कहानी 


                             लेखिका 

ग़ुँचा बबूल का...... 


आभा ने अपने बालों को सुलझाते हुए जैसे ही उसने आईने मे अपने आप को देखा तो चेहरे पर समय के रथ के पहिये के हल्के निशान नजर आए। लेकिन वक्त का चक्र उसको अतीत की तरफ सरलता से ले जाता गया। गाँव में माँ बाप की छाया में बिताया जीवन, कैसे स्कूल की टाट पट्टी पर बीता। मिडिल पास करने के बाद माँ के इंकार के बाद भी बाबूजी का पास के गाँव के हायर सेकेंडरी स्कूल पढ़ने भेजना। आते जाते में बबूल के पेडों वाले रास्ते से गुजरना और बारिश का मौसम आने से ठीक पहले बबूल में छोटे छोटे से मखमली फूल उस को बहुत अच्छे लगते। उनकी भीनी भीनी खुशबू तो आभा को मदहोश का देती थी। वो अक्सर सोचती थी कि इस कांटे वाले बबूल में भी भगवान ने कितने सुंदर और खुशबूदार फूल लगाए हैं। और फिर कालेज पढ़ने का मन मंगनी का शगुन पाकर इनकी याद में खोने लगा। सपनों को तो पंख ही लग गए। बाबूजी ने अपनी हैसियत से बड़ा घरवार खोजा था मेरे लिए.। खोजते भी कई नही, इकलोती संतान जो थी। 
फिर आये ये, घोड़ी पर सवार होकर, शहनाई बजाते हुए, और ले गए मुझे महानगरीय जिंदगी में। समय तो पंख लगा कर उड़ रहा था। सासु माँ के रूप में मेरी माँ मुझे फिर मिल गई थी। प्रकाश , मेरे ये, इनकी बैंक की नौकरी मेरे सपनों को पूरा करने के लिए काफी थी। लेकिन वक्त की करवट कहाँ समझ में आती है। मेरी तो तब समझ में आई जब शादी के छः महीने बाद ये लड़खड़ाते हुए घर में दाखिल हुए। शनिवार की उस शाम से तो जैसे शनि की पनोती ही लग गई जिंदगी में। उसको दूसरे गांव जाते हुए बबूल के पेड़ों वाला रास्ता याद आने लगा। और अहसास भी हुआ कि उन रास्तों से परिचय कुदरत ने यूँ ही नहीं कराया था। वही मेरे जीवन की राह बनने थे। शायद इसीलिए उनसे नाता तभी जोड़ दिया। 
घर को संवारने और सहेजने की मेरी सारी कोशिशों पर जैसे वज्रपात हो गया। सुख के सारे मोती बिखरने लगे। अब होश में घर आना इनकी आदत ही नहीं रही। सासु माँ ने इन्हें कुछ न कहकर मुझे ही धीरज रखने की सलाह दे दी। मैं सासुजी की बात को गाँठ बांधकर अपनी जिम्मेवारियो को अच्छे से निभाने लगी। इसी बीच सासु माँ ने मेरी कालेज की पढ़ाई शुरू करवा दी। जिससे मेरा मन लग गया उसमें। माँ बाबूजी को भी क्या खबर करती। पांच बीघा जमीन और कुछ भैंस पाल कर जी रहे उन लोगों के लिए तो मैं महारानी जैसी जिंदगी जी रही थी। लेकिन उस दिन तो हद हो गई जब इन्होनें मुझ पर सब्जी में कम नमक होने पर हाथ ही उठा दिया। फिर मार खाना मेरी रोजमर्रा की आदत बनती गई। पेट से होने के बाद भी इनकी आदत न बदली। हाँ सासुमा पूरा ध्यान रखती। और नन्ही किलकारियां भी इनकी आदत नही बदल पाई। सासु माँ का ध्यान रखना, पति को समय देना, बेटे का ध्यान रखना और पढ़ाई करना। इन सब में कब मैं स्नातक हो गई पता ही नही चला। उसी समय मास्टरी की नौकरी निकली और सासु माँ की सलाह पर मैंने भी आवेदन कर दिया। किस्मत ने जोर मारा और मैं प्रायमरी स्कूल की टीचर हो गई। लेकिन इनके सितम बदस्तूर जारी रहे ।
पूरी ईमानदारी से सभी कार्य एक दायित्व की तरह निभा रही थी और पति के जुल्म सहते हुए भी अपनी छोटी सी दुनिया में बहुत खुश थी। उसे क्या पता था उसके जीवन में एक नया मोड़ आने वाला है, संघर्षो से भरा।  अचानक उसे खबर मिलती है कि उसके पति का बहुत ही खतरनाक एक्सीडेट हो गया जब आभा को पता चला कि अब उसका पति कभी अपने पैरो पर नही चल पायेगा। आभा के तो पैरो तले ज़मीं खिसक गयी। ये आभा के लिये बहुत मुश्किल घड़ी थी अपने छोटे से बच्चे को देखना, सासुमा कि देखभाल करना बीमार पति की सेवा करना और साथ मे अपनी नोकरी पर भी जाना। इस तरह आभा को दस साल हो गए पति की सेवा करते  करते पर उसे क्या पता था अभी उसकी परीक्षा बाक़ी थी देनी, उसके पति ने एक दिन दम तोड दिया। इस सदमे से आभा बाहर भी नहीं निकल पाई थी कि बेटे की जुदाई ससुमा से सहन नहीं हो पाई और वह भी भगवान को प्यारी हो गई । अब तो आभा  के पास उसका बेटा ही उसका सहारा  था यूँ कहे कि आभा ही बेटे की माँ भी और बाप  भी थी अब तो। 
उसने हिम्मत नहीं हारी और जीवन को इक चुनोती माना ओर आगे बढ़ती  गई ओर पीछे मुड़कर नही देखा। इस बीच माँ और बाबूजी भी साथ छोड़ गए। उनकी जमीन वगैरह बेचकर बेटे को अच्छी शिक्षा दिला दी। आज उसके जीवन में खुशी का दिन आया । उसका बेटा रवि इक सरकारी नौकरी  मे इक उच्च पद पर आसीन हो गया। आज आभा का संघर्ष समाप्त हो गया । 

उषा गुलाटी, फरीदाबाद

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ऊषा गुलाटी फरीदाबाद की निवासी हैं। सरकारी स्कूल में शिक्षक का दायित्व वहन करने के साथ साथ साहित्य से गहरा लगाव रखती हैं। साहित्य का नियमित अध्ययन इनकी दिनचर्या का हिस्सा है। इसी लगाव ने उन्हें कलम से भी साहित्य की सेवा का अवसर प्रदान किया है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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समीक्षा 

इक रास्ता है जिंदगी..... और उस रास्ते पर दुःख के कांटे ज्यादा हो... लेकिन बीच बीच में सुख के फूल खिल कर.. अपनी महक बिखेर दें.... तब जन्म लेती है कहानी... ग़ुँचा बबूल का....। हालांकि लेखिका का कहना है कि.. ये उनकी पहली कहानी है.... भाषागत नजरिये से देखा जाए तो... यह कुछ हद तक सही भी लगता है.. लेकिन कहानी में जो मूल विषय वस्तु है... उसके साथ जो सहायक विषय शामिल किये गए हैं... वह उनके गहन अध्ययन से तो परिचित कराती है....। 
मूल विषय है... दाम्पत्य जीवन के हमराही का व्यसनी होना... ये बहुत महिलाओं की समस्या है... उस पर महिला का घरेलू हिंसा का शिकार हो जाना... जो तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी... देश भर में आज भी बदस्तूर जारी है.....। अखरने वाली बात है कि.. नायिका का उस हिंसा को चुपचाप सहते रहना.... बिना किसी विरोध के...। दूसरा सहायक विषय है... सास बहु के बीच होने वाली खटपट का इस कहानी में अंत हो जाना... जो आज महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव के रूप में... अधिकांशतः नजर भी आ रहा है.. यह कहानी का सुखद पहलू है...। एक पहलू और भी है... महिला का आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होना... जो उसकी सास की मदद से संभव हुआ...। लेकिन बच्चे के जन्म के बाद ... और अपनी बेहतर बैंक की नौकरी के बाद भी प्रकाश की आदतों में परिवर्तन नहीं आना... हमारा आदतों का गुलाम हो जाना... इशारे में ही दर्शा जाता है। 
फिर आती है कहानी की मूल विषय वस्तु.. जो एक कहावत... खजूर में खोलड़े ही लगते हैं... यानि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाए..... बबूल में तो कांटे ही लगेंगे.. यह सर्व विदित है....। इसी कहावत को झुठलाती है ये कहानी... कि बबूल में भी फूल लगते हैं.... जो मखमल से मुलायम भी होते हैं.... और एक खास मौसम में महकते भी हैं...। ... प्रकाश का पुत्र रवि भी... एक ऐसा ही ग़ुँचा है... जो है तो बबूल का.. लेकिन आभा के जीवन को महकने का मौका दे रहा है.... यही कहानी का असली सौंदर्य भी है...। इस सौंदर्य के शाब्दिक दर्शन..... लेखिका ऊषा गुलाटी की कलम... अपनी कहानी में पूरी शिद्दत के साथ.... कराती है...। बहुत बहुत बधाई.. ऊषा जी... कहानी भले ही पहली हो... लेकिन है मील का पत्थर.....। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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