कहानी-
लेखिका
मन्नतों के धागे
-----------दिल्ली में रहने वाली सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता कल्याणी देवी होली के त्यौंहार में छह बरस बाद अपनी पुश्तैनी गाँव श्यामपुर आई थी सुबह मार्निंग वाॅक पर उन्होंने देखा कि पीपल का पेड़ मन्नतों के धागों से पटा पड़ा हैं जड़ के समीप लुढ़के बुझे दियों से तेल रिस-रिस मिट्टी में समा चुका था। मुर्झाया पीपल अपनी अन्तिम साँसे गिन रहा था पेड़ की ऐसी दुर्दशा देखकर वह दुखी हो गईं ।
कल्याणी देवी के पूछने पर गाँव वालों ने बताया तीन बरस पहले पंडित परमानंद का देहावसान हो गया था गाँव वालों को विश्वास था कि पीपल वृक्ष पर उनकी आत्मा का वास हैं। तब से प्रत्येक मंगलवार को यहां दूर दूर से रोगी ,मनोरोगी,मानता वाले लोग आते हैं ।
कल्याणी जी ने गांव के प्रधान से गाँव वालों को एकत्रित कर समझाने के लिए कहा प्रधान जी ने कहा " गाँव के लोग तर्क की भाषा नहीं समझेंगे न मानेंगे।विश्वास ही अंधविश्वास को हटा सकता हैं।आप परेशान न हो मैं कुछ करता हूँ ।
दो तीन बाद प्रधान जी ने गांव के दो चार मुख्य लोगों से कहा" रात सपने में पंडित परमानंद जी कह रहें थे "इतने धागा डोरी बाँध-बाँध के हमारी साँस घुट रही हैं और ये जो दिये जलाते हो उसकी गर्मी से हम मरें जा रहें है हम प्यासे हैं। हमारा आशीर्वाद लेना हो तो हमको एक-एक अंजुर भर पानी पिलाओं"।
एक सप्ताह बाद कल्याणी जी ने देखा डोरी,धागें,चुनरी वृक्ष पर से उतर चुके हैं,दिये हटा दिए गये हैं एक बाल्टी पानी रख दी गई हैं।लोग अंजुर भर पानी जड़ में डाल कर अपनी-अपनी प्रार्थना कर रहें हैं ।
कल्याणी जी मुस्काई,उन्हें विश्वास हो गया उनके जाते-जाते इस पीपल पर नये पत्ते जरूर निकलेंगे।
त्रिलोचना कौर, लखनऊ, उप्र
-------------------परिचय
त्रिलोचना कौर, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की निवासी हैं। पठन-पाठन में बाल्य काल से रुचि होने से विद्यार्थी जीवन में विद्यालय की मैगजीन में कहानियाँ एवं लेख प्रकाशित होना आरंभ हो गए। पच्चीस वर्षों पश्चात पुनः साहित्य प्रेम जाग्रत हुआ और सृजन पुनः प्रारंभ हो गया।नवगीत, दोहे ,मुक्तक और छंद मुक्त कविताएँ, लघु कथाएँ, कहानियाँ आदि विधाओं में आपकी बेहतरीन पकड़ है। खासकर देशज शब्दों के प्रयोग के साथ काव्य रचनाएँ अपना खास आकर्षण रखती हैं। गद्य-पद्य की विविध विधाओं पर पत्र-पत्रिकाओं,साँझा संकलन में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है।संपादक
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समीक्षा
पर्यावरण को हमारा स्वार्थ... कितना नुकसान पहुंचाता है.... इसकी झलक इस लघु कथा में मिलती है... जिसका नाम है मन्नत के धागे....। और.... वह स्वार्थ अगर धार्मिक मान्यताओं या यूँ कहें कि .... अंध विश्वास से जुड़ कर.. लोक प्रचलित हो जाए... तो चौबीस घंटे ऑक्सीजन देने वाला... पीपल खुद हांफने लगता है....। पीपल मात्र प्रतीक है... असल में तो हमने पेड़ों, नदियों, पहाड़ों और प्रकृति के... अन्य प्रतिनिधियों को भी प्रदूषित.... करने में कोई कोर कसर कहाँ छोड़ी है.....। कथानक में पात्रों के नाम का चयन... भी कुछ इस तरह से किया गया है.... मानों वे अपने नाम के अनुरूप ही.... काम करने के लिए रचे गए हैं......। जैसे कल्याणी देवी का... अपने गाँव श्यामपुर आना.... वहाँ पीपल की दम घुटते देखना.... दीपकों के तेल के रिसाव से... उनकी लौ की ऊष्मा से..... धागों के बांधे जाने से..... और अपने नाम के अनुरूप पीपल का कल्याण करने का विचार जाग्रत होता है..... पंडित परमानंद के नाम के ठीक.... विपरीत आचरण वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं का है.... जो पीपल के स्वभाविक आनंद.... को ही अशांति में बदल रहे हैं.... गाँव के प्रधान का कथानक में प्रवेश.... एक नये विचार को जन्म देता है.... जो अंधविश्वास को दूर करने में... तर्क से भी ज्यादा.... कारगर साबित होता है... ऐसे ही विचार.... परिवर्तन की नव क्रांति की.. आधार शिला बन सकते हैं.... अगर इस तरह के विचारों को एक आंदोलन की तरह... जन जन के मन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया जाए....। विचार की ही शक्ति है कि... पीपल की जड़ों को... दियों से रिसने वाले तेल की जगह.... एक अंजुरि पानी मिलने लगता है....। कथानक को बहुत.... सादगी के साथ रचा गया है..... जो अपने उद्देश्य की प्राप्ति करते ही.... विशिष्टता से युक्त हो जाता है.... एक खुशी दे जाता है.... मन को.... एक विचार दे जाता है... मस्तिष्क को... एक काम सौंप जाता है.... शरीर को.....। यही त्रिवेणी... तारणहार बन सकती है.... प्रकृति के अंधविश्वास से भरे स्वार्थ से हो रहे... प्रदूषण से मुक्ति की.....। लेखिका ने.... युक्ति अच्छी सुझाई है.... मेरा मानना है कि... यह मात्र कथानक नहीं... एक पुनीत विचार है.... यह विचार आंदोलन बन... आने वाली पीढी के लिए.... प्रदूषण से मुक्ति पाने... की युक्ति बन जाए... इन्हीं शुभकामनाओं के साथ... बधाई....।शैलेश तिवारी, संपादक


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