लेखक 

एक सोच.... एक ख्याल
कैसे मिलो तुम ? 
कैसे पाऊं ? 
लगा नकाब
बिछा शतरंज
चाल पर चाल
बस जीत जाऊं
देह! 
हाँ ! देह....

सुनों! 
मुझे तुम ..?
सच .
तुम्हारी देह पसन्द 
उस समय तक.... जब तक
एक खिंचाव ,एक यौवन 
तब तक ..
भोग न लूँ 
देह....

कहाँ होता सन्तुष्ट मैं
प्रेम भरी बातो से 
सच्ची चाहतो से
खेलता 
खिलाता बातो को
मगर
नज़र ,सोच
देह..भोग..
जब नही रहता खिंचाव
न यौवन.... ढल जाती 
देह...

तो..
अंदर ही अंदर
जागी रहती
बढ़ती भूख 
उम्र क्या?
जब सुनता ,कहता
मर्द हमेशा जवां
तो भूख मेरी...
कैसे सोये
देख देह..

फिर
मुखोटे लगा
तरह -तरह के रूप बना
ख्वाब...सुनहरे  दिखा
बना और जोड़ लेता
झूठे .... सच्चे.. रिश्ते
पाने को 
दबोच लेता 
झट से भूलकर सब 
बन भेड़िया
देह..
--

पवन अरोड़ा,  दिल्ली

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