लेखक
मंजिल की तो सबको चाहत किंतु पथिक हैं चंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !
कुछ भी कह लें कहने वाले, अडिग राह पर अपनी रहना |
कितना भी वो जोर लगाएँ तू अपनी ही लय से बहना |
पत्थर छोटे और बड़े कुछ राह रोकने तेरी आएँ |
काले - काले बादल कितना आसमान से जोर लगाएँ |
कभी न रुकना कभी न झुकना मन को वश में रखना होगा |
अंत समय ही सही विजय का स्वाद तुझे तो चखना होगा |
तू दरिया अपने प्रवाह को करना कभी न बंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !
तुझे राह से भटकाने को जाल बिछाने आ जाएँगे |
तेरे सपनो के सौदागर तुझे हराने आ जाएँगे |
कुछ मरोड़ कर और तोड़ कर तुझे झुकाने की कोशिश में |
मत करना समझौता उनसे उन्हें मनाने की कोशिश में |
ऐसा न हो कर्मठ तुझ सा एक विफल साधक बन जाए |
तू रह जाए पथिक प्रेम यह मंजिल में बाधक बन जाए |
सपनों अपनो में हो जाता है अक्सर ही द्वंद,
सोच तम आगे बढ़ मतिमंद !
इस धरती से उस अंबर का प्रेम गीत लिखने का सपना |
बुझी सांझ से उस दिनकर का प्रेम गीत लिखने का सपना |
तेरा ही तो सपना था यह क्यों आखिर अब चूर हो रहा |
आखिर क्या है विषम परिस्थिति तू खुद से ही दूर हो रहा |
तेरे सपने बस तेरे हैं इनका सौदा उचित नहीं है |
जो कुछ भी है मुट्ठी में है कुछ माथे पर रचित नहीं है |
अपने सपनो की चादर में तू न लगा पैबंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !
अमित हिंदुस्तानी
लखीमपुर खीरी |
मंजिल की तो सबको चाहत किंतु पथिक हैं चंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !
कुछ भी कह लें कहने वाले, अडिग राह पर अपनी रहना |
कितना भी वो जोर लगाएँ तू अपनी ही लय से बहना |
पत्थर छोटे और बड़े कुछ राह रोकने तेरी आएँ |
काले - काले बादल कितना आसमान से जोर लगाएँ |
कभी न रुकना कभी न झुकना मन को वश में रखना होगा |
अंत समय ही सही विजय का स्वाद तुझे तो चखना होगा |
तू दरिया अपने प्रवाह को करना कभी न बंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !
तुझे राह से भटकाने को जाल बिछाने आ जाएँगे |
तेरे सपनो के सौदागर तुझे हराने आ जाएँगे |
कुछ मरोड़ कर और तोड़ कर तुझे झुकाने की कोशिश में |
मत करना समझौता उनसे उन्हें मनाने की कोशिश में |
ऐसा न हो कर्मठ तुझ सा एक विफल साधक बन जाए |
तू रह जाए पथिक प्रेम यह मंजिल में बाधक बन जाए |
सपनों अपनो में हो जाता है अक्सर ही द्वंद,
सोच तम आगे बढ़ मतिमंद !
इस धरती से उस अंबर का प्रेम गीत लिखने का सपना |
बुझी सांझ से उस दिनकर का प्रेम गीत लिखने का सपना |
तेरा ही तो सपना था यह क्यों आखिर अब चूर हो रहा |
आखिर क्या है विषम परिस्थिति तू खुद से ही दूर हो रहा |
तेरे सपने बस तेरे हैं इनका सौदा उचित नहीं है |
जो कुछ भी है मुट्ठी में है कुछ माथे पर रचित नहीं है |
अपने सपनो की चादर में तू न लगा पैबंद,
सोच मत आगे बढ़ मतिमंद !
अमित हिंदुस्तानी
लखीमपुर खीरी |


Post A Comment: