पत्रकार नहीं, देश जंग लड़ रहा है ....जरा सोचिए !!
मीडिया के मंचों पर उछल रहे कठपुतले और कठपुतलियाँ ऐसा लगता है कि चीन और पाकिस्तान को फलभर में नेस्तोंनाबूद कर देंगे । बाँहों की आस्तीनों को  चढ़ाकर और त्योरीयों को तरेरकर, ऐसी नौटंकी करते हैं कि जी में आता है  इन्हे बाहर खींचकर झांपड़ रसीद कर दूँ । 

युद्ध का उन्माद पैदा करने वाले ये लोग एक रोज में इतना कमाते हैं अपनी नौटंकी से जितना कि हमारे पाँच- सात सैनिकों की महीनेभर की तनख़्वाह होती है। सभी जानते हैं कि इनमें कोई दमखम नहीं है और चाबी भरे खिलौने हैं। लफ्जों की बाजीगरी का कमाल है और सिर्फ एक एंकर किरदार की अदायगी है। 


ये भी ध्यान देने योग्य बात है कि इनमें से ज़्यादातर 1962 की लड़ाई के बाद में पैदा हुए हैं और कुछ तो शायद 1971 के बाद भी । मगर लिखी हुई स्क्रिप्ट पर ये लोग अपनी अदाओं से और बोलने की , मुँह बनाने की तरकीबों से ऐसे आश्वस्त करते हैं जैसे कि जंग किसी टी वी स्क्रीन पर लड़ी जा रही हो। सच्चाई और हकीकत से कोसों दूर हैं ये लोग। 


इन्हें तो ये भी नहीं पता होगा कि जंग का खामियाजा सबसे ज्यादा गरीब आदमी को भुगतना पड़ता है । क्योंकि परेशान भी वही होता है, मरते भी उसके अपने हैं और अंत में हर युद्ध के भार की पोटली भी उसी के कंधों पर लाद दी जाती है। देशप्रेम को ऐसे समय में जगाना चाहिए लेकिन जिस तरह कि बाजारू और गैर-जिम्मेदार भाषा का ये लोग प्रयोग करते हैं, उससे भारतीय मीडिया के पेशेवर होने पर प्रश्नचिन्ह  खड़ा होता है। इन्हें ये भी याद नहीं रहता कि ऐसे समय ये भारत का मीडिया होते हैं किसी पार्टी का नहीं। 


आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ ? आप भी जानते हैं कि हिंदुस्तान के मीडिया ने मुंबई अटेक की खूब टी वी कवरेज की थी और उसका नतीजा ये हुआ था कि अंजाने और अनचाहे हमने  आतंकियों को उनकी रणनीति बनाने में मदद की थी । भारतीय पुलिस और सुरक्षा एजेसियों का हर कदम, हम आतंकियों को बता रहे थे , जिसका परिणाम भी हमने कई शहादतों के रूप में भुगता। ठीक ऐसा ही हम अब दोहरा रहे हैं। 


टी वी डिबेट में पूर्व सैनिक अधिकारियों को बुलाकर भारत की रणनीति का खुलासा करना भी ऐसे नाजुक समय में घातक कदम है । किसी भी सेना की युद्ध नीति इस तरह टी वी चैनल पर दिखाये या बताए जाने का मैं समर्थन नहीं करता । अगर वाकई जज्बा है तो आप सुझाव अपनी सेना से साझा करें न कि देश के मीडिया के दस-पाँच हजार के लिए देश के पैंतरे इस तरह जगजाहिर करें और दुश्मन तक अपनी रणनीति को पहुंचा दें। इन मुद्दों पर पूर्व में हुई लड़ाइयों के पैंतरे और सेना की क्षमताओं का बखान करना अपने दुश्मन को मजबूत करना ही होगा। हमारे चैनलों को चीन और पाकिस्तान की आँख , कान बनाने की जरूरत नहीं है । 


पूर्व सैनिकों और अधिकारियों ने उस इलाके को , उस लड़ाई को देखा है , उसका हिस्सा रहे हैं, तो अपने अनुभव , सेना को बताएं , अपने सुझाव सेना को दें। आज के समय में आपके द्वारा चैनल पर कही  हर बात , आपके सैनिक और अधिकारी की हर बात चीन भी देखता है। दुश्मन को अपनी कमजोरी और खूबी ....दोनों ही बताना खतरनाक है। युद्ध में अचानक दिया गया सरप्राइज़ आपकी जीत को पक्का करता है । भारत सरकार को ऐसी डिबेट्स पर तुरंत प्रभाव से रोक लगानी चाहिए। ऐसे समय में सिर्फ सेना या भारत सरकार के द्वारा जारी कोई सूचना या विज्ञप्ति ही चैनलों द्वारा प्रसारित की जानी चाहिए । युद्ध देश के लिए होता है न कि टी वी चैनलों की टी आर पी के लिए । ये फैशन मॉडल हैं इन्हें फैशन का पता है युद्ध का नहीं । 


देश की जनता को अपने सैनिकों पर , सेना की  क्षमताओं पर पूरा भरोसा है , इसलिए लोगों का मनोबल बढ़ाने के नाम पर देश का बुरा न करें ये खबरिया चैनल । 



केदार नाथ"शब्द मसीहा", दिल्ली


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और अंत मे-

गरीबों को उपहार सब्सिडी , अमीरों को जीभर मिली रिबेट,
मिडिलक्लास वालो देखो टी वी तुम, बस तुमको मिली डिबेट
तुमको मिली डिबेट, सिरदर्द मुफ्त का, मुफ्त की लट्ठम लट्ठा
अनरेस्ट करें तुमको, रेस्ट में चिकन औ दारू चखें पट्टी-पट्ठा


शब्द मसीहा
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