देशभक्ति और वर्तमान व्यापार की हकीकत
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जब से चीन का भारत की सीमाओं पर अतिक्रमण हुआ है, देश में गुस्सा देखा जा रहा है। ड्रैगन पर आर्थिक प्रतिबंध को भारत के लिए बड़ा मौका, कहकर लोग बहुत बड़े-बड़े भाषण झाड़ रहे हैं। स्वदेशी पर निर्भर होना अच्छा कदम है। सोई हुई और व्यापारियों की बंधक सरकार की आज नींद खुली है। सरकार व्यापारियों के हित को देखते हुए कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकती है।
लेकिन हमें ये बात भी याद रखनी होगी कि कोई भी नवजात एकदम से दौड़ने नहीं लगता। अमेरिका कोविड 19 से हो रही तबाही का सबसे बड़ा जिम्मेदार जिस चीन को मानता है, उसके खिलाफ अमेरिका में किस बड़ी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है? अमेरिका की ये नाराजगी भारत के लिए, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए और भारत के लोगों के लिए एक बड़ा मौका बन सकती है। हमें ऐसे बयानों की हकीकत भी जान लेनी होगी। महज अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाना बेवकूफी होगी। जो कई बार हमारी सत्ता ने की है।
भारत में घुसपैंठ की घटना की निंदा होने के साथ ही चीन से आयात होने वाली वस्तुओं के बहिष्कार और बैन की मांग बढ़ने लगी, प्रदर्शन और चीनी सामानों की होली भी जलायी जा रही है। जबकि केंद्र सरकार ने अभी इस तरह के किसी फ़ैसले की बात नहीं कही है। यहाँ तक की भारत के प्रधानमंत्री के भाषण में चीन का जिक्र तक नहीं आया है।
भारत के रेल और टेलिकॉम मंत्रालयों ने भविष्य में होने कुछ आयात पर रोक लगाने की ओर इशारा ज़रूर किया है। और इस बात की पुष्टि जरूर की है कि भाषण के साथ एक्शन भी हो रहा है। इस बीच कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने बहिष्कार किए जाने वाले 500 से अधिक चीनी उत्पादों की सूची भी जारी की है। भारत के कई शहरों में चीनी सामान का बहिष्कार करने वाले विरोध-प्रदर्शन भी हुए। लेकिन राष्ट्र भक्ति के उन्माद में हमें चुनौतियों को नहीं भूल जाना चाहिए । यह अक्लमंदी नहीं है।
पिछले दो दशकों में भारत और चीन के बीच का व्यापार 30 गुना बढ़ा है। यानी जहाँ 2001 में कुल व्यापार करीब तीन अरब डॉलर का था, तो 2019 आते-आते ये 90 अरब डॉलर छू रहा था। इस व्यापार में जिन चीज़ों की मात्रा तेज़ी से बढ़ी है उनमें दवाइयाँ शामिल हैं। ख़ासतौर से पिछले एक दशक के दौरान जब दवाइयों के आयात में 28% का उछाल दर्ज किया गया। वर्तमान में दवा निर्माताओं ने दावा किया है कि चीन से आयात रुकने की स्थिति में दवाओं के दाम कम से कम 40% तक बढ़ सकते हैं । देश में रिसर्च और डेवलपमेंट के नाम पर मात्र 0.9 % से भी कम जीडीपी का ही खर्चा होता है। इसका साफ मतलब है कि भारत में दवाओं का एकदम से निर्माण होना अभी तक हवा-हवाई ही है। हमे अपने संस्थानों को फिर से खड़ा करना होगा ।
हमारे देश की एक बड़ी समस्या यह भी है कि यहाँ के लोग जो नई खोज करते हैं उसे सीधे निर्माण प्रक्रिया से नहीं जोड़ा गया है और ये खाई बहुत से आविष्कारों को कागजों में ही रह जाने को मजबूर करती है । कई बार तो नए आविष्कार विदेशों द्वारा ही खरीद लिए जाते हैं और भारत का ब्रेन ड्रेन होता है । यही कारण है कि देश के अनेक होनहार युवा वैज्ञानिक और खोजी देश छोडकर नाम और पैसे के साथ अपनी संतुष्टि के लिए विदेश चले जाते हैं । आप ही सोचिए कि आपका जवान बच्चा कोई ले जाय तो आप पर क्या बीतेगी ? हमारा देश बहुत हद तक ऐसी ही स्थिति में है।
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2019-20 के दौरान भारत ने चीन से 1,150 करोड़ रुपए के फ़ार्मा प्रॉडक्ट्स आयात किए जबकि इसी दौरान चीन से भारत आने वाले कुल आयात क़रीब 15,000 करोड़ रुपए के थे। "कम्पिटिटिव स्टडीज़: लेसन्स फ़्रोम चाइना" नाम की किताब के लेखक और गुजरात फ़ार्मा एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर जयमन वासा का मानना है, "इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि चीन से आयात किए बिना हमें दिक्क़त हो सकती है।"
उन्होंने बताया, "भारत सरकार जब तक ज़्यादा से ज़्यादा फ़ार्मा पार्क या ज़ोन नहीं बनाएगी, तब तक चीन की बराबरी करना मुश्किल है क्योंकि उनका शोध बेहद ठोस है। इस बराबरी तक पहुँचने में हमें कई साल लग जाएंगे।"
हक़ीक़त यही है कि भारत में एपीआई (API) का उत्पादन बहुत कम है और जो एपीआई भारत में बनाया जाता है, उसके फ़ाइनल प्रोडक्ट बनने के लिए भी कुछ चीज़ें चीन से आयात की जाती हैं। यानी भारतीय कंपनियां एपीआई या बल्क ड्रग्स प्रोडक्शन के लिए भी चीन पर निर्भर हैं।
अंतरराष्ट्रीय फ़ार्मा एलायंस के सलाहकार और जायडस कैडिला ड्रग कंपनी के पूर्व मैन्यूफ़ैकचरिंग प्रमुख एसजी बेलापुर के मुताबिक़, "चीन से बल्क ड्रग (API) आयात करने की प्रमुख वजह कम क़ीमत है। वहाँ से आने वाली बल्क ड्रग की क़ीमत दूसरे देशों को तुलना में 30 से 35% कम होती है (इसमें भारत भी शामिल है) और ऐंटिबयोटिक या कैंसर के इलाज की दवाओं के मामले में तो भारत चीन पर ज़्यादा निर्भर है । "
तो डायबिटीज़, ब्लड-प्रेशर, थाइरॉड, गठिया, वायरल इंफ़ेक्शंस के लिए कच्चा माल या फिर कई प्रकार के सर्जिकल औजार और मेडिकल मशीनें, चीन से भारत आयात होने वाले फ़ार्मा उत्पादों की फ़ेहरिस्त भी बहुत लंबी है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में पेनसिलिन और ऐजिथ्रोमायसीन जैसी एंटिबायोटिक्स के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली 80 फ़ीसदी बल्क ड्रग या कच्चे माल का आयात चीन से होता है। चीन में दवाओं के निर्माताओं से लगातार मिलने वाले और ड्रग रिसर्च मैन्युफ़ैक्चरिंग के विशेषज्ञ डॉक्टर अनुराग हितकारी का कहना है कि, "चीन से बल्क ड्रग्स या कच्चे माल के आयात की बड़ी वजह दवा के दामों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना है।"
उन्होंने यह भी कहा, "एपीआइ या बल्क ड्रग्स के उत्पादन में बिजली का बड़ा योगदान रहता है। हाल कुछ समय पहले तक चीन में बिजली की क़ीमत भारत की तुलना में बहुत कम थी जिससे पूरी लागत कम आती थी। दूसरे, चीन की फ़ार्मा इंडस्ट्री देश की यूनिवर्सिटीज में होने वाले निरंतर शोध से जुड़ी रहती हैं जो दवा बनाने की रीढ़ की हड्डी माना जाता रहा है। किसी नई रिसर्च के होते ही उसे उत्पादन के उपयोग में लाने में उन्हें महारथ है। "
ज़ेज़ियांग, गुआंगडांग, शंघाई, जियांगसू, हेबेयी, निंगशिया, हारबिन जैसे कुछ चीनी प्रांत है, जहाँ से दवाओं को बनाने वाली बल्क ड्रग्स भारत आयात करता है। डॉक्टर अनुराग ने बताया, "इस कच्चे माल को इन प्रांतों से बीजिंग, शंघाई या हॉन्ग कॉन्ग के बंदरगाहों से ज़रिए भारत लाया जाता है ।"
रहा सवाल चीन से आने वाली 'सस्ती बल्क ड्रग्स' और उनकी क्वालिटी का, तो जायडस कैडिला ड्रग कम्पनी के पूर्व मैन्यूफ़ैकचरिंग प्रमुख एसजी बेलापुर ने कहा, "पहले तो कोई दिक्क़त नहीं होती थी लेकिन अब भारतीय ख़रीदारों को इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है कि वेंडर्स कौन हैं ।" उनके मुताबिक़, "ऐहतियात न बरतने पर कभी-कभी कच्चे माल की गुणवत्ता बेहद ख़राब भी हो सकती है।"
ऐसा नहीं है कि सीमा पर तनाव के चलते भारत में चीन से आयात होने वाली चीज़ों पर निर्भरता कम करने की मांग पहली बार उठ रही है। 2017 में भी दोनों देशों के सैनिकों के बीच डोकलाम में अच्छी-ख़ासी हाथापाई होने के बाद सीमा पर तनाव फैल गया था। तब भी चीन पर इस तरह की पाबंदी लगाने की बात होने लगी थी। भारत के फ़ार्मा उद्योग से भी इस तरह के स्वर सुनाई दिए थे जिनमें कहा गया था कि देश में एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (API) आत्म-निर्भरता लाने की ज़रूरत है लेकिन आँकड़े इशारा करते हैं कि आयात में कोई कमी नही आई।
2019 में जब चीन के वुहान प्रांत से कोरोना वायरस के संक्रमण और फिर लॉकडाउन की ख़बरें आनी शुरू हुईं तो भारतीय फ़ार्मा क्षेत्र में भी हड़कंप मच गया था क्योंकि बिना बल्क ड्रग्स या कच्चे माल के आयात के जेनेरिक दवाओं का उत्पादन भी संभव नहीं। गुजरात फ़ार्मा एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर जयमन वासा की राय साफ़ है, "अगर मैं कहूँ कि कोविड-19 की चुनौती मुश्किल समय में भारतीय फ़ार्मा सेक्टर के लिए एक बड़ा मौक़ा है तो ग़लत नहीं होगा। दवाओं के मामले में हमें चीन पर निर्भरता काम करनी है और इसके लिए सरकार की मदद भी ज़रूरी है । "
एक सवाल ये भी उठता है कि अगर भारत को बल्क ड्रग्स आत्म-निर्भर बनने में एक लंबा समय लगता है तो क्या तब तक चीन के अलावा दूसरे विकल्प मौजूद हैं? अंतरराष्ट्रीय फ़ार्मा एलायंस के सलाहकार एसजी बेलापुर की राय है कि, "अगर भारत को दवाई के क्षेत्र में चीन से आयात कम करना है तो स्पेन, इटली, स्विटज़रलैंड और कुछ दक्षिण अमरीकी देशों से इन ही आयात करना पड़ेगा। अब क्योंकि वो महँगे हैं तो दवाओं की क़ीमत भी बढ़ेगी। "
आख़िरकार, भारत में एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स (API) यानी बल्क ड्रग्स के भूत और भविष्य पर बात करते हुए ड्रग रिसर्च मैन्युफ़ैक्चरिंग विशेषज्ञ डॉक्टर अनुराग हितकारी ने कहा, "भारत में प्रदूषण संबंधी क्लियेरेंस कई स्तर पर लेने पड़ते थे जिसमें राज्य, केंद्र सरकार, पर्यावरण मंत्रलाय सभी के पास जाना पड़ता था । " उन्होंने आगे बताया, "कच्चा माल या बल्क ड्रग बनाने की सोचने वाले छोटे और लघु उद्योग इस जटिल प्रक्रिया से बचते रहे । अब चीज़ें बेहतर हो रहीं हैं क्योंकि प्रदूषण क्लियेरेंस लेने की प्रक्रिया में ज़रूरी संशोधन हुए हैं । "
चीन ने हुआवे टेक्नोलॉजी (Huawei Technologies) के भारत में प्रतिबंध को लेकर सख्त चेतावनी दी है। चीन के मुताबिक अगर हुआवे पर भारत में व्यापार करने पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो चीन अपने यहां कारोबार करने वाली भारतीय फर्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वतंत्र होगा। इधर अमेरिका ने कहा है कि चीन 5जी की बुनियादी संरचना में हुआवे को भागीदारी दिलाने के लिए भारत को ब्लैकमेल कर रहा है। अमेरिका ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए हुवावेई पर प्रतिबंध लगा दिया है। अमेरिका अन्य देशों को भी हुवावेई के उपकरण इस्तेमाल करने से मना कर रहा है। अमेरिकी सांसद जिम बैंक्स ने कहा, ‘‘चीन अब भारत को अपनी 5जी संरचना में हुवावेई को जगह देने के लिये ब्लैकमेल कर रहा है, वे कोई सीमा जानते ही नहीं हैं।’’ हालांकि चीन ने मंगलवार को उम्मीद जताई कि हुवावेई को लेकर भारत स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ होकर निर्णय लेगा।
एजेंसी की खबरों के मुताबिक एक अन्य अमेरिकी सांसद मार्शा ब्लैकबर्न ने आरोप लगाया कि चीन और हुवावेई की कोशिश है कि वे जासूसी करने वाली अपनी तकनीक अमेरिका एवं सहयोगी देशों में भेजें।
भारत ने नेक्स्ट जेनरेशन 5G सेलुलर नेटवर्क के इंस्टालेशन की बिडिंग प्रक्रिया को अगले माह तक के लिए रोक दिया गया है। हालांकि भारत सरकार की तरफ से अब तक चीनी टेलीकॉम कंपनियों को 5जी बिडिंग प्रक्रिया में शामिल होने का न्योता नहीं दिया गया है। इससे चीन की चिताएं बढ़ गई हैं। हुआवे 5G टेक्नोलॉजी वाली विश्व की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में से एक है, जो इस वक्त अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर में फंसी है।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से इस साल मई माह में हुआवे कंपनी को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया था। अमेरिका की तरफ से हुआवे कंपनी पर जासूसी करने का आरोप लगाया था। अमेरिकी प्रशासन ने अपने सहयोगी देशों से भी हुआवे के प्रोडक्ट पर रोक लगाने की मांग की थी।
सूत्रों के मुताबिक भारत भी अमेरिकी दबाव की वजह से हुआवे को ब्लैक लिस्ट करने की योजना बना रहा है। इस बीच चीनी विदेश मंत्री का बयान आया है कि बीजिंग को उम्मीद है कि भारत 5G बीडिंग में एक स्वतंत्र रवैया अख्तियार करेगा। उन्होंने कहा कि हुआवे भारत में लंबे वक्त से निवेश कर रही है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हुआ है।
ये तो वे दो बड़े सेक्टर हैं जो देश के स्वास्थ्य और देश के संचार से जुड़े हुए हैं । इसके अलावा , फर्नीचर , निर्माण उद्योग, ऑटोमोबाइल , इलेक्ट्रोनिक उद्योग, साइकिल उद्योग, बिजली उपकरण , कृषि उद्योग, कीट नाशक ,रंग-रोगन, स्टील , खिलौना , बिजली उद्योग, टायर,ट्यूब, खिलौने आदि में भी चीन ने देश के बाजार पर कब्जा किया हुआ है।
इतना ही नहीं चीन अपनी एप और दूसरे प्रोग्रामों से हिंदुस्तान का डाटा भी चोरी करता है। ये रोज-रोज के चेहरे बदलना, नए-नए वीडियो एडिटिंग के एप जो आपसे आपकी फोटो, कांटेक्ट और आपकी बातों की रिकार्डिंग की पर्मिशन लेकर आपके हाथ काट देते हैं । आपकी देशभक्ति आपके जरा से मजे के लिए विदेश को आपका सारा डाटा दे देती है, और सरकार के पास साइबर कानून जैसी कोई पुख्ता व्यवस्था भी नहीं है। आपको आपके हाल पर लुटने के लिए छोड़ा हुआ है।
इसके मूल में सरकारों की सुस्ती, अदूरदर्शिता भी शामिल है। चीन का बहिष्कार इतना आसान भी नहीं है। जब तक नए आविष्कारों को , हमारे नए वैज्ञानिक शोधों को सीधे निर्माण से नहीं जोड़ा जाता और शोध पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं किया जाता, भारत आत्मनिर्भरता का सिर्फ सपना ही देख सकता है।
सरकारों को भी योजनाओं के नाम पर प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट पर लगाम कासनी चाहिए । सरकार लोगों की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रुपया प्रचार पर खर्च करती है । अगर सरकार काम करेगी तो लोगों को दिखाई भी जरूर देगा । बड़ी-बड़ी रैलियों के बजाय वर्च्युयल रैली हो और उसका प्रसारण किया जाय । ढेर पैसा बचेगा , काला धन रुकेगा, कानून-व्यवस्था भी बनी रहेगी और लोगों की शक्ति दूसरी जगहों पर इस्तेमाल हो सकेगी । शर्म आती है जब युवाओं को बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है । आप उन्हें कृषि, बागवानी और वृक्षारोपण का करी दें । बिना मेहनत किसी को भी अगर पैसा देते हैं तो आप राजनीति भले चमका लें , देश की किस्मत नहीं चमका सकते ।
देश के लोगों की देशभक्ति पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता लेकिन बड़े उद्योगपतियों के हाथ में बिकी हुई सरकारों से ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती। बेहतर विकल्प है कि कुछ समय के लिए संयम साध लिया जाय और आसपास की बनी वस्तुओं की गुणवत्ता सुधारने पर तकनीकी विशेषज्ञों की मदद लेकर देश के निर्मित सामान को विश्वपटल पर प्रचारित किया जाय । आज देश में रोजगार बहुत बड़ी समस्या है । कृषि कि तरफ ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है । खाद्य पदार्थों के संरक्षण और प्रसंस्करण की बड़ी इकाइयों की सख्त जरूरत है । देश के दुग्ध उत्पादों पर भी कई तरफ से हमला हो रहा है । स्वदेशी को बचाना है तो स्वदेशी को अपनाना भी होगा और अगले तीन से पाँच साल के लिए खुद पर सख्ती भी बरतनी पड़ेगी । जड़ें मजबूत करेंगे तभी देश मजबूत होगा । केवल चीनी सामान का बहिष्कार का जुमला सार्थक नहीं होगा।
नीति, निर्णय,नीयत सही राखी जाय तो हम चीन से अच्छी टक्कर ले सकते हैं , ये नहीं कि रिलायंस चीन का सामान बेचे तो उन्नति और बीएसएनएल ऐसा करे तो पाबंदी । इस देश के नवरत्न आपको फिर से खड़े करने होंगे , देश की जनता तो सहयोग करेगी मगर खोट सरकार की नीयत का भी दूर करना होगा ।


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