लेखिका
"बेरंग सी है जिंदगी ,कुछ तो रंग भरो "
वैधव्य स्त्री जीवन का ऎसा शाश्वत सत्य जो उसे हर युग में हर मोड़ पर आईना दिखाता रहेगा ----जहां उसका अस्तित्व पुरुषत्व से उपजता,पनपता फिर उसी में विलीन हो जाता ,जहां बच जाते है ,उसके हिस्से के अनकहे अज्ञात दर्द-----जहां से निकल कर उसकी जिंदगी के रास्ते रंगो से होकर नहीं गुजरते---वैधव्य यूं ही नहीं चलता ,इसके साथ साथ चलते है कसकते सुलगते,सवाल ----जहां साथी के मर जाने से सपने भी मर जाते है ---वहां मरे हुये सपनों को जीवन देने की कोशिश में स्त्री मन को सहानुभूति से परखने ,और समाज को उसकी विवशताओ को लेकर संवेदनशील होना होगा ---जहां परिवर्तन ही जीवन का नियम हो --परिवर्तन अच्छा हो या बुरा --जहां उसे स्वीकारना ही नियति हो--वहां नियति की मार झेलता वैधव्य ---जहां अकेलेपन की पीड़ा और संत्रास उसके वैधव्य को कभी बीतने नहीं देता --हर वक्त उसके आस-पास कभी संवेदना तो कभी अवेहलना बन जीवित रहता है---आम जीवन से गुजरते उसके वैधव्य के एहसास को ताउम्र जिंदा रखता है --आखिर किसने रचा औरत के हिस्से में वैधव्य का सूना संसार क्यूं दिया औरत को अवमानना का घना अंधकार जहां उसे इजाजत नहीं ज़माने की अपने वैधव्य को भूल जाने की ,हताशा के तल्ख़ एहसासों को खारिज कर देने की वैधव्य से शोक संतप्त हदय को जहां दर्द पहले ही विदार रहा हो वहां इजाजत नहीं उसे दायरो से बाहर आने की ---जहां है समाज के द्वारा थोपा गया अकेलापन ,जहां शापित है स्त्रीत्व अपने वैधव्य से ---जहां स्त्री होने का दण्ड उसे चुकाना होता है --अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व से जहां वैधव्य अवसाद का शिकार हैं ---जीवन के हर रंग पर सवाल खड़ा करती है ,समाज की सवालिया निगाह , मानो वैधव्य नियति नहीं ,कोई अपराध है --उसकी पीड़ा से बेखबर वेदना का एक पूरा संसार है ---वहां वैधव्य से लिपटे कई सवाल है ---? विधाता ने जब स्त्री पुरूष की रचना एक ही जीवन से की तो फिर ये दोहरे मापदंड क्यूं--? क्यूं हो ऐसे दुराव एक के हिस्से में गमों की आवाजाही और दूसरे के हिस्से में रोशनाई ---क्यूं सहती है स्त्री असहाय वेदना को ,वेदना के यही क्षण भरोसा चाहते है की पीड़ा के क्षणों में कोई उसके साथ है --जीवन की विपरीत परिस्थितयों में जहां कर्तव्य पालऩ के गहरे बोध तो है पर आंकाक्षाएं बेरंग है ---जहां सामने आकाश तो है ,पर उड़ान के वो पंख नहीं --जहां पुरुषत्व ने तय की है स्त्रीत्व के पंखो और रंगो की सीमाये ---पर उड़ान की एक दबी सी चाह है ----नि:स्वार्थ शंकारहित पंरिदो की तरह उड़ान भरता हुआ जीवन का एक ऐसा साथी जो जीवन की आकांक्षाओं में रंग भरे , जहां वैधव्य की काली रातें भी दिन के प्रकाश की तरह रोशन और दिन जाडो की धूप की तरह खिले हो ----- पर क्या वैधव्य कभी बीतेगा --क्या बीतकर आने वाले हालातो को बेहतर कर जायेगा ।
मंजु श्रीवास्तव
"बेरंग सी है जिंदगी ,कुछ तो रंग भरो "
वैधव्य स्त्री जीवन का ऎसा शाश्वत सत्य जो उसे हर युग में हर मोड़ पर आईना दिखाता रहेगा ----जहां उसका अस्तित्व पुरुषत्व से उपजता,पनपता फिर उसी में विलीन हो जाता ,जहां बच जाते है ,उसके हिस्से के अनकहे अज्ञात दर्द-----जहां से निकल कर उसकी जिंदगी के रास्ते रंगो से होकर नहीं गुजरते---वैधव्य यूं ही नहीं चलता ,इसके साथ साथ चलते है कसकते सुलगते,सवाल ----जहां साथी के मर जाने से सपने भी मर जाते है ---वहां मरे हुये सपनों को जीवन देने की कोशिश में स्त्री मन को सहानुभूति से परखने ,और समाज को उसकी विवशताओ को लेकर संवेदनशील होना होगा ---जहां परिवर्तन ही जीवन का नियम हो --परिवर्तन अच्छा हो या बुरा --जहां उसे स्वीकारना ही नियति हो--वहां नियति की मार झेलता वैधव्य ---जहां अकेलेपन की पीड़ा और संत्रास उसके वैधव्य को कभी बीतने नहीं देता --हर वक्त उसके आस-पास कभी संवेदना तो कभी अवेहलना बन जीवित रहता है---आम जीवन से गुजरते उसके वैधव्य के एहसास को ताउम्र जिंदा रखता है --आखिर किसने रचा औरत के हिस्से में वैधव्य का सूना संसार क्यूं दिया औरत को अवमानना का घना अंधकार जहां उसे इजाजत नहीं ज़माने की अपने वैधव्य को भूल जाने की ,हताशा के तल्ख़ एहसासों को खारिज कर देने की वैधव्य से शोक संतप्त हदय को जहां दर्द पहले ही विदार रहा हो वहां इजाजत नहीं उसे दायरो से बाहर आने की ---जहां है समाज के द्वारा थोपा गया अकेलापन ,जहां शापित है स्त्रीत्व अपने वैधव्य से ---जहां स्त्री होने का दण्ड उसे चुकाना होता है --अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व से जहां वैधव्य अवसाद का शिकार हैं ---जीवन के हर रंग पर सवाल खड़ा करती है ,समाज की सवालिया निगाह , मानो वैधव्य नियति नहीं ,कोई अपराध है --उसकी पीड़ा से बेखबर वेदना का एक पूरा संसार है ---वहां वैधव्य से लिपटे कई सवाल है ---? विधाता ने जब स्त्री पुरूष की रचना एक ही जीवन से की तो फिर ये दोहरे मापदंड क्यूं--? क्यूं हो ऐसे दुराव एक के हिस्से में गमों की आवाजाही और दूसरे के हिस्से में रोशनाई ---क्यूं सहती है स्त्री असहाय वेदना को ,वेदना के यही क्षण भरोसा चाहते है की पीड़ा के क्षणों में कोई उसके साथ है --जीवन की विपरीत परिस्थितयों में जहां कर्तव्य पालऩ के गहरे बोध तो है पर आंकाक्षाएं बेरंग है ---जहां सामने आकाश तो है ,पर उड़ान के वो पंख नहीं --जहां पुरुषत्व ने तय की है स्त्रीत्व के पंखो और रंगो की सीमाये ---पर उड़ान की एक दबी सी चाह है ----नि:स्वार्थ शंकारहित पंरिदो की तरह उड़ान भरता हुआ जीवन का एक ऐसा साथी जो जीवन की आकांक्षाओं में रंग भरे , जहां वैधव्य की काली रातें भी दिन के प्रकाश की तरह रोशन और दिन जाडो की धूप की तरह खिले हो ----- पर क्या वैधव्य कभी बीतेगा --क्या बीतकर आने वाले हालातो को बेहतर कर जायेगा ।
मंजु श्रीवास्तव


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