लॉकडाउन में अति-आवश्यक दवाइयों की किल्लत से जूझता मरीज

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भाग दौड़ भरी ज़िंदगी, सामाजिक दबाव और अपनी और अपने परिवार की इच्छाओं की पूर्ति के लक्ष्य में उलझा इंसान अनजाने में अपने शरीर को ऐसी बीमारियों के सुपुर्द कर देता है जिसके जाल से बाहर आना अंगद के पैर को हिलाने जितना कठिन है।
बुलेट ट्रेन की तरह एक शहर से दूसरे शहर तेजी से पहुँचते कोरोना वायरस ने इंसानी जिंदगी में ब्रेक लगा दिया है। किसी नहर के पानी की तरह हमेशा बहता रहने वाला इंसान आज एक कुंड में सीमित होकर रह गया है। यही कारण है कि अति-आवश्यक दवाएं जिनके बिना रहना इंसान के लिए बहुत मुश्किल होता है । अब उन जरूरी दवाओं के बिना कई दिनों और हफ्तों बिताने को वह मजबूर हैं।
इन्ही अति-आवश्यक वस्तुओं की सूची में महत्वपूर्ण स्थान मिलता है शुगर, ब्लड प्रैशर, हार्ट और थाइराइड की दवाइयों को, जिसे इंसान एक बार लेना शुरू करता है तो फिर एक भी दिन उसके बिना रहना उतना ही जोखिम भरा हो जाता है जितना पेड़ की किसी पतली टहनी पर बैठना। आप कभी भी धोखा खा सकते हैं और जान की जोखिम बढ़ जाती है।
शुगर के रोगी को सायलेंट अटैक आ सकता है, ब्लड प्रैशर लो होने पर दिल का दौरा पड़ सकता है किडनी खराब हो सकती है ऐसे ही हार्ट और थाइराइड के रोगियों को भी काफी बड़ी समस्या आ सकती है। तब जबकि उसकी नियमित दवाओं की पर्याप्त खुराक उसको निर्धारित समय पर नहीं मिल पाए।
लॉकडाउन के कारण शहरों की सीमाएं सील हैं, इससे दवाइयों को लाने लेजाने में कई रुकावटें आ रही हैं। कई अति-आवश्यक दवाइयां रोगियों तक पाँच पाँच दिनों के विलंब से पहुँच रही हैं। अगर दवाइयाँ जिलों में इतनी देरी से पहुँच रही हैं तो जहाँ हमारे देश की अधिकांश आबादी निवास करती है उन तहसीलों और गाँवों के हालातों का अनुमान आप स्वयं ही लगा सकते हैं। वहाँ के मरीजों तक ये जीवन रक्षक दवाएं कैसे और कब पहुँच पा रही होंगी।
दवाई की कमी को भाँपते हुए शहर के कई लोग उसे जरूरत से ज्यादा मात्रा में खरीद लेते हैं। इससे कई जरूरतमंद दवाइयों से वंछित रह जाते हैं। इसके लिए प्रशासन को कोई ठोस तरीका अपनाना चाहिये। अकेले निर्देश जारी कर देने से आवश्यक दवाओं की उपलब्धता तय नहीं हो सकती। निर्देश कागज पूर्ति हैं और उनको अमली जामा पहनाना एक जरूरी कदम। उम्मीद की जाना चाहिए कि यह जरूरी कदम समय रहते उठा लेना चाहिए।
सरकार ने तो लॉकडाउन के चलते आम जन तक अति-आवश्यक वस्तुएँ सही समय और सही कीमत पर पहुँच सके इसीलिए आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून (एस्मा) भी लगाया है। पर कई जगह कुछ लोगों की लापरवाही और अनदेखी कई लोगों को कोरोना वायरस से बचाने की कवायद में पूर्व से शरीर में मोजूद बीमारी से असमय प्राण ले सकती है ।
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लेखक सीहोर(मध्यप्रदेश) से होकर वरिष्ठ पत्रकार हैं।


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