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मंजिल की तो सबको चाहत किंतु पथिक हैं चंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !

कुछ भी कह लें कहने वाले, अडिग राह पर अपनी रहना |
कितना  भी वो  जोर  लगाएँ तू  अपनी ही  लय से बहना |
पत्थर  छोटे  और   बड़े   कुछ    राह  रोकने   तेरी  आएँ |
काले - काले  बादल  कितना  आसमान  से  जोर लगाएँ |
कभी न रुकना कभी न झुकना मन को वश में रखना होगा |
अंत समय ही सही विजय का स्वाद तुझे तो चखना होगा |

तू  दरिया  अपने  प्रवाह  को  करना  कभी न बंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !

तुझे  राह   से  भटकाने   को  जाल  बिछाने   आ   जाएँगे |
तेरे    सपनो    के    सौदागर    तुझे    हराने   आ   जाएँगे |
कुछ मरोड़ कर और तोड़ कर तुझे झुकाने की कोशिश में |
मत करना  समझौता  उनसे  उन्हें  मनाने  की  कोशिश में |
ऐसा न हो  कर्मठ  तुझ  सा एक  विफल साधक बन जाए |
तू  रह  जाए  पथिक प्रेम  यह मंजिल में बाधक  बन जाए |

सपनों अपनो में हो जाता है अक्सर ही द्वंद,
सोच तम आगे बढ़ मतिमंद !

इस  धरती से उस अंबर  का प्रेम  गीत  लिखने का सपना |
बुझी सांझ से उस दिनकर का प्रेम गीत लिखने का सपना |
तेरा  ही  तो सपना  था यह  क्यों आखिर अब चूर हो  रहा |
आखिर क्या है विषम  परिस्थिति तू खुद से ही दूर हो रहा |
तेरे  सपने  बस   तेरे  हैं   इनका   सौदा   उचित   नहीं   है |
जो  कुछ  भी  है  मुट्ठी  में  है  कुछ  माथे पर रचित नहीं है |

अपने सपनो की चादर में तू न लगा पैबंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !

अमित हिंदुस्तानी 
लखीमपुर खीरी |
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