लेखिका 


ससुराल जाकर संभल जायेगी... 

उमा उसके मायके की ही बेटी थी जो पड़ोस में ब्याह कर आई थी... उसने ही सुबह से असमंजस बढ़ा दिया था...। 
कल वहां बाबूजी का संदेशा लेकर आई थी बाबूजी कल उसको मिलने मंदिर आने वाले थे...
उसके पति को उसका कहीं भी जाना पसंद नहीं था यहां तक कि वह बाबू जी से मिलने को भी तरस जाती...
रात भर हुआ वह सो नहीं पाई न जाने कितनी बार बाबूजी को बिना मिले लौटना पड़ा था आज उसने फैसला कर लिया था की कुछ भी हो जाए वह बाबू जी से मिलकर रहेगी इस बार...
सुबह जल्दी से उठकर घर के काम निपटाने लगी पति के लिए टिफिन पैक करते ही अचार के बने देखकर अतीत में खो सी गई, बाबूजी को कितना पसंद है अचार....
मां बाबूजी की इकलौती संतान होने के कारण खूब लाड़ प्यार से से पली थी वह...
पूरे गांव में धमा चौकड़ी करती फिरती हर जगह मंगला मंगला का शोर रहता...
जब कभी बाबूजी डांटते तो अम्मा बचाव करते हुए कहती "ससुराल जाएगी तो संभल जाएगी"
जैसे-जैसे समय बीतता गया मां को गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया हमेशा चहक कर धमा चौकड़ी मचाने वाली मंगला शांत रहने लगी...
घर की जिम्मेदारी उसके नन्हें और मासूम कंधों पर आ गई बाबूजी सुबह काम करने जाते उसे सुबह जल्दी उठकर बाबूजी के लिए खाना तैयार करना होता तो रोज बाबूजी कहते "लाडो अचार पक्का रखना टिफिन में"...
बाबूजी के जाने के बाद अम्मा को दवाई घर के काम....
 मंगला लगभग बुझने सी लगी
"कितनी देर लगेगी टिफिन  तैयार करने में" पति की आवाज से वह अतीत से वापस आई।
सहमी सी मंगला पति का टिफिन लेकर बाहर निकल आई पूरी हिम्मत करके बोली "मंदिर हो आऊँ ठाकुर जी को भोग लगाना है"
सुनते ही पति ने फिर झिड़का" कोई जरूरत नहीं है घर से बाहर जाने की बस"
वह एक बार और सहम गई फिर न जाने पति को क्या सूझी वह बोला " जाओ पर ध्यान रहे जल्दी घर आ जाना"
 सुनते ही वह चहक उठी जल्दी से भीतर गई सोई हुई बेटी को उठाने लगी बेटी नींद में रोने लगी तो उसे सीने से लगाकर दूध पिलाते हुए अम्मा की बहुत याद आई एक सुबह ऐसी ही थी जब अम्मा उठी ही नहीं । याद आ गई अम्मा की बात  "ससुराल जाएगी तब संभल जाएगी"...
अम्मा के जाने के बाद गांव वालों ने कहा" बिटिया की शादी करवा दो बिन मां की बच्ची है तुम तो चले जाते हो सुबह काम पर बहुत दिन भर घर में अकेली रहती है कहीं तुम्हें भी कुछ हो गया तो सोचो बिटिया का क्या होगा"...
बाबूजी को बात जंच गई  रिश्ते ढूंढे जाने लगे पल भर के निर्णय से मासूम सी बच्ची परिपक्व होने की श्रेणी में आने वाली थी ...
पड़ोस के गांव का रिश्ता आया लड़का बाबूजी को अच्छा लगा शादी तय कर दी गई अनगिनत सपने लेकर ससुराल की दहलीज में मंगला का मंगल प्रवेश हुआ.... 
लेकिन सपने  कहाँ अपने होते हैं....एक एक कर बिखरने लगे ....मुठ्ठी में बंद रेत की तरह....। पति दिन भर काम कर कर शाम को  घर आता ही शराब पीकर था... नशे में उसे मारता कभी खाने की थाली फेंककर कर तो कभी अचार की बरनी का प्रहार होता...। 
इसी बीच उसकी गोद में एक बेटी भी आ गई लेकिन बाबू जी से मिले अरसा गुजर गया...
न जाने कितनी ही बार बाबूजी ने बुलाया पर वह जा ना पाई... जाती भी कैसे... पति को भी तो पसंद हो...। 
अब उसे अम्मा की बात याद आती "ससुराल जाएगी तो संभल जाएगी"
 संभल तो गई थी मंगला पर खुद को और गृहस्थी को संभालते संभालते सब कुछ खो रही थी...
गोद में बेटी सोने लगी तो सीने से लगा कर वह छत पर गई दबी आवाज में उमा को आवाज लगाई वह दोनों मंदिर की ओर निकल आई धोती में अचार की बरनी छुपा कर गांव की पगडंडी से गुजरते हुए ठाकुर जी के मंदिर के अहाते में पहुंची एक कोने में बाबूजी इंतजार कर रहे थे बाबूजी के पास पहुंची बाबूजी कंप कपाये हाथों से आशीष देने लगे.. दोनों की आँखों से झर झर बहते आँसू... अपनी अपनी कहानी सुनाते रहे....। कितने दिनों बाद बाबूजी को देखा एकदम कमजोर  अवस्था में...
धोती की ओट में छिपा कर लाई अचार की बरनी निकालकर बाबूजी को थमा दी बाबूजी आशीष देने लगे "जुग जुग जुग जुग जियो अगले जन्म यही मरद मिले सौभाग्यवती भव"
...... धक से रह गई मंगला .....क्या बोल गए बाबूजी ..... सोचती रह गयी मंगला....एक ही जन्म निकाल लूं काफी है...
चेहरे पर आये दर्दीले मनोभाव को छुपाते हुए बाबू जी से बोली , ठाकुर जी के दर्शन कर लूँ...। उनकी आँखों से मौन सहमति के बाद भीतर जाकर मत्था टेका भगवान की मूरत के आगे जाकर बोली "अबकी बार बाबूजी की मत सुनियो ठाकुर जी"
आंचल के छोर में बंधी हुई चवन्नी निकाल कर जैसे ही ठाकुर जी के चरणों में चढ़ाने को हुई उमा की चिल्लाते हुए आवाज कानों में पड़ी "जल्दी आ तेरा मर्द इधर ही आ रहा है"
हड़बड़ा कर चवन्नी हाथ से छूट गई बिटिया को थाम बाबूजी की ओर देखे बगैर बाहर निकल आए मंदिर से....
अम्मा के बात अब भी जेहन में गूंजती रही "ससुराल जाएगी तो संभल जाएगी"

 ...बसंती  सामन्त,  खटीमा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड

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परिचय

बसंती सामंत, ग्राम बिरिया, विकासखंड खटीमा, जिला ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड की निवासी हैं। गृहणी होने के साथ आप साहित्य सेवा में संलग्न है। अधूरे अल्फ़ाज के नाम से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रही हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है। 
संपादक
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 समीक्षा 

ससुराल जाकर संभल जायेगी...  कहानी है उस आधी आबादी की प्रतिनिधि नायिका.... मंगला की.... जिसके जीवन में.... अमंगल का डेरा स्थाई रहा.....। झूलती रही माँ की सीख और ससुराल की विपरीत परिस्थितियों में...। ठेठ देहाती परिवेश में लिखी इस कहानी में... मंगला.... चहकती हुई जिंदगी से सहमें हुए जीवन को जीने को मजबूर होती है....। खुद को खुद पर हो रहे अत्याचार से सामंजस्य बिठाती है.....। ये वह सवाल है जो आधुनिक युग के जागरूक मन में खटकेगा..... लेकिन उस मंगला बिटिया के मन में विरोध नही पैदा होता.... वो माँ की सीख को ही अपने जीवन का संविधान मान कर जी रही है...। सामान्य सी घटना में कही गई एक बात.... ससुराल जाकर संभल जाएगी..... कितने गहरे तक मंगला के बाल मन में उतर जाती है कि.... युवा होकर खुद माँ बनने के बाद भी... उसकी आह नहीं निकलती...। यहीं कहानी बाल मनोविज्ञान की व्याख्या करती नजर आती है....। लेकिन अपने मायके की बेटी उमा के संदेश मिलने पर.....उनकी पसंद के अचार को धोती में छिपा कर ले जाना....और मिल लेना.... हर बेटी का  हर पिता के प्रति असीम प्यार भी वर्णित कर देता है....और पिता से नहीं मिलने देने की पति की जिद को भी... पति परमेश्वर की इच्छा मानकर शिरोधार्य कर लेती है.... यही पक्ष कुछ अखरता जरूर है.... लेकिन आगाह तो करता है कि घरेलू हिंसा अधिनियम... अस्तित्व में आ जाने के बाद भी.... नारी की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है... उसका सदियों से होता आ रहा शोषण जारी है... उस पर अत्याचार जारी है...। अपने पिता की एकलौती संतान मंगला से ... बिना किसी ठोस कारण के अपने पिता से नहीं मिलने देने का पति का फैसला...... पुरुष के अहंकार की परिभाषा बन जाता है...। उसकी मर्दानगी का सबूत उसका अपनी ही पत्नी से दुर्व्यवहार  होता है....। शायद इन्हीं विडंबनाओं को, विसंगतियों को, नारी के शोषण को, घरेलू हिंसा आदि को व्यक्त करता कथानक है..... 
ससुराल जाकर संभल जायेगी... । जो लिखा एकदम सरल भाषा में है... और शब्दों का चयन भी सामान्य रखा गया है.. बिना अलंकारिक भाषा के भी कहानी उसके भावों और गुढार्थो से संजी संवरी नजर आती है...। अपनी बात पुरजोर तरीके से कहती भी है..। उसको भी जो अनकहा रहा कहानी के संवादों में....। बहुत बहुत बधाई लेखिका.... बसंती सामंत को...। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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