लेखक 

शैलेष तिवारी 

सबल देश... चीन, इटली, अमेरिका, स्पेन, फ्रांस आदि आदि अनेक... लड़ रहे हैं कोरोना के तूफान से...। उसी तूफान से उक्त देशों की तुलना में निर्बल भारत का भी मुकाबला है....। 
लेकिन एक अंतर है.... सबल देश साधन संपन्न हैं..... भारत साधना संपन्न....। 
अफसोस जिस धरती पर... भक्ति नृत्य करती है... एकांत आनंद का मार्ग बताता है... उस भूमि के रहवासी.... 21 दिन के लॉक डाउन में.. खुद को अलग थलग महसूस कर... अवसाद जैसी स्थिति को प्राप्त हो रहे हैं...। अवसाद यानि डिप्रेशन... यह स्थिति खतरनाक है...। शायद उत्स्वधर्मी लोग हैं... यही विचार कर पीएम ने दीपोत्सव मनाने का आव्हान किया है...। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत है... अंधेरा दूर करने के लिए रोशनी... दिये की करना....। एकता का प्रदर्शन भी है.....। इस काम की कई तरह से व्याख्या हो चुकी है... जैसे सांस्कृतिक धरातल पर.... कुछ गुणी जनों ने वैज्ञानिक व्याख्या कर.. नौ मिनट के दीप प्रज्वलन से कोरोना वायरस के खत्म हो जाने तक का दावा भी कर दिया....। ईश्वर करे ऐसा हो जाए... विज्ञान की हकीकत वैज्ञानिक जाने...। 
इसी दीप प्रज्वलन को यथार्थ के धरातल भी टटोला जाए....।
 पहले बात उस समय की जब... सभी अपने घरों की लाइट बंद कर देंगे...। फिर दसवें मिनट में होगा इम्तिहान... ग्रिड का... वह फैल होती है या नही...? राज्यों के बिजली बोर्डों ने अपील की है.... केवल रोशनी वाले साधन को बंद करें... अन्य बिजली के उपकरणों को चालू रखें...। इस पर कितना अमल हो पाता है.. ? कहीं ये परेशानी का सबब न बन जाए..। 
अब बात उन घरों की.... जहाँ श्रमिकों के रहवास हैं....असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या... 40 करोड़ के करीब बताई जाती है.... जिनका कोई रिकार्ड नहीं.. जिनका कोई मालिक नहीं.... जो सुबह कुआँ खोदते हैं... और शाम को पानी पीते हैं....। इन के घरों में सब्जी बघारने को तेल नहीं है... दीपक कहाँ से जलाएँ..? पूछने पर कहते हैं... कोई तेल दे देगा तो जला देंगे.. हमारे पास तो है नहीं...। मोमबत्ती जलाओ... ये कहने पर पैसा नहीं होने का तर्क.... भीगी आँखों से देते हैं...। उत्तर भारत के अनेक शहर की श्रमिक बस्तियों में... सरकारी चावल पहुँच रहा है... बच्चों को रोटी खाने की आदत है...पेट नहीं भर रहा बच्चों का....यह भी शिकायत है उनकी..। 
ये वह दीपक है .... जिनके श्रम के दिये से... जीडीपी जगमगाती है... इमारते आसमान चूमती हैं.... कारखाने चलते हैं... पहिये सड़कों पर दौड़ लगाते हैं.... लेकिन इनकी जिंदगी का दिया.... टिमटिमा रहा है.. कब बुझ जाए नहीं कह सकते..। कुछ का बुझ भी गया है.... शहर से गाँव पहुंचने की जद्दो जेहद में....इनकी संख्या कोरोना से मरने वालो की संख्या से कुछ ही कम होगी.....। वह अपने गाँव... शहर से लौटते वक्त कोरोना के वाहक न ही बने हों तो अच्छा है...। बन गए होंगे तो हालात... मुश्किल से मुश्किल हो सकते हैं....। 
पीएम साहब  कोरोना को लेकर देश से तीन बार मुखातिब हुए... हर बार जनता से अपेक्षा की....। गण ने भी तंत्र के मुखिया का मंत्र माना.....संकट का समय है.... बिना नागरिक सहयोग के सरकार कुछ नहीं कर सकती... यह जान कर.. और उससे ज्यादा मानकर... जन का मन आपके साथ... कदम ताल कर रहा है... आपके हर संदेश का दिल से पालन कर रहा है.. यह उसका कर्तव्य भी है... देश के प्रति...। इसी भाव से खडा भी होगा आज रात.... रोशनी का जरिया बनकर...। इस उम्मीद के साथ आप भी रोशन करें न... उन मजदूरों के घरों को.. आटा चावल और दाल के दियों से... । जो सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं है...। जो फंसे पड़े गरीब हैं... उन्हें गंतव्य तक पहुंचाएं...। पांच लाख के करीब ट्रक ड्रायवर और क्लीनर सड़कों पर गंदा पानी पीकर दिन गुजार रहे हैं... उनकी भी सुध लें...। आवाजाही नहीं होने से दवाओं का स्टॉक खुट रहा है... उसकी आपूर्ति की तरफ तंत्र को सक्रिय करें...। मिल बंद होने से.. आटा दाल की किल्लत... लॉक डाउन के दौरान नहीं आए... ऐसी व्यवस्था कराएं..। गंभीर प्रकृति की बीमारियों के मरीजों.. के लिए ये हालात मुश्किल भरे हैं.... उनके लिए योजना की घोषणा करें...। 
मेडिकल स्टाफ बिना पी पी ई के कोरोना से लड़ रहा है... उन योद्धाओं को आवश्यक सामान उपलब्ध कराएं...। जाँच किट की कमी की वजह से.. कितने ही संक्रमित... कोरोना का उपहार.. अपने प्रियजनों को दे देंगे.. इसके लिए कुछ प्रयास.. सरकारी स्तर से... आज लॉक डाउन के बारहवें दिन भी होना बाकी हैं..। 
लॉक डाउन के बाद के जीवन.... को रफ्तार देने की योजना पर... नागरिक आपसे कुछ सुनना चाहते हैं...। आर्थिक रूप से बदहाल व्यवस्था को संभालने.. के बारे में आपके जादूई चमत्कार... का इंतजार हो रहा है...। वैसे आर्थिक आपातकाल की तरफ आपके बढे हुए कदमों से जनता... अभी वाक़िफ़ नहीं है...। यह भी आजाद भारत के इतिहास के अभूतपूर्व घटना होगी...। 

इस मौके पर गीतकार भरत व्यास की यह लाइन प्रसांगिक हैं:-

इक रात अंधियारी, थीं दिशाएं कारी-कारी मंद-मंद पवन था चल रहाअंधियारे को मिटाने, जग में ज्योत जगाने एक छोटा-सा दीया था कहीं जल रहा अपनी धुन में मगन, उसके तन में अगन उसकी लौ में लगन भगवान की ....। 

यही लो समापन करे.... कोरोना के अंधकार का... । कामना तो यही है... लेकिन ख्याल हैं कि मानते नहीं.... 

वर्तमान परिदृश्य मे स्व. दुष्यन्त कुमार की यह दो पंक्ति मौजू साबित होती है कि,

कैसी मशालें लेके चले तीरगी (अंधकार) आप,              

जो रोशन थीं वो भी सलामत नहीं रही।

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