लेखिका 

टूटी हूं कई बार टूट कर फिर संभल गई

क्या होगा मां बापू का सोच कर फिर दहल गई..

टुकड़े उठाकर चल जल्दी

 फिर एक कदम और
पर चुभन टूटे टुकड़ों की हर बार हुई..

एक इल्म सा तो था टूटने का खड़ी चाहे हर बार हुई

 कोशिश तमाम के टूटे टुकड़े बिखरे ना इसी कोशिश में लहुलुहान  कई बार हुई..

सजा लिया  चेहरे पर हर बार  नया  चेहरा 

जिस पर रहता  सद चुभन का पहरा
टूटकर संभलना,संभल कर फिर टूटना 
यह वारदात मेरे साथ कई बार हुई।

बसंती  सामन्त


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परिचय

बसंती सामंत, ग्राम बिरिया, विकासखंड खटीमा, जिला ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड की निवासी हैं। गृहणी होने के साथ आप साहित्य सेवा में संलग्न है। अधूरे अल्फ़ाज के नाम से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रही हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है। 

संपादक
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