लेखक
एक तो समय बहुत था दूसरे उस रिक्शेवाले की याचना में छिपी पीड़ा ने मजबूर कर दिया था। बैग रखकर बैठी तो बोली 'भैया हाईकोर्ट से घमापुर होकर चलना। पैसे जो कहोगे मैं दे दूँगी।'
जी मैडम जी। कोई काम है का.... आपको तो रानीताल चौक से सीधा पड़ेगा। पर आपकी मर्जी। बड़ी चढ़ैया है मदारटेकरी तक।
'इसीलिए कहा है पैसे जो तुम कहोगे दूँगी।'
निरुत्तर रिक्शेवाले ने ब्रेक लीवर से रबर हटाई और चल दिया। तितीक्षा को बस वो बोर्ड देखना था घमापुर चौक में जिसपर लिखा था आनन्द श्रीवास्तव, क्रिमिनल लॉयर। ऊपर घर था नीचे आफिस और बालकनी में खूब सारे गुलाब के गमले।
निराशा हुई जब उस जगह एक आलीशान इमारत देखी। मदारटेकरी से आनन्द नगर और अधारताल चुंगी फिर कृषिनगर। अतिथिगृह क्रमांक 2 पर आकर रुकवाया रिक्शा और पर्स से एक सौ का नोट दिया पसीने से तर-ब-तर रिक्शेवाले को।
छुट्टा दे दीजिए मैडम। बोहनी कर रहे हैं। उसने कहा।
'पूरे आपके लिए हैं। आटो रिक्शा से आती तो इतना ही देना पड़ते।'
सिर झुकाकर नमस्ते कर रिक्शेवाले ने बैग उठाकर गेस्टहाउस के अंदर तक रखा फिर गया।
बहुत कुछ बदल गया है यहाँ। जब कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय में पढ़ती थी सामने कॉलोनी का हर घर आबाद था। अब आधे से ज्यादा जीर्णोद्धार की राह तक रहे हैं खाली।
अतिथिगृह में भी इतनी सुविधा नहीं थी। न लकड़ी के पलंग व सोफा था न एयरकंडीशनर ही लगे थे।
दस बजे वो कॉलेज के लिए निकली।
निगाहें घमापुर की तरह ही एक नेमप्लेट तलाश रही थीं। आनन्द की जगह इस बार सार्थक श्रीवास्तव लिखा दिख गया डॉक्टर के साथ।
जनाब एम. टेक. के बाद पीएचडी करकर ही लौटे मतलब बैंगलोर से।
एक दुबला पतला सहपाठी जो हमेशा या तो लाइब्रेरी में पाया जाता था या लैब में कुछ बेल्डिंग कर रहा होता था।
हद दर्जे का शर्मीला.... इतना कि जब वो लड़कियों के साथ जन्मदिन पर घर चली गई थी तो घिघ्घी बँध गई थी। आंटी ने ही अगवानी कर खिलाया पिलाया था। सार्थक ने शायद शुभकामनाओं के बदले में धन्यवाद के सिवा कुछ नहीं कहा था।
अब 8 सालों में कितना बदलाव आया है प्रोफेसर साहब में पता नहीं।
तितीक्षा सोचकर आई थी, अगर अंकल के नाम का बोर्ड देखती तो घर जरूर जाती। उसके पीछे की वजह सोचकर एक मुस्कान आ गई थी। पता नहीं अकेला है या घर बसा लिया है........
दो साल के बाद उसने एम. टेक. किया फिर यहाँ असिस्टेंट प्रोफेसर की जगह नियुक्ति मिली है। आज ज्वाइन करने के लिए आई है। दरवाज़े से पर्दा सरकार आई तो सामने ही सार्थक बैठा था। उसे देखा तो मुस्कुराहट के साथ अभिवादन कर बोला "आइये तितीक्षा जी! स्वागत है इस महाविद्यालय में आपका। लिस्ट में नाम देख लिया था। उम्मीद कर रहा था तुम्हारे आने की।
"थैंक यू सार्थक.... आई मीन सर। सॉरी... वो कॉलेज की याद आ गयी आपको देखकर।"
"कैसी बात कर रही हो तितीक्षा। हम वही सहपाठी हैं। यह सीनियरटी केवल यूनिवर्सिटी रोस्टर में है। कोई औपचारिकता नहीं है हमारे बीच।"
"थैंक यू सार्थक... लेकिन इस कमरे के बाहर आप मेरे सीनियर व प्रोफेसर हैं।"
"इस कमरे के बाहर। यहाँ हम सिर्फ़ दोस्त हैं। मैंने माँ को बताया है तुम्हारे बारे में।"
"क्याऽऽ..... क्या बताया है ?"
"यही कि तुम मेरे कॉलेज में ज्वाइन करने वाली हो। माँ बहुत ख़ुश हैं तुम्हारे आने से।"
"माँ को मेरा प्रणाम कहना। आऊँगी किसी दिन। घमापुर में जहाँ घर था वहाँ तो कोई कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स दिखा सुबह आते हुए। कहीं और चले गये हो क्या उस जगह से ?"
"पापा के बाद वो जगह छोड़ दी। गुलमोहर कॉलोनी में है अब घर। वहाँ कार पार्किंग की भी समस्या थी और घर बहुत छोटा था।"
" हाँ.... बहुत दुख हुआ अंकल का सुनकर। मैंने भी खोया है मम्मी-पापा को। समझ सकती हूँ उस खालीपन को।"
"अब कौन है घर में ?"
" भैया और भाभी हैं। मेरी पोस्टिंग से भाभी को मुझसे भी ज्यादा ख़ुशी हुई।"
"आंटी के अलावा और कौन रहता है तुम्हारे साथ... मतलब और कौन है परिवार में।"
"इकलौता बेटा हूँ मैं। अभी तक माँ के साथ ही रहता हूँ। बस हम दोनों ही हैं अभी तक।"
" शादी क्यों नहीं की अभी तक.... प्रोफेसर हुए भी दो साल हो गये हैं।"
सार्थक ने कहा हाँ माँ भी चाहती है अब घर की झंझट से मुक्ति। मगर मेरी तलाश अभी तक पूरी नहीं हो सकी। मैं चाहता हूँ......
" क्या चाहते हो तुम ?"
सार्थक ने एक कलाकृति आगे कर दी। खेती में उपयोगी दो फावड़े के फल व एक मिट्टी खोदने की कुदाली को जोड़कर स्त्री-पुरुष का रूप दिया गया था उसमें।
कहने की जरूरत नहीं वो अपने लिए एग्रीकल्चर इंजीनियर ही तलाश रहा है।
तितीक्षा ने देखा उस अद्भुत कलाकृति को। विस्मय से फैल गईं उसकी आँखें किसी लड़के के अपनी शादी के निवेदन का तरीका देखकर।
फिर कब होगी तलाश पूरी.... तितीक्षा ने पूछा।
"हो सकता है आज या हो सकता है कुछ समय लगे.... मगर एक फावड़े को चाहिए फावड़ा ही।कम्प्यूटर और सिविल इंजीनियर तो कई हैं। मगर जॉब मैचिंग बहुत जरूरी है। है कि नहीं ?
हम्म। वो तो है। माँ जानती हैं तुम्हारी पसंद..... तितीक्षा ने पूछा।
"अंदाजा है उन्हें। वैसे आज सोचता हूँ कह दूँ सीधे-सीधे। बता दूँ......."
"ऊँ हूँ.... मुझे शर्म आयेगी फिर घर आने में।"
"तो क्या कहूँ........."
"अपना यह आर्ट पीस दे दो ले जाकर। माँ समझ जायेंगी तुम्हें जॉब मैच मिल गया है। वो आकर मुझे बता देंगी।"
हाँ.... यह औरतों की तरकीब ही सही है। तितीक्षा ने उस पर मेल पर S और फीमेल पर T लिख दिया मार्कर से।
इनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। नियमित और समसामयिक कहानी लेखन में सिद्धहस्त हैं। आप सीहोर के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल मे व्याख्याता पद पर अपनी सेवा दे रहे हैं।
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बोले तो.... एकदम झकास...।
भाई इस बार तो ढेर सारी बधाई... पूर्ण प्रेम कथा की...।
शैलेश तिवारी,
जॉब-मैचिंग
स्टेशन के बाहर आकर तितीक्षा ने जानबूझकर साइकिल रिक्शा लिया विश्वविद्यालय जाने के लिए।एक तो समय बहुत था दूसरे उस रिक्शेवाले की याचना में छिपी पीड़ा ने मजबूर कर दिया था। बैग रखकर बैठी तो बोली 'भैया हाईकोर्ट से घमापुर होकर चलना। पैसे जो कहोगे मैं दे दूँगी।'
जी मैडम जी। कोई काम है का.... आपको तो रानीताल चौक से सीधा पड़ेगा। पर आपकी मर्जी। बड़ी चढ़ैया है मदारटेकरी तक।
'इसीलिए कहा है पैसे जो तुम कहोगे दूँगी।'
निरुत्तर रिक्शेवाले ने ब्रेक लीवर से रबर हटाई और चल दिया। तितीक्षा को बस वो बोर्ड देखना था घमापुर चौक में जिसपर लिखा था आनन्द श्रीवास्तव, क्रिमिनल लॉयर। ऊपर घर था नीचे आफिस और बालकनी में खूब सारे गुलाब के गमले।
निराशा हुई जब उस जगह एक आलीशान इमारत देखी। मदारटेकरी से आनन्द नगर और अधारताल चुंगी फिर कृषिनगर। अतिथिगृह क्रमांक 2 पर आकर रुकवाया रिक्शा और पर्स से एक सौ का नोट दिया पसीने से तर-ब-तर रिक्शेवाले को।
छुट्टा दे दीजिए मैडम। बोहनी कर रहे हैं। उसने कहा।
'पूरे आपके लिए हैं। आटो रिक्शा से आती तो इतना ही देना पड़ते।'
सिर झुकाकर नमस्ते कर रिक्शेवाले ने बैग उठाकर गेस्टहाउस के अंदर तक रखा फिर गया।
बहुत कुछ बदल गया है यहाँ। जब कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय में पढ़ती थी सामने कॉलोनी का हर घर आबाद था। अब आधे से ज्यादा जीर्णोद्धार की राह तक रहे हैं खाली।
अतिथिगृह में भी इतनी सुविधा नहीं थी। न लकड़ी के पलंग व सोफा था न एयरकंडीशनर ही लगे थे।
दस बजे वो कॉलेज के लिए निकली।
निगाहें घमापुर की तरह ही एक नेमप्लेट तलाश रही थीं। आनन्द की जगह इस बार सार्थक श्रीवास्तव लिखा दिख गया डॉक्टर के साथ।
जनाब एम. टेक. के बाद पीएचडी करकर ही लौटे मतलब बैंगलोर से।
एक दुबला पतला सहपाठी जो हमेशा या तो लाइब्रेरी में पाया जाता था या लैब में कुछ बेल्डिंग कर रहा होता था।
हद दर्जे का शर्मीला.... इतना कि जब वो लड़कियों के साथ जन्मदिन पर घर चली गई थी तो घिघ्घी बँध गई थी। आंटी ने ही अगवानी कर खिलाया पिलाया था। सार्थक ने शायद शुभकामनाओं के बदले में धन्यवाद के सिवा कुछ नहीं कहा था।
अब 8 सालों में कितना बदलाव आया है प्रोफेसर साहब में पता नहीं।
तितीक्षा सोचकर आई थी, अगर अंकल के नाम का बोर्ड देखती तो घर जरूर जाती। उसके पीछे की वजह सोचकर एक मुस्कान आ गई थी। पता नहीं अकेला है या घर बसा लिया है........
दो साल के बाद उसने एम. टेक. किया फिर यहाँ असिस्टेंट प्रोफेसर की जगह नियुक्ति मिली है। आज ज्वाइन करने के लिए आई है। दरवाज़े से पर्दा सरकार आई तो सामने ही सार्थक बैठा था। उसे देखा तो मुस्कुराहट के साथ अभिवादन कर बोला "आइये तितीक्षा जी! स्वागत है इस महाविद्यालय में आपका। लिस्ट में नाम देख लिया था। उम्मीद कर रहा था तुम्हारे आने की।
"थैंक यू सार्थक.... आई मीन सर। सॉरी... वो कॉलेज की याद आ गयी आपको देखकर।"
"कैसी बात कर रही हो तितीक्षा। हम वही सहपाठी हैं। यह सीनियरटी केवल यूनिवर्सिटी रोस्टर में है। कोई औपचारिकता नहीं है हमारे बीच।"
"थैंक यू सार्थक... लेकिन इस कमरे के बाहर आप मेरे सीनियर व प्रोफेसर हैं।"
"इस कमरे के बाहर। यहाँ हम सिर्फ़ दोस्त हैं। मैंने माँ को बताया है तुम्हारे बारे में।"
"क्याऽऽ..... क्या बताया है ?"
"यही कि तुम मेरे कॉलेज में ज्वाइन करने वाली हो। माँ बहुत ख़ुश हैं तुम्हारे आने से।"
"माँ को मेरा प्रणाम कहना। आऊँगी किसी दिन। घमापुर में जहाँ घर था वहाँ तो कोई कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स दिखा सुबह आते हुए। कहीं और चले गये हो क्या उस जगह से ?"
"पापा के बाद वो जगह छोड़ दी। गुलमोहर कॉलोनी में है अब घर। वहाँ कार पार्किंग की भी समस्या थी और घर बहुत छोटा था।"
" हाँ.... बहुत दुख हुआ अंकल का सुनकर। मैंने भी खोया है मम्मी-पापा को। समझ सकती हूँ उस खालीपन को।"
"अब कौन है घर में ?"
" भैया और भाभी हैं। मेरी पोस्टिंग से भाभी को मुझसे भी ज्यादा ख़ुशी हुई।"
"आंटी के अलावा और कौन रहता है तुम्हारे साथ... मतलब और कौन है परिवार में।"
"इकलौता बेटा हूँ मैं। अभी तक माँ के साथ ही रहता हूँ। बस हम दोनों ही हैं अभी तक।"
" शादी क्यों नहीं की अभी तक.... प्रोफेसर हुए भी दो साल हो गये हैं।"
सार्थक ने कहा हाँ माँ भी चाहती है अब घर की झंझट से मुक्ति। मगर मेरी तलाश अभी तक पूरी नहीं हो सकी। मैं चाहता हूँ......
" क्या चाहते हो तुम ?"
सार्थक ने एक कलाकृति आगे कर दी। खेती में उपयोगी दो फावड़े के फल व एक मिट्टी खोदने की कुदाली को जोड़कर स्त्री-पुरुष का रूप दिया गया था उसमें।
कहने की जरूरत नहीं वो अपने लिए एग्रीकल्चर इंजीनियर ही तलाश रहा है।
तितीक्षा ने देखा उस अद्भुत कलाकृति को। विस्मय से फैल गईं उसकी आँखें किसी लड़के के अपनी शादी के निवेदन का तरीका देखकर।
फिर कब होगी तलाश पूरी.... तितीक्षा ने पूछा।
"हो सकता है आज या हो सकता है कुछ समय लगे.... मगर एक फावड़े को चाहिए फावड़ा ही।कम्प्यूटर और सिविल इंजीनियर तो कई हैं। मगर जॉब मैचिंग बहुत जरूरी है। है कि नहीं ?
हम्म। वो तो है। माँ जानती हैं तुम्हारी पसंद..... तितीक्षा ने पूछा।
"अंदाजा है उन्हें। वैसे आज सोचता हूँ कह दूँ सीधे-सीधे। बता दूँ......."
"ऊँ हूँ.... मुझे शर्म आयेगी फिर घर आने में।"
"तो क्या कहूँ........."
"अपना यह आर्ट पीस दे दो ले जाकर। माँ समझ जायेंगी तुम्हें जॉब मैच मिल गया है। वो आकर मुझे बता देंगी।"
हाँ.... यह औरतों की तरकीब ही सही है। तितीक्षा ने उस पर मेल पर S और फीमेल पर T लिख दिया मार्कर से।
©मुकेश दुबे
---------------परिचय
मुकेश दुबे साहित्यकारइनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। नियमित और समसामयिक कहानी लेखन में सिद्धहस्त हैं। आप सीहोर के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल मे व्याख्याता पद पर अपनी सेवा दे रहे हैं।
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समीक्षा
मुकेश भाई... एक बात बताओ भैया... ये अनूठे चित्र आपको प्राप्त हो जाने की संभावना तो है... लेकिन उन पर कहानी के ताने बाने को बुनने की कहाँ से सूझती है... वो भी इतनी सटीक कि तितिक्षा की प्रतीक्षा ही जैसे सार्थक की सार्थकता रही है...। अभी तक प्रेम के अधूरे पन को ही उकेरने में आपकी कलम... टीस देती रही...। लेकिन आज कुछ रहम आया उसको.... प्रेम को परवान चढ़ा ही दिया....। अब तितिक्षा यानि न्याय पाने की आशा... आज न्याय पा ही जाती है.....। वो भी सार्थक से... जो अपने नाम के अनुरूप सार्थक जीवन साथी की तलाश में रहा... और सार्थक हो गई उसकी प्रतीक्षा... तितिक्षा के आने से....। वैसे साईकिल रिक्शा से रबर हटा कर... यानि गेयर से निकाल कर... चलने योग्य कर लेना.. जैसी छोटी सी कार्यवाही भी... आपकी लेखनी की जद से बाहर न जा सकी....। फिर जबलपुर का भ्रमण भी... कम रुचिकर नहीं था...। गुजरे ज़माने की खूबसूरती का बेगौरी में.. जीर्ण शीर्ण हो जाना भी... कहाँ छुप पाया आपकी पैनी नजर से...। हालात सच में ऐसे हैं भी...। और तो और... कथानक जब एक ऐसे मानवीय पक्ष को बयाँ करता है... जिस पर हमारी बनिया बुद्धि... पूरा सामर्थ्य का इस्तेमाल कर... बचत के लिए प्रोत्साहित करती है...। उस मानसिकता में परिवर्तन लाने के संकेत भी कहानी का मर्म... बन जाते हैं। वो घटना है.. तितिक्षा का रिक्शे वाले को सौ का नोट देकर... कहना ये आपके लिए ही हैं... ऑटो से आती तब भी तो इतने ही देती...। क्या मानवीय दर्द को समझा दिया है... इस वाक्य ने...। बाकी कहानी के बारे में क्या कहा जाए... फिल्म अभिनेता देवानंद की तरह... सदाबहार...।बोले तो.... एकदम झकास...।
भाई इस बार तो ढेर सारी बधाई... पूर्ण प्रेम कथा की...।
शैलेश तिवारी,



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