लेखिका
अबकी सावन
बरखा तुम ऐसी आना
देश की विपदा
दूर भगाना,
रिमझिम बून्दों से
महके ये वसुधा
खुशियों की ऐसी
तुम पवन चलाना...
आँख गड़ाए बैठे
जो दुश्मन
कड़कड़ा कर बिजली
उनपर गिराना,
हो घने काले बादलों का
उनको भी खौफ़
छुप जाएं बिलों में
ऐसे गड़गड़ाना...
धर रौद्र रूप
औ' खोल जटायें
बह जायें अरि
ऐसी गंगा बहाना,
त्रिशूल उठा
औ' डमरू बजा
हे शिव तुम ऐसा
तांडव दिखाना...
जो रखे कदम
सर ज़मीं पर हमारी
खोल त्रिनेत्र
भस्म कर जाना,
पिलाये जो विष
हम अमृत करें
महादेव तुम ऐसा
खेल रचाना...य
इस सावन गई भूल
चूड़ी घेवर हिंडोले
उतरा आँखों में लहू
अब दुश्मन को भगाना,
अबकी सावन ऐ बाबुल
न आऊँगी पीहर
दुश्मन के लहू से 'कमलिनी'
सरहद पर जाकर है मेहंदी रचाना।
अबकी सावन*************
अबकी सावन
बरखा तुम ऐसी आना
देश की विपदा
दूर भगाना,
रिमझिम बून्दों से
महके ये वसुधा
खुशियों की ऐसी
तुम पवन चलाना...
आँख गड़ाए बैठे
जो दुश्मन
कड़कड़ा कर बिजली
उनपर गिराना,
हो घने काले बादलों का
उनको भी खौफ़
छुप जाएं बिलों में
ऐसे गड़गड़ाना...
धर रौद्र रूप
औ' खोल जटायें
बह जायें अरि
ऐसी गंगा बहाना,
त्रिशूल उठा
औ' डमरू बजा
हे शिव तुम ऐसा
तांडव दिखाना...
जो रखे कदम
सर ज़मीं पर हमारी
खोल त्रिनेत्र
भस्म कर जाना,
पिलाये जो विष
हम अमृत करें
महादेव तुम ऐसा
खेल रचाना...य
इस सावन गई भूल
चूड़ी घेवर हिंडोले
उतरा आँखों में लहू
अब दुश्मन को भगाना,
अबकी सावन ऐ बाबुल
न आऊँगी पीहर
दुश्मन के लहू से 'कमलिनी'
सरहद पर जाकर है मेहंदी रचाना।
नीरजा मेहता 'कमलिनी' गाजियाबाद
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