हमारे पूरे देश मे रोटी ही तो है, जो अधिकांश हर इंसानो की कमज़ोरी बनी हुई है । जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में शामिल जो है।
आज जो बेसहारा मजदूरों की दशा हो रही है वो नही होती, अगर उन्हें जरूरत के हिसाब से रोटी भर मिल गई होती।
हमारे हुक्मरान और लीडर भी गजब के है, किसी को तकलीफ देख कर सिर्फ लफ्जों से दुःख प्रकट कर देते है, और अगर ज्यादा शोक मनाना है तो कलम के द्वारा लिख कर उपदेश देगें. इससे भी दिल ना भरे तो न्यूज चैनल पर खुद को प्रसारित कर के भाषण देने के बाद चैन की नींद सो जाते है । मेरा मतलब किसी को ठेस पहुंचाना नही है, मै कहना चाहती हूँ क्या ये सब कुछ कर के उन मज़बूरों का जो मीलों सफर करते हुए आ रहे है, क्या आपके शोक प्रकट करने से उनकी पांव के छाले कम हो गए । क्या आपके शब्दों से उनकी भूख मिट जाएगी, क्या पोटली के बोझ से उनकी कंधो का दर्द कम हो गया । और तो और उनको एक टाईम के खाना दे देने से उनकी दिन और रात की भूख नहीं मिट सकती। और न ही उनके प्यास और भूख से बिलखते छोटे छोटे बच्चो को आराम मिल सका। न ही उनके परिवार जो बैचैनी से उनकी राहे देख रहे है उन्हे चैन मिल पाया ।
लाॅक डाऊन से पहले उन्हें पर्याप्त समय दिया जाता तो उन्हे इतनी मुसीबत का सामना करना नहीं पड़ता ।
जो अपने घरों में रहकर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं उन्हे ( कोरोना ) का भय सता रहा है । न कि उन गरीब मजदूरो को, उन्हें तो बस एक गम सता रहा है कि कैसे पैदल चल कर अपने घर पहुंच जाऊं, कैसे मै इस सफर मे अपने बच्चो का पेट भरूं इस कड़कती धूप मे कहाँ छांव मिले तो मै थोड़ा छाया मे खुद को आराम दूँ ।
हमारे देश के नेता ऐसा नेतृत्व करते है, कि शब्दो के जाल मे कब फंसा दे अच्छे अच्छे लोगो को तो पता ही नहीं चलता ।
ये बिल्कुल सत्य और स्पष्ट है कि सिर्फ एक गलत फैसले से इन मजदूरो को तकलीफ झेलनी पड रही है । हजारों किलोमीटर दूर पैदल चलकर अपनी मंजिल को तय कर रहे है । हम नागरिक तो शब्दो से सिर्फ दुख ही जता सकते है और कर भी क्या सकते है ।ऐसा कहा जा सकता है लेकिन यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि समाज के ही संगठनों ने आगे आकर आम नागरिकों के सहयोग से इन मजदूरों की भूख प्यास मिटाने के अपने स्तर के पूरे प्रयास किए। जो उन सरकारो को करना थे जो अलग अलग नामों से पांच रुपये में भोजन कराने की योजनाएं चला रही हैं। क्या इसी दर से उन मजदूरों का पेट भरने का काम नहीं का सकती थी जो उनके राज्य के राजमार्गों से गुजर कर अपने घरो को लौट रहे थे।
अब तक जो सुनने मे आ रहा है कि मजदूरो की मदद करना चाहती है सरकार उसमे भी तर्क वितर्क हो रहे हैं। सरकार दावा करती है कि उसने बीस लाख करोड़ का पैकेज दिया है लेकिन राशन कार्ड धारी गरीबों के अलावा सरकारी सूचियों से गायब मजदूरों की भूख का आंकलन इस घोषणा में शामिल ही नहीं है। तब ऐसा मजदूर क्या करे, भूख से मरे या कोरोना से? क्या उसकी नियति यही है। अपोजीशन पार्टियां भी इसमें अपनी राजनीतिक जमीन की तलाश में व्यस्त दिखाई दे रही है ।
जहैं बड़े स्तर के लोगो को बड़े सम्मान से उनके घर पहुँचाने मे मदद की जा रही है और अन्य सरकारी सुविधा दी जा रही है । उससे कुछ कम ही सही मजबूर मजदूरों के लिए भी समय पर कुछ इंतजाम का दिए गए होते।
इस देश मे स्तर को मापा जाता है इस देश का यही हकीकत है कि इमारतों को आकार देने वाले नजरों में ही नहीं हैं लेकिन उनमें बैठने वालों के लिए सारी सरकारी सुविधाएं प्रदान की जा रहीं हैं। जनता को भेद के नजरिये से देखने वाले सत्ताधीश इस तरह भारत को विश्व गुरु बना पाएंगे। यही कारण है आज हमारा आगे बढ़ता हुआ महान देश पीछे की ओर जाते हुए दिखाई दे रहा है । जब कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर नागरिक के बारे मे सरकार को जानकारी होती है कौन कहाँ है कितने लोग कहाँ फंसे है पर इस को नजरअंदाज कर के सरकार क्या साबित करना चाहती है।
आज जो बेसहारा मजदूरों की दशा हो रही है वो नही होती, अगर उन्हें जरूरत के हिसाब से रोटी भर मिल गई होती।
हमारे हुक्मरान और लीडर भी गजब के है, किसी को तकलीफ देख कर सिर्फ लफ्जों से दुःख प्रकट कर देते है, और अगर ज्यादा शोक मनाना है तो कलम के द्वारा लिख कर उपदेश देगें. इससे भी दिल ना भरे तो न्यूज चैनल पर खुद को प्रसारित कर के भाषण देने के बाद चैन की नींद सो जाते है । मेरा मतलब किसी को ठेस पहुंचाना नही है, मै कहना चाहती हूँ क्या ये सब कुछ कर के उन मज़बूरों का जो मीलों सफर करते हुए आ रहे है, क्या आपके शोक प्रकट करने से उनकी पांव के छाले कम हो गए । क्या आपके शब्दों से उनकी भूख मिट जाएगी, क्या पोटली के बोझ से उनकी कंधो का दर्द कम हो गया । और तो और उनको एक टाईम के खाना दे देने से उनकी दिन और रात की भूख नहीं मिट सकती। और न ही उनके प्यास और भूख से बिलखते छोटे छोटे बच्चो को आराम मिल सका। न ही उनके परिवार जो बैचैनी से उनकी राहे देख रहे है उन्हे चैन मिल पाया ।
लाॅक डाऊन से पहले उन्हें पर्याप्त समय दिया जाता तो उन्हे इतनी मुसीबत का सामना करना नहीं पड़ता ।
जो अपने घरों में रहकर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं उन्हे ( कोरोना ) का भय सता रहा है । न कि उन गरीब मजदूरो को, उन्हें तो बस एक गम सता रहा है कि कैसे पैदल चल कर अपने घर पहुंच जाऊं, कैसे मै इस सफर मे अपने बच्चो का पेट भरूं इस कड़कती धूप मे कहाँ छांव मिले तो मै थोड़ा छाया मे खुद को आराम दूँ ।
हमारे देश के नेता ऐसा नेतृत्व करते है, कि शब्दो के जाल मे कब फंसा दे अच्छे अच्छे लोगो को तो पता ही नहीं चलता ।
ये बिल्कुल सत्य और स्पष्ट है कि सिर्फ एक गलत फैसले से इन मजदूरो को तकलीफ झेलनी पड रही है । हजारों किलोमीटर दूर पैदल चलकर अपनी मंजिल को तय कर रहे है । हम नागरिक तो शब्दो से सिर्फ दुख ही जता सकते है और कर भी क्या सकते है ।ऐसा कहा जा सकता है लेकिन यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि समाज के ही संगठनों ने आगे आकर आम नागरिकों के सहयोग से इन मजदूरों की भूख प्यास मिटाने के अपने स्तर के पूरे प्रयास किए। जो उन सरकारो को करना थे जो अलग अलग नामों से पांच रुपये में भोजन कराने की योजनाएं चला रही हैं। क्या इसी दर से उन मजदूरों का पेट भरने का काम नहीं का सकती थी जो उनके राज्य के राजमार्गों से गुजर कर अपने घरो को लौट रहे थे।
अब तक जो सुनने मे आ रहा है कि मजदूरो की मदद करना चाहती है सरकार उसमे भी तर्क वितर्क हो रहे हैं। सरकार दावा करती है कि उसने बीस लाख करोड़ का पैकेज दिया है लेकिन राशन कार्ड धारी गरीबों के अलावा सरकारी सूचियों से गायब मजदूरों की भूख का आंकलन इस घोषणा में शामिल ही नहीं है। तब ऐसा मजदूर क्या करे, भूख से मरे या कोरोना से? क्या उसकी नियति यही है। अपोजीशन पार्टियां भी इसमें अपनी राजनीतिक जमीन की तलाश में व्यस्त दिखाई दे रही है ।
जहैं बड़े स्तर के लोगो को बड़े सम्मान से उनके घर पहुँचाने मे मदद की जा रही है और अन्य सरकारी सुविधा दी जा रही है । उससे कुछ कम ही सही मजबूर मजदूरों के लिए भी समय पर कुछ इंतजाम का दिए गए होते।
इस देश मे स्तर को मापा जाता है इस देश का यही हकीकत है कि इमारतों को आकार देने वाले नजरों में ही नहीं हैं लेकिन उनमें बैठने वालों के लिए सारी सरकारी सुविधाएं प्रदान की जा रहीं हैं। जनता को भेद के नजरिये से देखने वाले सत्ताधीश इस तरह भारत को विश्व गुरु बना पाएंगे। यही कारण है आज हमारा आगे बढ़ता हुआ महान देश पीछे की ओर जाते हुए दिखाई दे रहा है । जब कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर नागरिक के बारे मे सरकार को जानकारी होती है कौन कहाँ है कितने लोग कहाँ फंसे है पर इस को नजरअंदाज कर के सरकार क्या साबित करना चाहती है।


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