2 दिनों की झमाझम के बाद रविवार को मिली राहत,
घोघरा एवं कोलार डेम लबालब,
रबी फसल सिंचाई की चिंता हुई दूर..
नसरूल्लागंज, एमपी मीडिया पाइंट

मौसम की अनिश्चितता के बीच शुक्रवार और शनिवार को मानसून ऐसा मेहरबान हुआ कि सूखे की मार झेल रहे संपूर्ण क्षेत्र को पानी-पानी कर दिया। जिसमें क्षेत्र वासियों , खासकर अन्नदाताओं ने राहत की सांस ली। अन्नदाता को इस बारिश ने एक और बड़ी राहत पहुंचाते हुए क्षेत्र की 80 प्रतिशत सिंचाई क्षमता को पूरा करने वाले कोलार और घोघरा डेम को भी लबालब कर दिया। जिससे रबी फसल में सिंचाई के लिए होने वाली चिंता अब कुछ हद तक कम होती हुई दिखाई दी।

ज्ञातव्य है कि अगस्त माह के अंतिम सप्ताह तक मानसून की बेरूखी के कारण पूरे क्षेत्र में सूखे के हालात बने हुए थे। क्योंकि संपूर्ण मानसून के दो माह से अधिक समय बीतने के बाद भी मात्र 24 इंच बरसात ही हो सकी थी। जो क्षेत्र की सामान्य बरसात लगभग 44 इंच से बहुत कम थी। जिसके कारण लोगों को सूखे की चिंता सताने लगी थी। वहीं किसानों को चिता इस बात की थी कि सूखे के कारण उनकी सोयाबीन की फसल पहले ही रोग ग्रस्त हो चुकी है और ऐसे में किसानों को रबी फसल की आस मानसून पर टिकी हुई थी। क्योंकि मानसून की सक्रियता से क्षेत्र में सिंचाई के लिए कोलार और घोघरा डेम का भराब आवश्यक था। इसी के मद्देनजर शुक्रवार और शनिवार को लोगों को इच्छा को पूरा करते हुए मानसून ने न केवल जल क्षमता को बढ़ाया बल्कि सिंचाई की मांग को पूरा करने वाले दोनों डेमों को भी भर कर काफी हद तक अन्नदाता की चिंताओं को दूर कर दिया।

घटा नर्मदा का जल स्तर

लगातार बारिस के बाद रविवार को नर्मदा के जल स्तर में कमी देखी गई। जिससे प्रशासन और बाढ़ ग्रस्त ग्रामों के लोगों ने राहत की सांस ली है। शनिवार को पूरे दिन क्षेत्र के एक दर्जन से भी अधिक गांव बाढ़ की चपेट में आने वाले से परेशान हो गए थे और लगातार बड़ रहे जल स्तर के कारण दिक्कतें सामने आने लगी थी। लेकिन रविवार सुबह से नर्मदा नदी के जल स्तर में कमी आई। जिससे प्रशासन ने राहत की सांस ली।
दिए सर्वे के निर्देश
एसडीएम डीएस तोमर ने बताया कि नर्मदा सहित कोलार एवं सीप नदी के कारण निर्मित हुई बाढ़ की स्थिति को देखते हुए जल स्तर कम होने के बाद पूरे क्षेत्र में सर्वे के निर्देश दिए गए है। इस मामले में राजस्व एवं पंचायत अमले को निर्देशित किया गया है कि जहां-जहां भी बाढ़ के हालात निर्मित हुए थे वहां पर पहुंचकर नुकसान का आंकलन किया जाए और जिन किसानों की फसलें पानी में लंबे समय तक डूबी रही है उनका भी आंकलन कर सर्वे किया जाए।
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