समाज को बदलना है तो पहले खुद को बदलने की कोशिश करें ।
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लेखिका
नए युग और नए समाज को जन्म देने की चाह आज विश्व के हर कोने मे प्रबल है । ऐसा भी कहा जा सकता है कि समाज मानवता नई जीवन दृष्टि और जीवन मल्यों के जन्म की प्रसव पीड़ा को अनुभव कर रही है । इंसानियत का इतिहास एक नए निर्माण मोड़ पर आकर खड़ा है उसे पूरा करना कैसे संभव है ।
समाज के क्रांति के संबंध में सोचते समय वयक्ति को बांध देने की भुल सहज ही हो सकती है और होती है । यह भुल स्वभाविक लगती है ।समाज किस वस्तु की भांति नही की उसे बाहर से एक बार ही मे पुरी तरह बदला जा सके । समाज की आत्मा समाज के रहने वाले व्यक्तियों मे है ।व्यक्ति ही अंततः है समाज का प्राण है । इस कारण समाज की जीवन निति में कोई भी अमुल्य परिवर्तन व्यक्ति द्वारा ही प्रारंभ हो सकता है ।
समाज का तात्विक परिवर्तन बह्रा क्रांति से संभव नही हो सकता , पर समाज के शारीरिक और आंतरिक परिवर्तन का अर्थ क्या है?
मेरी दृष्टि से शारीरिक परिस्थितियों के परिवर्तन दवारा मानव हृदय आत्मा मे परिवर्तन की आस्था है तथा मानव हदय की क्रांति दवारा समाज की स्थितियों मे परिवर्तन का विश्वास आत्मिक क्रांति का विश्वास है ।
इस कारण क्रांति का पहला कदम होगा आज की विचार पद्धति मे आमुल परिवर्तन "पर -दोष दर्शन " का नही "स्व -दोष - दर्शन " को अपनी विचार पद्धति का आधार बनाना होगा । क्या दोषों को खोजने बाहर जाने की जरूरत है? प्रत्यक व्यक्ति यदि अपने दोषों को मिटाने की महांक्रांति मे संग्लन हो जाऐ तो जीवन मे पड़ोसी के दोषों को देखने का अवकाश उसे मुश्किल से ही मिल सकता है ।
हमारा शत्रु बाहर नही है, वह तो प्रत्यक के भीतर है ।
हम सब समाज के बीज है । हम जैसे होते है समाज वैसा ही होता है । समाज को बदलना है तो पहले बीज को बदलना होगा क्योंकि बीज को बदले बिना वृक्ष को बदलना कब संभव हुआ है । जो कुछ मैं दुसरों मे ना पसंद करती हूं , उसे मुझे आज से छोड़ देने का प्रण लेना होगा । मैं ही पुराने कब्र और नवीन का जन्मदाता बनूंगीं यह बोध क्रंति संभव हो सके इस विचार को हर एक व्यक्ति मे जागृत होना जरूरी है ।
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लेखिका
नए युग और नए समाज को जन्म देने की चाह आज विश्व के हर कोने मे प्रबल है । ऐसा भी कहा जा सकता है कि समाज मानवता नई जीवन दृष्टि और जीवन मल्यों के जन्म की प्रसव पीड़ा को अनुभव कर रही है । इंसानियत का इतिहास एक नए निर्माण मोड़ पर आकर खड़ा है उसे पूरा करना कैसे संभव है ।
समाज के क्रांति के संबंध में सोचते समय वयक्ति को बांध देने की भुल सहज ही हो सकती है और होती है । यह भुल स्वभाविक लगती है ।समाज किस वस्तु की भांति नही की उसे बाहर से एक बार ही मे पुरी तरह बदला जा सके । समाज की आत्मा समाज के रहने वाले व्यक्तियों मे है ।व्यक्ति ही अंततः है समाज का प्राण है । इस कारण समाज की जीवन निति में कोई भी अमुल्य परिवर्तन व्यक्ति द्वारा ही प्रारंभ हो सकता है ।
समाज का तात्विक परिवर्तन बह्रा क्रांति से संभव नही हो सकता , पर समाज के शारीरिक और आंतरिक परिवर्तन का अर्थ क्या है?
मेरी दृष्टि से शारीरिक परिस्थितियों के परिवर्तन दवारा मानव हृदय आत्मा मे परिवर्तन की आस्था है तथा मानव हदय की क्रांति दवारा समाज की स्थितियों मे परिवर्तन का विश्वास आत्मिक क्रांति का विश्वास है ।
इस कारण क्रांति का पहला कदम होगा आज की विचार पद्धति मे आमुल परिवर्तन "पर -दोष दर्शन " का नही "स्व -दोष - दर्शन " को अपनी विचार पद्धति का आधार बनाना होगा । क्या दोषों को खोजने बाहर जाने की जरूरत है? प्रत्यक व्यक्ति यदि अपने दोषों को मिटाने की महांक्रांति मे संग्लन हो जाऐ तो जीवन मे पड़ोसी के दोषों को देखने का अवकाश उसे मुश्किल से ही मिल सकता है ।
हमारा शत्रु बाहर नही है, वह तो प्रत्यक के भीतर है ।
हम सब समाज के बीज है । हम जैसे होते है समाज वैसा ही होता है । समाज को बदलना है तो पहले बीज को बदलना होगा क्योंकि बीज को बदले बिना वृक्ष को बदलना कब संभव हुआ है । जो कुछ मैं दुसरों मे ना पसंद करती हूं , उसे मुझे आज से छोड़ देने का प्रण लेना होगा । मैं ही पुराने कब्र और नवीन का जन्मदाता बनूंगीं यह बोध क्रंति संभव हो सके इस विचार को हर एक व्यक्ति मे जागृत होना जरूरी है ।


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