सुनो साँझ!_
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पल भर ठहरती
और करती बात मुझसे
ऐ साँझ...
तू ठहरती क्यों नहीं
सुबह के मानिंद सी लगती कभी
तो कभी स्याह काली रातों की
तू... तुझसी कब लगती है?
क्या पहाड़ी के पीछे
जो उगता है चंदा
संग उसके खेलती है तू...
या रश्मि से अठखेलियाँ करती
दिवाकर के झूले पर झूलती है तू...
साँझ...
तुम प्रिय हो मुझे
क्षितिज संग तुम्हारे हँसता है
और मैं तुम्हारे संग...
तुम्हारा सिंदूरी रूप
मुझे मेरे माथे की बिंदी लगता है
जिसे सजाकर अपने माथे पे
झूमती हूँ मैं!
तुम्हें पता है...
जब तुम ठंडी बयार संग लाती हो
मैं महक उठती हूँ,
चहक उठती हूँ,
संग तुम्हारे झूम उठती हूँ,
और हँस पड़ती हूँ अनायास ही...
सुनो साँझ...
इतनी जल्दी न जाया करो
पल भर ठहर जाओ
और करो बात मुझसे!
#शिल्पी अग्रवाल, सुलतानपुर, उप्र
---------------------परिचय
शिल्पी अग्रवाल दरियापुर सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश की निवासी हैं।साहित्य सेवा के धर्म को आप निभाती रही हैं। एकल काव्य संग्रह 'तुम रहोगे न मुझमें' तथा साझा संकलन 'कविता अभिराम' व 'अनुभूतियाँ प्रेम प्रकाशित हो चुकी हैं।
सम्मान एवं पुरुस्कार भी प्राप्त हुए हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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