लेखिका
है, वास्तव में उतना ही दूरूह विषय है। विचित्र दुविधा में हूँ, कहाँ से
शुरू किया जाए? इन दोनों में से कौन किस पर हावी है और कौन किसका उपयोग
या दुरुपयोग कर रहा है, सोचकर ही बुद्धि चकरा जाती है। कभी लगता है कि
मीडिया महिलाओं पर हावी है और कभी महिला समाज का बोलबाला नज़र आता है।
आज रसोईघर से लेकर बिस्तर तक, सड़क से संसद तक, समुद्र से आकाश तक अथवा
यूँ कहिए कि जहाँ तक हवा का गुज़र है, हर जगह मीडिया पसर चुका है। बात
स्त्री की हो तो कहने को बहुत कुछ है, पर मसला वही शुरू करने का है।
हमारा विषय महिलाओं को मीडिया की दृष्टि से देखना भी है और मीडिया को
महिलाओं की दृष्टि से देखना भी। क्योंकि ज़माना मीडिया का है और आज मीडिया
कहता है कि स्त्री दलित है, भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज है,
वगैरह...वगैरह। जब कि आज के युग की नारी हर हाल में सक्षम और पहले से
कहीं अधिक शक्तिशाली होकर उभरी है। ऐसा कौन-सा क्षेत्र है जहाँ नारी ने
अपने जौहर नहीं दिखाए? हो सकता है कुछ लोगों की दृष्टि में मीडिया का सच
ही सच हो। परन्तु नहीं, ज़रा रुकिए! हमारे भारतीय समाज में नारी को
गृहलक्ष्मी भी तो कहा जाता है। आज से कुछ ही दशक पूर्व तक स्त्री घर की
शोभा थी, परन्तु बदलती परिस्थितियों में वह सड़क से संसद तक हर जगह
उपस्थित है। ऐसे में मीडिया उसका पीछा न करे यह कैसे सम्भव हो सकता है?
मीडिया के कहने सुनने की बात को एक तरफ भी रख दें और थोड़ा-सा व्यवहारिक
दृष्टि से देखें तो आप पायेंगे कि प्रगति की इस अंधी दौड़ में कोई भी घर,
घर की मुखिया स्त्री द्वारा ही संचालित होता है। समाज के पूर्व निर्धारित
नियमों के अनुसार आज भी वह गृहस्वामिनी ही है और पुरुष गृहस्वामी। अन्तर
केवल नारी-नारी के स्वभाव में होता है और यह सहज स्वाभाविक बात है कि कभी
भी किन्हीं दो मनुष्यों का स्वभाव एक जैसा नहीं होता, तब दो स्त्रियों का
स्वभाव भी एक जैसा कैसे हो सकता है? शास्त्रों की बात मानें तो सृष्टि के
त्रिगुणातीत स्वभाव के कारण कोई मनुष्य रजोगुण प्रधान है तो कोई तामसी
वृत्ति का होता है और कोई नितांत सात्विक। यह नियम मनुष्य मात्र के लिए
है। न तो केवल स्त्री के लिए और न ही केवल पुरुष के लिए, क्योंकि अन्य
जीवधारियों के पास न तो मन है न मस्तिष्क और मीडिया केवल मन-मस्तिष्क का
ही खेल है। ईश्वर ने क्योंकि अपने घर में कोई मीडियाकर्मी नहीं रखा, जो
उसके बनाए नियमों में दखल दे सके और इन्सान की फितरत में घालमेल कर सके
और प्रकृति स्त्री-पुरुष में भेद नहीं करती, इसीलिए मनुष्य की संरचना में
कोई अंतर नहीं आया। उसकी प्रकृति वही त्रिगुणातीत है। हाँ तमोगुण इन
दिनों कुछ बढ़ा हुआ अवश्य है।
स्त्री के संदर्भ में देखा जाए तो बस बात केवल मात्र इतनी-सी है कि
स्त्री शारीरिक बल और संरचना में पुरुष से अलग होने के कारण कहीं-कहीं
नहीं, अक्सर ही मात खा जाती है। कभी बलात्कार का शिकार होती है तो कभी
पारिवारिक हिंसा का। परन्तु अपने स्वभाव की विशेषता का प्रयोग वह सदा से
करती आई है और सभ्य समाज द्वारा सृजित मीडिया भी साथ ही साथ अपना कार्य
करता रहा है, हाँ! आज की तरह न तो मीडिया पहले इतना भ्रष्ट था और न झूठा।
इसी कारण उसका दुरुपयोग नहीं किया जा सका। सृष्टि के सबसे बड़े
मीडियाकर्मी नारद मुनि सब की खबर ले, सब को खबर दे की नीति पर चलते थे
परन्तु उनका मीडिया समाज के भले के लिए काम करता था । इतिहासकारों की
नीतियाँ भी स्पष्ट और समाजोन्मुखी थीं।
बात पौराणिक काल से शुरू की जाए तो वेदों की बहुत सी ऋचायें महिलाओं ने
रची बताई जाती हैं। क्या यह दलित, उपेक्षित महिला का काम है? तथा-कथित
दलित अथवा प्रताड़ित की गई स्त्री की बुद्धि क्या सामान्य हो सकती है? यह
विचारणीय प्रश्न है। वैदिक काल से आज की तुलना करने लगें तो उन दिनों
प्रचार का माध्यम कोई मीडिया नहीं था। बात मुख दर मुख आगे बढ़ती थी। इसी
मौखिक मीडिया ने उस समय अपना काम किया है। परन्तु वह हर हाल में नारी को
केंद्रित करके नहीं होता था, न हीं नारी आज की तरह उसका दुरुपयोग कर सकती
थी। जो होता, जैसा होता सामने आ जाता।
साधारणतया देखा जाए तो आपत्ति-विपत्ति के समय मन तो क्या शरीर भी काम
करने से इनकार कर देता है, ऐसे में विचारणीय है कि प्रताड़ित की गई स्त्री
कैसे बड़े-बड़े कारनामे कर सकती है? परन्तु यह भी पढ़ा है कि नारी को
बहुभोग्या होने से बचाने के लिए विवाह संस्था का जन्म हुआ। चलो यह भी मान
लेते हैं कि नारी दलित है, शोषित है, उपेक्षित है, फिर भी कैकेयी जैसी
प्रतिष्ठित और पति की लाडली रानी सौतेले पुत्र को चौदह वर्ष के लिए वनवास
भेज देती है। सूर्पणखा पूरे राक्षसकुल के सर्वनाश का कारण बन जाती है।
कुन्ती और माद्री पति के साथ वनों में भटकते हुए परम प्रतापी पुत्रों को
न केवल जन्म देती हैं अपितु उचित शिक्षा भी देती हैं। द्रौपदी अपने अपमान
के बदले में पूरे कुरुवंश का नाश करवा देती है। महाभारत जैसे विनाशकारी
युद्ध के अनेक कारणों में से विवशता में ब्याही गई गांधारी भी एक कारण
है। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे आपको, परन्तु वह तो इतिहास और पुराणों की
बातें हैं, जिन्हें हम केवल दोहरा मात्र सकते हैं, कुछ कर नहीं सकते।
हमें तो केवल वर्तमान पर ध्यान देना है।
वर्तमान समय में जहाँ तक नज़र दौड़ाइए अराजकता ही अराजकता दिखाई देती है।
हालांकि प्रकृति ने अपना कोई नियम नहीं बदला, वह उसी प्रकार त्रिगुणातीत
है किन्तु मनुष्य ने अपना स्वभाव बदल दिया है। हमारे भारतीय समाज की रचना
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित थी। इन्हें समाज के चार पुरुषार्थ
कहा जाता था। परन्तु वर्तमान में धर्म और मोक्ष की बातें दकियानूसी हो गई
हैं। किसी समय जहाँ धर्म से सृजित अर्थ (धन) काम में लाकर कामनापूर्ति की
जाती थी वहीं आज येन-केन-प्रकारेण धन संचय मात्र मनुष्य का लक्ष्य रह गया
है। इन्सान आरामपरस्त हो गया है। श्रम से नाता टूट रहा है। जहाँ ‘उत्तम
खेती, मध्यम बाण (वाणिज्य), निखिद्ध चाकरी, भीख निदान’ समाज का मूलमंत्र
था, वहीं आज चाकरी (नौकरियाँ) सर्वोपरि हो गई हैं। ऐसे में मीडिया की बन
आई है। कल तक जो मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ गिना जाता था, उसे भीतर
ही भीतर अर्थ का दीमक खोखला कर चुका है। अब बात आती है स्त्री की तो आज
की स्त्री न तो दलित है न ही शोषित। विदेशी आक्रांताओं के कारण वह भारतीय
महिला, जो सदियों तक घरों की चारदीवारियों के भीतर सिमटी रही, वह जाग
चुकी है और जाने-अनजाने मीडिया के सहारे, पूरे दमखम के साथ अपनी उपस्थिति
दर्ज करवा रही है।
इसी मीडिया के सहारे, महिलाओं के कंधों पर सवार, भारत में प्रचलित
परम्पराएँ, आपसी आदान-प्रदान के आधार पर उत्तर से दक्षिण तक फैलाने में
महिला और मीडिया दोनों ही की प्रमुख भूमिका है। पंजाब का विशिष्ट पर्व
करवाचौथ का व्रत आज पूरे भारत में मीडिया की कृपा से ही रखा जाता है, इसी
तरह बिहार की छट पूजा या दूसरे कई पर्व मनाए जा रहे हैं।
यह बात अलग है कि स्त्री प्रकृति प्रदत्त संरचना और शरीरिक दुर्बलताओं के
कारण कहीं-कहीं पैशाचिकता का शिकार हो जाती है फिर भी समाज और न्याय की
धारा को अपने अनुकूल करने के लिए वह मीडिया का खुलकर उपयोग भी करती है और
अपने स्वार्थ के लिए मीडिया भी नारी देह का खुलकर प्रयोग कर रहा है।
नए-नए कानूनों ने आज भारतीय स्त्री के सशक्तिकरण की दिशा में बहुत सारी
आशाएँ जगाई हैं तो वहीं अलग स्वभाव की स्त्रियों के द्वारा इन कानूनों का
खुलकर दुरुपयोग भी किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, दहेज कानून में कितने
ही झूठे केस दर्ज किए जाते हैं और मीडिया बहू को बेचारी बनाकर पेश करता
है। परिणाम यह होता है कि निरापराध परिवार जेल के सीखचों के पीछे देखे
जाते हैं। वहीं सच्चाई पर ऐसी चुप्पी साधी जाती है कि बेचारी बहू और
बेचारी हो जाती है। सवाल पैसे का है, कौन-सा पक्ष अधिक भेंट-पूजा दे सकता
है? बस पलड़ा उसी का भारी होता है, जिसका वज़न अधिक होता है। बात कड़वी है
पर है सच कि आज मीड़िया बिकाऊ है।
बात फिर घूम-फिरकर प्रकृति पर आ जाती है। यहाँ भी मीडिया का चक्र
स्त्री के स्वभाव को ही लक्ष्य पर रखता है। सतोगुण की वाहक शालीन महिला
जहाँ आज भी मीडिया का उपयोग शालीनता पूर्वक कर लेती है और बिना अधिक
हंगामें के अपना कार्य सम्भाल लेती है, वहीं तमोगुणी स्त्री अपने स्वभाव
के हिसाब से चलती है। हंगामा खड़ा करना उसका स्वभाव होता है और रही-बची
कसर उसके चारों ओर मंडराने वाले प्राणी पूरी कर देते हैं। यहाँ यह समझना
कठिन हो जाता है कि कौन किसका उपयोग कर रहा है, महिलाएँ मीडिया का या
मीडिया महिलाओं का? क्योंकि यहाँ महिला को लगता है कि उसका प्रचार हो रहा
है और वह लोकप्रियता हासिल कर रही है जबकि मीडिया उसे मामले को तूल देने
के लिए और उकसाता है। यहाँ देखने में यह आया है कि समाज के लिए नकारात्मक
विषयों को मीडिया बड़े जोर-शोर से उठाता है, जैसे पिछले दिनों हुए साक्षी
मिश्रा के काण्ड को ही लें।
हालांकि संविधान के अनुसार कोई भी वयस्क लड़की किसी भी वयस्क व्यक्ति से
विवाह कर सकती है, फिर भी समाज में अभी अंतर्जातीय विवाह सहजता से
स्वीकार नहीं किए जाते। उस पर भी जब परिवार को वर पक्ष की सारी
दुर्बलताएँ पता हों तो वह प्रयास करेंगे ही कि उनकी बेटी अंधे कुएँ में न
गिरे। बस इसी बात का लाभ मीडिया ने उठाया वह भी उस स्थिति में जब कन्या
का पिता किसी उच्च स्थान पर व्यवस्थित हों तो मीडिया को और भी करारे दाँव
लगाने का मौका मिल जाता है, यही मीडिया ने इस मामले में किया भी। कितने
ही दिन मामला सुर्खियों में रहा और बेचारे परिवारजन बाहर निकलने में भी
लज्जा का अनुभव करने लगे।
समाज में जब भी कहीं कुछ बदलाव होता है तो उसका विरोध स्वाभाविक तौर पर
होता ही है, फिर चाहे वह कोई भी वस्तु हो, परम्परा या वेशभूषा। क्योंकि
पुरानी परम्पराएँ अथवा वेशभूषा हमारा स्वभाव बन चुका होता है। जब तक हमें
घूंघट वाली स्त्री को देखने की आदत थी, तब हमें वही अच्छी लगती थी। समाज
में बदलते परिवेश में भी विदेशी वस्त्रों का जमकर विरोध हुआ और आज भी हो
रहा है, फिर भी आज कमोबेश पाश्चात्य परिधानों को स्वीकार कर लिया गया है।
साड़ी-घाघरा (जो हमारी पारम्परिक वेशभूषा थी) को छोड़कर सलवार कुर्ते का भी
विरोध अधिक पुरानी घटना नहीं है। आज भी किन्हीं घरों में विवाहित महिलाएँ
सलवार-कुर्ता नहीं पहनतीं। पर भला हो मीडिया का, तरह-तरह के सुन्दर
डिज़ाइनों के सलवार-सूटों के विज्ञापन बड़े-बड़े धुरंधरों को ललचा रहे हैं
और हमारी तथाकथित दलित-अदलित महिलाएँ धड़ल्ले से उन्हें अपना रही हैं।
इतना ही नहीं मीडिया आज बाजारवाद की रीढ़ की हड्डी बन चुका है और इस रीढ़
की हड्डी में दौड़ने वाले रक्त की हर बूंद को आज की महिला सींच रही है।
आज के दौर में कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका या दूरदर्शन का कोई भी चैनल
हो, कोई विज्ञापन हो उसमें आपको नारी मूर्तियाँ अवश्य दिखाई देंगी फिर वह
विज्ञापन भले ही शेविंग ब्लेड का हो। अब यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि
महिला के तन पर वस्त्र कितने थे। जितना अधिक से अधिक स्त्री का शरीर
उघाड़ा जा सके उतना ही मीडिया सफल माना जाएगा। न ही इन विज्ञापनों पर आज
का कोई सभ्यवर्ग आपत्ति उठाता है और न ही कोई महिला। जब कपड़े उतारने वाली
स्त्री को ही आपत्ति नहीं तो दूसरे किसी को क्यों होगी?
देखा जाए तो आज हमारे समाज में कोई व्यक्ति इस बात पर ध्यान भी नहीं
देता। रही चित्रांकित महिलाएँ, तो उनको इन चित्रों के बदले भरपूर धनराशि
मिलती है। अंग्रेज़ी सभ्यता के चलते बड़ा-सा नाम भी मिला होता है जिसे
हम-आप मॉडल कहते हैं। अब आप ही बताइए कि कौन किसका उपयोग या दुरुपयोग कर
रहा है, मीडिया महिलाओं का या महिलाएँ मीडिया का? मुझे लगता है दोनों इस
मामले में लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं। इस नग्नता के परिणाम क्या निकल
रहे हैं, यह एक अलग विषय है। इस पर फिर कभी विचार करेंगे।
आशा शैली जी का जन्म अस्मान खट्टड़-रावलपिंडी (अविभाजित भारत) में हुआ लेकिन वह वर्तमान में इंद्रा नगर नैनीताल, उत्तराखण्ड में निवास करती हैं।
कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, उपन्यास, बाल साहित्य आदि प्रत्येक विधा में आपकी लेखनी समान अधिकार रखती है। आप मुख्य रूप से हिन्दी के साथ साथ पंजाबी, पहाड़ी, (हिमाचली डोगरी-महासवी), उर्दू, ओड़िआ आदि भाषाओं में भी साहित्य सृजन करती हैं।
सभी विधाओं पर आपकी लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
देश की अधिकांश पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन से भी आपकी रचनाओं का लगातार प्रसारण होता रहता है।
कवि सम्मलेन और साहित्यिक मंचों में भी आप की सक्रिय सहभागिता बनी रहती है।
आपको उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
आप शैलसूत्र (त्रैमासिक) का प्रकाशन-सम्पादन भी करती हैं। आरती प्रकाशन की संस्थापक भी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
महिलाएँ और मीडिया
महिलाएँ और मीडिया या मीडिया और महिलाएँ? यह देखने में जितना सरल लगताहै, वास्तव में उतना ही दूरूह विषय है। विचित्र दुविधा में हूँ, कहाँ से
शुरू किया जाए? इन दोनों में से कौन किस पर हावी है और कौन किसका उपयोग
या दुरुपयोग कर रहा है, सोचकर ही बुद्धि चकरा जाती है। कभी लगता है कि
मीडिया महिलाओं पर हावी है और कभी महिला समाज का बोलबाला नज़र आता है।
आज रसोईघर से लेकर बिस्तर तक, सड़क से संसद तक, समुद्र से आकाश तक अथवा
यूँ कहिए कि जहाँ तक हवा का गुज़र है, हर जगह मीडिया पसर चुका है। बात
स्त्री की हो तो कहने को बहुत कुछ है, पर मसला वही शुरू करने का है।
हमारा विषय महिलाओं को मीडिया की दृष्टि से देखना भी है और मीडिया को
महिलाओं की दृष्टि से देखना भी। क्योंकि ज़माना मीडिया का है और आज मीडिया
कहता है कि स्त्री दलित है, भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज है,
वगैरह...वगैरह। जब कि आज के युग की नारी हर हाल में सक्षम और पहले से
कहीं अधिक शक्तिशाली होकर उभरी है। ऐसा कौन-सा क्षेत्र है जहाँ नारी ने
अपने जौहर नहीं दिखाए? हो सकता है कुछ लोगों की दृष्टि में मीडिया का सच
ही सच हो। परन्तु नहीं, ज़रा रुकिए! हमारे भारतीय समाज में नारी को
गृहलक्ष्मी भी तो कहा जाता है। आज से कुछ ही दशक पूर्व तक स्त्री घर की
शोभा थी, परन्तु बदलती परिस्थितियों में वह सड़क से संसद तक हर जगह
उपस्थित है। ऐसे में मीडिया उसका पीछा न करे यह कैसे सम्भव हो सकता है?
मीडिया के कहने सुनने की बात को एक तरफ भी रख दें और थोड़ा-सा व्यवहारिक
दृष्टि से देखें तो आप पायेंगे कि प्रगति की इस अंधी दौड़ में कोई भी घर,
घर की मुखिया स्त्री द्वारा ही संचालित होता है। समाज के पूर्व निर्धारित
नियमों के अनुसार आज भी वह गृहस्वामिनी ही है और पुरुष गृहस्वामी। अन्तर
केवल नारी-नारी के स्वभाव में होता है और यह सहज स्वाभाविक बात है कि कभी
भी किन्हीं दो मनुष्यों का स्वभाव एक जैसा नहीं होता, तब दो स्त्रियों का
स्वभाव भी एक जैसा कैसे हो सकता है? शास्त्रों की बात मानें तो सृष्टि के
त्रिगुणातीत स्वभाव के कारण कोई मनुष्य रजोगुण प्रधान है तो कोई तामसी
वृत्ति का होता है और कोई नितांत सात्विक। यह नियम मनुष्य मात्र के लिए
है। न तो केवल स्त्री के लिए और न ही केवल पुरुष के लिए, क्योंकि अन्य
जीवधारियों के पास न तो मन है न मस्तिष्क और मीडिया केवल मन-मस्तिष्क का
ही खेल है। ईश्वर ने क्योंकि अपने घर में कोई मीडियाकर्मी नहीं रखा, जो
उसके बनाए नियमों में दखल दे सके और इन्सान की फितरत में घालमेल कर सके
और प्रकृति स्त्री-पुरुष में भेद नहीं करती, इसीलिए मनुष्य की संरचना में
कोई अंतर नहीं आया। उसकी प्रकृति वही त्रिगुणातीत है। हाँ तमोगुण इन
दिनों कुछ बढ़ा हुआ अवश्य है।
स्त्री के संदर्भ में देखा जाए तो बस बात केवल मात्र इतनी-सी है कि
स्त्री शारीरिक बल और संरचना में पुरुष से अलग होने के कारण कहीं-कहीं
नहीं, अक्सर ही मात खा जाती है। कभी बलात्कार का शिकार होती है तो कभी
पारिवारिक हिंसा का। परन्तु अपने स्वभाव की विशेषता का प्रयोग वह सदा से
करती आई है और सभ्य समाज द्वारा सृजित मीडिया भी साथ ही साथ अपना कार्य
करता रहा है, हाँ! आज की तरह न तो मीडिया पहले इतना भ्रष्ट था और न झूठा।
इसी कारण उसका दुरुपयोग नहीं किया जा सका। सृष्टि के सबसे बड़े
मीडियाकर्मी नारद मुनि सब की खबर ले, सब को खबर दे की नीति पर चलते थे
परन्तु उनका मीडिया समाज के भले के लिए काम करता था । इतिहासकारों की
नीतियाँ भी स्पष्ट और समाजोन्मुखी थीं।
बात पौराणिक काल से शुरू की जाए तो वेदों की बहुत सी ऋचायें महिलाओं ने
रची बताई जाती हैं। क्या यह दलित, उपेक्षित महिला का काम है? तथा-कथित
दलित अथवा प्रताड़ित की गई स्त्री की बुद्धि क्या सामान्य हो सकती है? यह
विचारणीय प्रश्न है। वैदिक काल से आज की तुलना करने लगें तो उन दिनों
प्रचार का माध्यम कोई मीडिया नहीं था। बात मुख दर मुख आगे बढ़ती थी। इसी
मौखिक मीडिया ने उस समय अपना काम किया है। परन्तु वह हर हाल में नारी को
केंद्रित करके नहीं होता था, न हीं नारी आज की तरह उसका दुरुपयोग कर सकती
थी। जो होता, जैसा होता सामने आ जाता।
साधारणतया देखा जाए तो आपत्ति-विपत्ति के समय मन तो क्या शरीर भी काम
करने से इनकार कर देता है, ऐसे में विचारणीय है कि प्रताड़ित की गई स्त्री
कैसे बड़े-बड़े कारनामे कर सकती है? परन्तु यह भी पढ़ा है कि नारी को
बहुभोग्या होने से बचाने के लिए विवाह संस्था का जन्म हुआ। चलो यह भी मान
लेते हैं कि नारी दलित है, शोषित है, उपेक्षित है, फिर भी कैकेयी जैसी
प्रतिष्ठित और पति की लाडली रानी सौतेले पुत्र को चौदह वर्ष के लिए वनवास
भेज देती है। सूर्पणखा पूरे राक्षसकुल के सर्वनाश का कारण बन जाती है।
कुन्ती और माद्री पति के साथ वनों में भटकते हुए परम प्रतापी पुत्रों को
न केवल जन्म देती हैं अपितु उचित शिक्षा भी देती हैं। द्रौपदी अपने अपमान
के बदले में पूरे कुरुवंश का नाश करवा देती है। महाभारत जैसे विनाशकारी
युद्ध के अनेक कारणों में से विवशता में ब्याही गई गांधारी भी एक कारण
है। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे आपको, परन्तु वह तो इतिहास और पुराणों की
बातें हैं, जिन्हें हम केवल दोहरा मात्र सकते हैं, कुछ कर नहीं सकते।
हमें तो केवल वर्तमान पर ध्यान देना है।
वर्तमान समय में जहाँ तक नज़र दौड़ाइए अराजकता ही अराजकता दिखाई देती है।
हालांकि प्रकृति ने अपना कोई नियम नहीं बदला, वह उसी प्रकार त्रिगुणातीत
है किन्तु मनुष्य ने अपना स्वभाव बदल दिया है। हमारे भारतीय समाज की रचना
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित थी। इन्हें समाज के चार पुरुषार्थ
कहा जाता था। परन्तु वर्तमान में धर्म और मोक्ष की बातें दकियानूसी हो गई
हैं। किसी समय जहाँ धर्म से सृजित अर्थ (धन) काम में लाकर कामनापूर्ति की
जाती थी वहीं आज येन-केन-प्रकारेण धन संचय मात्र मनुष्य का लक्ष्य रह गया
है। इन्सान आरामपरस्त हो गया है। श्रम से नाता टूट रहा है। जहाँ ‘उत्तम
खेती, मध्यम बाण (वाणिज्य), निखिद्ध चाकरी, भीख निदान’ समाज का मूलमंत्र
था, वहीं आज चाकरी (नौकरियाँ) सर्वोपरि हो गई हैं। ऐसे में मीडिया की बन
आई है। कल तक जो मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ गिना जाता था, उसे भीतर
ही भीतर अर्थ का दीमक खोखला कर चुका है। अब बात आती है स्त्री की तो आज
की स्त्री न तो दलित है न ही शोषित। विदेशी आक्रांताओं के कारण वह भारतीय
महिला, जो सदियों तक घरों की चारदीवारियों के भीतर सिमटी रही, वह जाग
चुकी है और जाने-अनजाने मीडिया के सहारे, पूरे दमखम के साथ अपनी उपस्थिति
दर्ज करवा रही है।
इसी मीडिया के सहारे, महिलाओं के कंधों पर सवार, भारत में प्रचलित
परम्पराएँ, आपसी आदान-प्रदान के आधार पर उत्तर से दक्षिण तक फैलाने में
महिला और मीडिया दोनों ही की प्रमुख भूमिका है। पंजाब का विशिष्ट पर्व
करवाचौथ का व्रत आज पूरे भारत में मीडिया की कृपा से ही रखा जाता है, इसी
तरह बिहार की छट पूजा या दूसरे कई पर्व मनाए जा रहे हैं।
यह बात अलग है कि स्त्री प्रकृति प्रदत्त संरचना और शरीरिक दुर्बलताओं के
कारण कहीं-कहीं पैशाचिकता का शिकार हो जाती है फिर भी समाज और न्याय की
धारा को अपने अनुकूल करने के लिए वह मीडिया का खुलकर उपयोग भी करती है और
अपने स्वार्थ के लिए मीडिया भी नारी देह का खुलकर प्रयोग कर रहा है।
नए-नए कानूनों ने आज भारतीय स्त्री के सशक्तिकरण की दिशा में बहुत सारी
आशाएँ जगाई हैं तो वहीं अलग स्वभाव की स्त्रियों के द्वारा इन कानूनों का
खुलकर दुरुपयोग भी किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, दहेज कानून में कितने
ही झूठे केस दर्ज किए जाते हैं और मीडिया बहू को बेचारी बनाकर पेश करता
है। परिणाम यह होता है कि निरापराध परिवार जेल के सीखचों के पीछे देखे
जाते हैं। वहीं सच्चाई पर ऐसी चुप्पी साधी जाती है कि बेचारी बहू और
बेचारी हो जाती है। सवाल पैसे का है, कौन-सा पक्ष अधिक भेंट-पूजा दे सकता
है? बस पलड़ा उसी का भारी होता है, जिसका वज़न अधिक होता है। बात कड़वी है
पर है सच कि आज मीड़िया बिकाऊ है।
बात फिर घूम-फिरकर प्रकृति पर आ जाती है। यहाँ भी मीडिया का चक्र
स्त्री के स्वभाव को ही लक्ष्य पर रखता है। सतोगुण की वाहक शालीन महिला
जहाँ आज भी मीडिया का उपयोग शालीनता पूर्वक कर लेती है और बिना अधिक
हंगामें के अपना कार्य सम्भाल लेती है, वहीं तमोगुणी स्त्री अपने स्वभाव
के हिसाब से चलती है। हंगामा खड़ा करना उसका स्वभाव होता है और रही-बची
कसर उसके चारों ओर मंडराने वाले प्राणी पूरी कर देते हैं। यहाँ यह समझना
कठिन हो जाता है कि कौन किसका उपयोग कर रहा है, महिलाएँ मीडिया का या
मीडिया महिलाओं का? क्योंकि यहाँ महिला को लगता है कि उसका प्रचार हो रहा
है और वह लोकप्रियता हासिल कर रही है जबकि मीडिया उसे मामले को तूल देने
के लिए और उकसाता है। यहाँ देखने में यह आया है कि समाज के लिए नकारात्मक
विषयों को मीडिया बड़े जोर-शोर से उठाता है, जैसे पिछले दिनों हुए साक्षी
मिश्रा के काण्ड को ही लें।
हालांकि संविधान के अनुसार कोई भी वयस्क लड़की किसी भी वयस्क व्यक्ति से
विवाह कर सकती है, फिर भी समाज में अभी अंतर्जातीय विवाह सहजता से
स्वीकार नहीं किए जाते। उस पर भी जब परिवार को वर पक्ष की सारी
दुर्बलताएँ पता हों तो वह प्रयास करेंगे ही कि उनकी बेटी अंधे कुएँ में न
गिरे। बस इसी बात का लाभ मीडिया ने उठाया वह भी उस स्थिति में जब कन्या
का पिता किसी उच्च स्थान पर व्यवस्थित हों तो मीडिया को और भी करारे दाँव
लगाने का मौका मिल जाता है, यही मीडिया ने इस मामले में किया भी। कितने
ही दिन मामला सुर्खियों में रहा और बेचारे परिवारजन बाहर निकलने में भी
लज्जा का अनुभव करने लगे।
समाज में जब भी कहीं कुछ बदलाव होता है तो उसका विरोध स्वाभाविक तौर पर
होता ही है, फिर चाहे वह कोई भी वस्तु हो, परम्परा या वेशभूषा। क्योंकि
पुरानी परम्पराएँ अथवा वेशभूषा हमारा स्वभाव बन चुका होता है। जब तक हमें
घूंघट वाली स्त्री को देखने की आदत थी, तब हमें वही अच्छी लगती थी। समाज
में बदलते परिवेश में भी विदेशी वस्त्रों का जमकर विरोध हुआ और आज भी हो
रहा है, फिर भी आज कमोबेश पाश्चात्य परिधानों को स्वीकार कर लिया गया है।
साड़ी-घाघरा (जो हमारी पारम्परिक वेशभूषा थी) को छोड़कर सलवार कुर्ते का भी
विरोध अधिक पुरानी घटना नहीं है। आज भी किन्हीं घरों में विवाहित महिलाएँ
सलवार-कुर्ता नहीं पहनतीं। पर भला हो मीडिया का, तरह-तरह के सुन्दर
डिज़ाइनों के सलवार-सूटों के विज्ञापन बड़े-बड़े धुरंधरों को ललचा रहे हैं
और हमारी तथाकथित दलित-अदलित महिलाएँ धड़ल्ले से उन्हें अपना रही हैं।
इतना ही नहीं मीडिया आज बाजारवाद की रीढ़ की हड्डी बन चुका है और इस रीढ़
की हड्डी में दौड़ने वाले रक्त की हर बूंद को आज की महिला सींच रही है।
आज के दौर में कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका या दूरदर्शन का कोई भी चैनल
हो, कोई विज्ञापन हो उसमें आपको नारी मूर्तियाँ अवश्य दिखाई देंगी फिर वह
विज्ञापन भले ही शेविंग ब्लेड का हो। अब यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि
महिला के तन पर वस्त्र कितने थे। जितना अधिक से अधिक स्त्री का शरीर
उघाड़ा जा सके उतना ही मीडिया सफल माना जाएगा। न ही इन विज्ञापनों पर आज
का कोई सभ्यवर्ग आपत्ति उठाता है और न ही कोई महिला। जब कपड़े उतारने वाली
स्त्री को ही आपत्ति नहीं तो दूसरे किसी को क्यों होगी?
देखा जाए तो आज हमारे समाज में कोई व्यक्ति इस बात पर ध्यान भी नहीं
देता। रही चित्रांकित महिलाएँ, तो उनको इन चित्रों के बदले भरपूर धनराशि
मिलती है। अंग्रेज़ी सभ्यता के चलते बड़ा-सा नाम भी मिला होता है जिसे
हम-आप मॉडल कहते हैं। अब आप ही बताइए कि कौन किसका उपयोग या दुरुपयोग कर
रहा है, मीडिया महिलाओं का या महिलाएँ मीडिया का? मुझे लगता है दोनों इस
मामले में लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं। इस नग्नता के परिणाम क्या निकल
रहे हैं, यह एक अलग विषय है। इस पर फिर कभी विचार करेंगे।
आशा शैली, इंद्रा नगर, नैनीताल, उत्तराखंड
--------------परिचय
आशा शैली जी का जन्म अस्मान खट्टड़-रावलपिंडी (अविभाजित भारत) में हुआ लेकिन वह वर्तमान में इंद्रा नगर नैनीताल, उत्तराखण्ड में निवास करती हैं।
कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, उपन्यास, बाल साहित्य आदि प्रत्येक विधा में आपकी लेखनी समान अधिकार रखती है। आप मुख्य रूप से हिन्दी के साथ साथ पंजाबी, पहाड़ी, (हिमाचली डोगरी-महासवी), उर्दू, ओड़िआ आदि भाषाओं में भी साहित्य सृजन करती हैं।
सभी विधाओं पर आपकी लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
देश की अधिकांश पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन से भी आपकी रचनाओं का लगातार प्रसारण होता रहता है।
कवि सम्मलेन और साहित्यिक मंचों में भी आप की सक्रिय सहभागिता बनी रहती है।
आपको उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
आप शैलसूत्र (त्रैमासिक) का प्रकाशन-सम्पादन भी करती हैं। आरती प्रकाशन की संस्थापक भी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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