किसी के आंसूओं में मुस्कुराना जिंदगी है... 


जिंदगी... सब अपने अपने नजरिए से देखते हैं.... उसको परिभाषित करते हैं...। शब्दों के गूढ़ अर्थों में जिंदगी गुम हो जाती है... रह जाता है लफ्फाजीपन...। उलझ जाते हैं विचार... फिर सवाल होता है... जिंदगी क्या है? 
इस सवाल का जवाब... दिया है गीतकार शैलेंद्र ने... जी हाँ वही तीसरी कसम फिल्म बनाने वाले...। जो रेलवे में वेल्डर थे... लेकिन लिखते ... तारीफ के काबिल का ही थे...। एक जलसे में भारत के शो मेन राज कपूर को उनकी कविता पसंद आई...। लेकिन बात उस समय नहीं बनी....। शैलेंद्र ने राज कपूर के प्रस्ताव पर कह दिया... मैं पैसों के लिए नहीं लिखता...। बात शैलेंद्र की शादी के बाद बनी... जब उन्हें पैसों की जरूरत महसूस हुई..। फिर बात क्या बनी... फिल्मी दुनियाँ का इतिहास लिखाये जाने का श्री गणेश हो गया....। संगीतकार जोड़ी... शंकर जयकिशन.. ने उनके गीतों को कालजयी संगीत में पिरो कर... अमर कर दिया...। यह अमरता भी तब ज्यादा मिली... जब फिल्मी दुनिया के ट्रेजडी किंग माने जाने वाले.. अभिनय सम्राट दिलीप कुमार की तरह.... आवाज के ट्रेजडी किंग.... गायक मुकेश का स्वर उन गीतों को मिला...। तारीफ यह कि... राज कपूर पर फिल्माए गए वे गीत.... ऐसे लगते थे.. मानों राजकपूर खुद गा रहे हों...। उसी टीम के एक और सदस्य राजू करमाकर.. का नाम लिए बिना... किस्सा अधूरा सा रहेगा... जिनका फिल्मांकन... कल्पना की सीमाओं से परे लगता रहा...। 
बात है जिंदगी को परिभाषा को अपने में समेट लेने वाले गीत की...। जो फिल्म अनाड़ी का है.. 1958 की ये पिक्चर... आर के फ़िल्मस के बेनर तले बनी...। इसी फिल्म का गीत है... जब इंट्रो म्युजिक की कर्ण प्रिय.. उत्साह का संचार करती.. सुनाई देती है..।पर्दे पर नायक राजकपूर . पार्श्व में बज रहे संगीत के साथ ही... सीधे हाथ से टोप ... उल्टे हाथ से कंधे पर लटके झोले को मजबूती से पकड़े... अपने पैरों को एक के बाद एक उचकाते हुए.. आगे बढ़ रहे हैं.. । ...उधर आकाश में उड़ते परिंदों का झुंड....जिंदगी में आजादी के मायने समझा जाता है....। संगीत का वाद्य यंत्र बदलता है.... भेड़ों के रेवड में से राज कपूर.. अपनी चार्ली चेपलिन वाली शैली में गुजरते हैं....। तभी अनाथ आश्रम के बच्चो की टोली बैंड बजाती... निकलती है.. नायक उस को सेल्यूट करते... आगे बढ़ते हैं... और उनका एक पाँव हवा में टँगा रह जाता है.. दर्शक की सांस रुक सी जाती है... कैमरा सड़क पर रेंग रहे कीड़े पर... फोकस करता है... नायक एक सूखे पत्ते पर... कीड़े को उठाकर... पार्क की बागड़ में रखते हैं... और शुरू होती है जीवन की परिभाषा.... 

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार 
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार 
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार.. 
.... जीना इसी का नाम है.... 

परहित को तुलसी ने धर्म तो.... शैलेंद्र ने जीने की कला बताया है...। और गीत में यही पर आता है... होंठ गोल करके बजाई जाने वाली... सीटी का संगीत.... एक दम दिल को झुमा देने वाले अंदाज में.... शंकर जय किशन के संगीत का कमाल है कि... सुनने वाले के होंठ खुद ब खुद गोल हो उठते हैं... मिलाने लगता है सुर में सुर....। कमाल गीत का कहा जाए... या संगीत का... अथवा गायक का.. या फिर फिल्मांकन के साथ.... फकीरी अंदाज में राज कपूर के अभिनय का...। जिंदगी की इस परिभाषा को कालजयी बनाने में पूरी टीम ही.... हकदार है बधाई की..। सीन चाहे फुटपाथ के दुकानदार की दरिया दिली का हो... नायक द्वारा अंधे को बचाते हुए.. फ़ुटपाथी दुकानदार की दरियादिली... को नायक द्वारा उसके कटोरे में डाल देने का....। हर सीन जिंदगी में दूसरे के होंठो पर मुस्कुराहटों को लाने का अमर संदेश सौंप जाता है....। हर फूल... हर कली को बार बार यही कहता है... मरकर भी किसी के आंसूओं में मुस्कुरायेंगे...। यह गीत फिल्मी दुनिया के उन गीतों में से है.... जो सुनने में भी मजा देते हैं और देखने के साथ सुनने में तो... मजे के दोगुने हो जाने की गारंटी है....। 
शैलेश तिवारी
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एमपी मीडिया पाइंट के "संगीत की महफिल" मे शामिल होकर  आप भी सुनिए सदाबहार नगमा...गायक- डीके मालवीय                                   ----------------------

परिचय

इस गीत को एमपी मीडिया पॉइंट पर लेकर आये हैं..... सीहोर नगर के कराओके गायक.. डीके मालवीय...।

 पेशे से सरकारी नौकरी में हैं लेकिन इनके अंदर का कलाकार.. इन्हें गीत संगीत की दुनियाँ में पकड़े रखता है। इनकी खास बात यह है कि.... जिस तरह गायक किशोर कुमार जिस हीरो के लिए गाना गाते थे... तो लगता था कि.. वह हीरो खुद गा रहा है...। इसी तरह जब मालवीय जी किसो गायक का गाना गाते हैं तो.. उस गायक की मूल आवाज का अहसास करवा देते हैं। माँ सरस्वती की कृपा इन पर सदैव बनी रहे...। एमपी मीडिया पॉइंट की तरफ से शुभ कामनाएं और उनका स्वागत है।
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