एक दीया जलायें
आओ ,चलो ..,
चलें हम सब मिलकर
एक दिया जलायें -
आशा और विश्वास का
और एक उम्मीद का
कि ..,
दूर होगा अंधेरा गगन का
जो -छाया हुआ है मन में
हमारे ,
ढ़क रखा है उजाले को
आगोश में अपने ,
वहीं धुंधली सी हो गई हैं
रश्मियाँ चमकते हुये सूर्य की
आओ चलें हम सब मिलकर
जलायें दिया एक उसके लिए
जो हो जायें नष्ट सदा के लिए
इस जलते दीये की रोशनी में
छंट जाये अंधेरा सदा के लिए
और एक नया सवेरा आ जाये
आओ चलें हम सब मिलकर
जलायें दीया एक उसके लिए ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब
©स्वरचित मौलिक रचना
------------------परिचय
शशिकांत श्रीवास्तव मूलतः वाराणसी के रहने वाले हैं। पेशे से केमिकल इंजीनियर शशिकांत जी आजकल डेरा बस्सी मोहाली पंजाब में निवासरत हैं। माँ के आशीर्वाद से एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। और अनेक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। कई पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। एम पी मीडिया पॉइंट में आपका स्वागत है।
संपादक


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