध एक स्त्री को अपनी आँखों से ही नोच डालते हों !
जहां एक बच्ची की कच्ची उम्र भी उसके बलात्कारियों का मन पिघला नहीं पाती हो !
जहां कार्यस्थल पर एक स्त्री का भरपूर शोषण होता हो !
जहां एक स्त्री केवल भोग की वस्तु समझी जाती हो !
तो ऐसी धरती पर 'ओ स्त्री !तुम कभी न ही आओ तो ही अच्छा हो शायद...।
वैसे मैं जानती हूं कि तुम आए बिना रहोगी तो नही, जिद्दी हो,तुमसे बड़े हौसले हैं तुम्हारे , जिनकी ताकत से एक दिन तुम स्वयंसिद्धा बन कर रहोगी ।और मुझे पूरा विश्वास है कि तब उस दिन पुरूष प्रधान समाज को भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए बिल्कुल ऐसा ही संघर्ष करना पड़ेगा जो आज तुम कर रही हो !
इसलिए -
ओ स्त्री ! तुम कल नहीं , आज ही आना... !
क्रमशः.......
रीमा मिश्रा, आसनसोल, पश्चिम बंगाल
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परिचय
रीमा मिश्रा " नव्या " आसन सोल ( पश्चिम बंगाल) से हैं। पेशे से आप शिक्षिका हैं लेकिन देश के विभिन्न समाचार पत्रों पर आपके लेख प्रकाशित होते रहते हैं। आपको आसन सोल नगर निगम से हिंदी पत्रकारिता का सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। प्रकाशित लेख में लेखिका के अपने निजी विचार हैं। जिनमे लेखिका ने कोरोना के कहर के बीच अपने बुजुर्गों के सेवा और देखभाल का संदेश दिया है।
संपादक


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