लेखिका 
सावनी मुक्तक
1-
वो बादल बनके आयेंगे ,जमीँ पर दिल की छायेंगे। 
कसक मन में उठेगी जब, झमाझम बरस जायेंगे, 
पुलकित तन, हर्षित मन ,छलकेगा नयन से सावन,
नेह से मचल जब प्रियतम, हृदय सजनी  लगायेंगे।

 2-
पहन कर रँग मौसम के गुलाबों सी महकती हूँ। 
झटकती जुल्फ से बादल मैं सावन सी बरसती हूँ,
खिली ज्यों धूप बासन्ती पिया पहलू में आ तेरे, 
लगा कर प्रीति का काजल मैं कोयल सी चहकती हूँ।

 3-
पहन  धानी  चुनरिया  जब  धरा ये मुस्कुराती है।
पाँव बाँधे पायलिया तब पवन  भी गुनगुनाती है। 
ये बादल और ये बुँदिया, ये पत्ते, फूल ये कलियाँ ,
मगन सब नाचते सावन,सजन तेरी याद आती हैं!

4-
हवायें बहकी बहकी थी फिजा भी महकी महकी सी!
बरसना बूँदों का रिमझिम  गमक वो  सोंधी मिट्टी की !
शरारों  में   मगन  जब  नृत्य  करती  थी  तेरी यादें ,
नयन  शोला बरसता था  बदन  बिजुरी चमकती थी!

5-
वो चिड़िया सी चहकती है, वो पायल सी खनकती है।
कभी  बिन्दास  कलियों सी  सरे  गुलशन महकती है।
मिसाल उसकी कहां, वो तो मगरुर  है साहिब
मेरे  बीमार  दिल  पर  वो  कहाँ  इक  पल बरसती  है!

6-
भोर की लालिमा जैसी सुहानी शाम सी मेंहदी,
लगा ली जबसे मैंने ये तुम्हारे नाम की मेंहदी,
अधर धर दो हथेली पर, सुहागन रात खिल जाये।
न देखो तुम पिया तो ये मेरे किस काम की मेंहदी।

7-
मेरी पलकों की कश्ती फिर  तुझे मंजूर  हो जाए ।
पवन ये सिरफिरी,  फिर  से नशे में  चूर हो जाए। 
ये तितली, फूल, ये  भौंरे, सुनाऐं फिर तेरे किस्से, 
मैं   तेरी   हूर   हो  जाऊँ,  तू  मेरा  नूर  हो जाए ।

8-
वहीं आँखे, वहीं जुल्फें, वही बातें अजब आली,
वही बिन्दी,  वही सुर्खी,  वही  बेंदी, वही बाली,
जरा महसूस करने दो, ये  सांसे और ये धड़कन ,
गज़ब क्या खूब लगती है,प्रिय तेरी होंठ की लाली।

किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"
नोयडा
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