लेखिका 

 सब ठहर गया है
समय चक्र को छोड़ कर
लेकिन
उसकी गति
बड़ी धीमी है
सभी कैद घरों में
आज फुरसत में हूँ
कुछ यादें जो
आँचल के कोने में
गठियाई है
आज उनको खोलूंगी
कुछ यादें जो
ब़ंद हैं घर की देहरी में 
हौले से उन्हें अपने पास बुलाऊंगी
चिड़िया के डैनो में
बाँध आई थी
अपने कतरे परों का दर्द
आज उनपर भी हौले से संवेदना का मरहम धर दूँगी
कुछ अनचाही यादों के
खरपतवार
बिखरे हुए हैं
उन्हें बुहारना जरूरी है
किताबों के पन्नों में सहेजी
मोरपंखी यादों को
मधुमलिका की झाड़ियों के पास
बैठ कर
चुपचाप गुन लूँ
क्या पता कल वक्त मेरा रहे ना रहे

सुनीता सामंत

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परिचय 

सुनीता सामंत, गोरखपुर उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। पेशे से अध्यापिका हैं और लेखन में रुचि है। समय निकाल कर साहित्य के सेवा करती हैं। आपके तीन साँझा संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। साथ ही एक ई बुक भी प्रकाशित हुई है।  विभिन्न पत्र पत्रिकाओ में आपकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है। 
आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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