वर्तमान समय, समस्याएँ और साहित्यकार की चुनौतियाँ
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=लेख
आज की समस्या यह नहीं है कि साहित्यकार केवल और केवल साहित्य सृजन में ही रमा हुआ है। आज एक बड़ी समस्या यह भी है कि साहित्यकार या अन्य कोई भी समाज का प्राणी राजनीति से बचने में अपने आप को अक्षम पाता है । और इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि राजनीति आज के नागरिक के जीवन के हर पहलू से जुड़ी हुई है। बतौर एक साहित्यकार कोई भी व्यक्ति , वर्तमान समाज और उससे जुड़ी हुई समस्याओं से मुँह नहीं मोड़ सकता।
बहुत से लोगों को ऐसा लग सकता है कि साहित्यकार भी अब राजनीति करने लगे हैं। वस्तुतः समाज से जुड़ी हुई समस्याओं को लेकर जब भी रचनाओं का सृजन होता है, उसमें वर्तमान समय के समाज की पीड़ा भी समाहित रहती हैं । यह साहित्यकार की अपनी जागरूकता पर भी निर्भर करता है कि वह सामाजिक और राजनीतिक रूप से कितना जाग्रत है। एक साहित्यकार से यह अपेक्षा सदैव ही की जाती है कि साहित्यकार अपने समय की बुराइयों को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकट करेगा, और समाज को जागरूक करेगा। लेकिन दुर्भाग्य से बहुधा ऐसा समझ लिया जाता है कि साहित्यकार केवल और केवल सत्ता के विरोध में लिख रहा है।
साहित्यकार स्वयं भी एक नागरिक होता है, इसलिए साहित्यकार अपने समय और सोच के अनुसार सत्ता का विरोधी करता है। दरअसल साहित्यकार का यह कर्तव्य भी है कि वह माजूदा शासन को संभाले। मुझे याद आता है कि एक बार मंच से उतरते समय पंडित जवाहरलाल नेहरू का संतुलन बिगड़ गया था और रामधारी सिंह दिनकर जी ने उन्हें संभाला था। उस समय रामधारी सिंह दिनकर जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि जब- जब राजनीति लड़खड़ाएगी,समय के साहित्यकार उसे इसी प्रकार संभाल लेंगे।
वर्तमान दौर में बहुत से लोग इस काम को कर रहे हैं । वे अपनी- अपनी समझ के और सामर्थ्य के हिसाब से सत्ता का और सत्ता की गलत नीतियों का प्रतिकार भी करते हैं, और अच्छी नीतियों का स्वागत भी करते हैं। हर दल की अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षायेँ और मजबूरियां हो सकती हैं, लेकिन एक साहित्यकार को सदैव निरपेक्ष रूप से और सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए। सत्ता का दमन हमेशा अपनी मौजूदगी का एहसास करवाता रहा है, फिर वह चाहे ब्रिटिश काल हो, चाहे आजादी के बाद का समय हो, और चाहे वर्तमान समय हो। दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे सत्ता के विरोधियों को सकारात्मक रूप से नहीं लिया जाता, और अक्सर उन्हें तरह-तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यद्यपि कोई भी विरोध मैं समझता हूँ कि साहित्यकार जो समाज के सामने पैदा करते हैं, वह तब तक स्वीकार नहीं किया जाता जनता के द्वारा, जब तक की उस विरोध में जनता को अपनी पीड़ा, अपनी सहमति और अपने विचारों की अभिव्यक्ति नजर नहीं आती। इस तरह हम यह भी कह सकते हैं कि किसी भी साहित्यकार का विरोध और प्रताड़ना, समाज का विरोध और समाज को प्रताड़ित करने जैसा ही है।
साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से वर्तमान समय की समस्याओं, वर्तमान समय की चुनौतियों, कमियों और नीतियों की दशा और दिशा के ऊपर अपने मानवीय चिंतन से अपने समाज की भलाई के लिए यह रिस्क उठाते हैं, और उठाते रहेंगे। सच्चा साहित्यकार कभी भी अपनी जिम्मेदारी, जागरूकता और समाज की भलाई से मुँह नहीं मोड़ता है। किसी भी रचना का मूल्यांकन करते समय पाठक के लिए भी यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वह रचना को निरपेक्ष रूप से पढ़ें, और तब निष्पक्ष होकर इस बात का मनन भी करें कि क्या इससे देश का कोई फायदा या नुकसान होता है। बहुधा देखने में आता है कि आजकल साहित्यकारों के भी दल बन चुके हैं, और पक्ष-विपक्ष के रूप में उनकी रचनायेँ एक -दूसरे का सामना करती हैं, या उनकी उत्पत्ति केवल और केवल इसी कारण से होती है कि उन्हें भी अपने-अपने पक्ष रखने होते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि यदि हम किसी पक्ष में रहना नहीं भी चाहते हैं, तब भी हमें उसके ऊपर विचार अवश्य करना चाहिए, और हो सकता है कि किन्हीं पूर्वाग्रहों के चलते अपनी एक बनी हुई सोच के कारण, शायद आज हम उस सच्चाई को न समझ पा रहे हों, न देख पा रहे हों।
आज हमारा देश कोरोना जैसी महामारी से दो-दो हाथ कर रहा है। कोरोना के अनेक दुष्परिणाम देश के सामने आए। हमारे देश की अर्थव्यवस्था नीचे की तरफ गई है, और दूसरी तरफ हम इसके दुष्प्रभावों को देखें तो हम पाते हैं कि हमारे देश में अनेक लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है, महंगाई में बढ़ोत्तरी हुई है । आज का साहित्यकार निश्चित तौर पर इन समस्याओं की तरफ अपने समाज का ध्यान आकर्षित करवाना चाहेगा।
हम इसे कोरा सत्ता का विरोध नहीं कह सकते, बल्कि यह समाज की समस्या है, इस पर साहित्यिक, राजनीतिक चिंतन भी जरूरी है, और समाज का चिंतन भी जरूरी है। क्योंकि यह हमारे जीवन से जुड़ा प्रश्न है। दूसरी एक बड़ी समस्या, जो हमारे देश के सामने आई है, वह समस्या है प्राकृतिक आपदाओं की। जब हम इस समस्या की तरफ देखते हैं, तो हम पाते हैं कि हमारे देश के अनेक राज्यों में भारी बारिश के कारण बाढ़ आई है। किसान की उपज का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। बाढ़ के कारण अनेकों मकान टूट गए हैं, लोग बेघरबार हुए हैं, और शासन की मदद लोगों तक बहुत- सी जगहों पर नहीं पहुंच पाई है। देश में बेरोजगारों द्वारा आत्महत्याओं का आंकड़ा बड़ी तेजी से बढ़ा है और किसानों की आत्महत्याओं का भी । बेरोजगारी ने अपराधों को भी बढ़ाया है । ऐसे में उन लोगों के विरोध को जाहिर करना साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी बनती है।
यह सत्ता का विरोध कोई नया नहीं है, और इसका कारण भी है कि कोई भी साहित्यकार पराई पीड़ा से अपने आप को बचा नहीं सकता। उस की रचनाओं का सृजन ही पीड़ा को शब्द देने के साथ शुरू होता है। किसी भी रचना का जन्म शायद गहरे अर्थों में अगर हम देखें तो मन की पीड़ा, आक्रोश और परिस्थितियों से उत्पन्न निराशा और विषाद के कारण ही होता है। अगर ऐसे में हम साहित्यकार की आवाज को दबा देते हैं तो निश्चित तौर पर, हम अपने नागरिकों की आवाज को दबा देते हैं, और यह खामोशी बहुत ही खतरनाक होती है। अक्सर देखने में आया है कि इसके बहुत ही भयानक परिणाम होते हैं। और देश के लिए इस तरह की खामोशी कभी भी अच्छे हालातों की सूचक नहीं होती, क्योंकि अभिव्यक्ति के कारण समाज के अंदर फैला हुआ विद्रोह जब बाहर निकलता है तब शासन भी समस्याओं के प्रति जागरूक होता है। ऐसे में कोई भी साहित्यकार अपने विरोधी स्वरों से सत्ता का विरोधी नहीं बल्कि हितचिंतक होता है, और वह सत्तापक्ष द्वारा किए जा रहे कार्यों के बारे में सोचने को मजबूर करता है, एक मौका उपलब्ध कराता है। इसलिए मेरा मानना है कि साहित्यकारों की चिंताओं के ऊपर राजनीतिक कार्यवाही करना, इस देश को और गहरी समस्याओं की तरफ धकेल देगा।
देश पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। देश की सेना पर सभी भरोसा करते हैं , लेकिन शासन द्वारा दुश्मन का नाम भी न लेना , जनता को बहुत अखरा है। राजनीति के कारण सेना की वेब साइट से चीन के अंदर घुसने की खबर को हटाने का भी विरोध हुआ । इस तरह देश की जनता को गुमराह करना ठीक नहीं है । इस समय देश की जनता का बड़ा हिस्सा अपने अस्तित्व को लेकर चिंता में है , फिर वह दिहाड़ी मजदूर हो, किसान हो, या प्राइवेट नौकरी में । सरकारी संस्थाओं का निजीकरण भी देश के सामने एक बड़ी समस्या है और देश की 85% बहुजन आबादी को ऐसा लगता है कि अब उनकी नौकरी, शिक्षा और खुशहाली के साथ सुरक्षा पर बड़ा आघात हुआ है । शेष 15 प्रतिशत गरीबों के लिए भी महंगी शिक्षा पाना एक टेढ़ी खीर होगी। शासन ने ऐसा किया है, और इसका विरोध भी होना निश्चित है , क्योंकि एक नागरिक के तौर पर सत्ता से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की अपेक्षा नहीं रखी जाएगी तो किस से रखी जाएगी ? यही नहीं बाकी आबादी को यह भी डर साता रहा है कि सत्ता पूँजीपतियों के हाथ नागरिकों की आजादी का सौदा कर रही है, देश की जनता को उनका गुलाम बना रही है, और कंपनीराज का पदार्पण हो रहा है देश में । सरकारी क्षेत्र में सरकारी सम्पत्तियों का लगातार बेचा जाना जनता की आशंकाओं को बढ़ा भी रहा है, और सरकार की कार्यक्षमता पर प्रश्न चिन्ह भी खड़ा कर रहा है। ऐसे में क्या जनता और साहित्यकारों का विरोध नाजायज है?
कोरोना के कारण देश में जनता की आवाज शासकीय नियमों के द्वारा बांधकर बहुत हद तक दबा दी गई है। किसी भी प्रकार का विरोध प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। ऐसे में सोशल मीडिया की और साहित्य की जरूरत दोनों ही बहुत बढ़ जाती हैं । लेकिन मैं यहाँ यह भी कहना चाहूंगा कि सोशल मीडिया के ऊपर एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी भी बनती है कि उसकी भाषा, उसके विचार संयमित भाषा में लिखे हों, उनके अंदर भड़काऊ, देश को हानि पहुंचाने को प्रेरित करती किसी भी बात का उल्लेख नहीं होना चाहिए। किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं होना चाहिए । हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन हमारा देश अभी भी उतना शिक्षित नहीं है, जितना कि स्वस्थ लोकतंत्र के विकास के लिए होना चाहिए । यही कारण है कि हमारे देश की संसद में दागी लोग भी आसानी से पहुंच जाते हैं। इन पर लगाम लगाने के कई कानून संसद ने ही पास करने हैं, लेकिन अपने फायदे के कारण जनता के फायदे को दरकिनार किया गया है। अभी भी देश में महिलाओं के आरक्षण को लेकर, लोकपाल की नियुक्ति को लेकर, संसद में अपराधियों के प्रवेश को रोकने के लिए लाए गए बिल, और इसी तरह के अनेक बहुत जरूरी मुद्दे, अभी भी लटके हुए हैं।
निश्चित तौर पर जो साहित्यकार अपने देश की और अपने देश की जनता की चिंता करते हैं, उसके हितैषी हैं, वे लोग इन मुद्दों पर सत्ता को घेरने का प्रयास करते रहते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे सत्ता के विरोधी हैं, बल्कि वे सत्ता को याद कराते हैं कि सत्ता अपने मूल उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए काम करें, जिसमें वो विफल साबित हो रही है।
यदि साहित्यकारों पर इस तरह के बंधन लाद दिए जाएंगे, कानून की बाढ़ लगाकर, या उन्हें सत्ता का विरोधी बताकर, तो यह साहित्यकार का ही अपमान नहीं है, बल्कि उसके साथ- साथ इस देश के नागरिकों के भविष्य के साथ, और इस देश के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है। सत्ताएँ आती हैं, जाती हैं, यह कोई नई और बड़ी बात नहीं है। राजनीति में कोई भी स्थायी नहीं होता, परिवर्तन के दौर समय-समय पर आते रहते हैं, इसलिए देश के हित को ध्यान में रखते हुए, मैं समझता हूँ की साहित्यकारों पर अनावश्यक बंधन न थोपे जाएं। यह उन्हें अपनी देशभक्ति दिखाने, और जताने से रोकने का काम है और यह कभी भी लोकतन्त्र की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकता।
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आज की समस्या यह नहीं है कि साहित्यकार केवल और केवल साहित्य सृजन में ही रमा हुआ है। आज एक बड़ी समस्या यह भी है कि साहित्यकार या अन्य कोई भी समाज का प्राणी राजनीति से बचने में अपने आप को अक्षम पाता है । और इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि राजनीति आज के नागरिक के जीवन के हर पहलू से जुड़ी हुई है। बतौर एक साहित्यकार कोई भी व्यक्ति , वर्तमान समाज और उससे जुड़ी हुई समस्याओं से मुँह नहीं मोड़ सकता।
बहुत से लोगों को ऐसा लग सकता है कि साहित्यकार भी अब राजनीति करने लगे हैं। वस्तुतः समाज से जुड़ी हुई समस्याओं को लेकर जब भी रचनाओं का सृजन होता है, उसमें वर्तमान समय के समाज की पीड़ा भी समाहित रहती हैं । यह साहित्यकार की अपनी जागरूकता पर भी निर्भर करता है कि वह सामाजिक और राजनीतिक रूप से कितना जाग्रत है। एक साहित्यकार से यह अपेक्षा सदैव ही की जाती है कि साहित्यकार अपने समय की बुराइयों को अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकट करेगा, और समाज को जागरूक करेगा। लेकिन दुर्भाग्य से बहुधा ऐसा समझ लिया जाता है कि साहित्यकार केवल और केवल सत्ता के विरोध में लिख रहा है।
साहित्यकार स्वयं भी एक नागरिक होता है, इसलिए साहित्यकार अपने समय और सोच के अनुसार सत्ता का विरोधी करता है। दरअसल साहित्यकार का यह कर्तव्य भी है कि वह माजूदा शासन को संभाले। मुझे याद आता है कि एक बार मंच से उतरते समय पंडित जवाहरलाल नेहरू का संतुलन बिगड़ गया था और रामधारी सिंह दिनकर जी ने उन्हें संभाला था। उस समय रामधारी सिंह दिनकर जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि जब- जब राजनीति लड़खड़ाएगी,समय के साहित्यकार उसे इसी प्रकार संभाल लेंगे।
वर्तमान दौर में बहुत से लोग इस काम को कर रहे हैं । वे अपनी- अपनी समझ के और सामर्थ्य के हिसाब से सत्ता का और सत्ता की गलत नीतियों का प्रतिकार भी करते हैं, और अच्छी नीतियों का स्वागत भी करते हैं। हर दल की अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षायेँ और मजबूरियां हो सकती हैं, लेकिन एक साहित्यकार को सदैव निरपेक्ष रूप से और सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए। सत्ता का दमन हमेशा अपनी मौजूदगी का एहसास करवाता रहा है, फिर वह चाहे ब्रिटिश काल हो, चाहे आजादी के बाद का समय हो, और चाहे वर्तमान समय हो। दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे सत्ता के विरोधियों को सकारात्मक रूप से नहीं लिया जाता, और अक्सर उन्हें तरह-तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यद्यपि कोई भी विरोध मैं समझता हूँ कि साहित्यकार जो समाज के सामने पैदा करते हैं, वह तब तक स्वीकार नहीं किया जाता जनता के द्वारा, जब तक की उस विरोध में जनता को अपनी पीड़ा, अपनी सहमति और अपने विचारों की अभिव्यक्ति नजर नहीं आती। इस तरह हम यह भी कह सकते हैं कि किसी भी साहित्यकार का विरोध और प्रताड़ना, समाज का विरोध और समाज को प्रताड़ित करने जैसा ही है।
साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से वर्तमान समय की समस्याओं, वर्तमान समय की चुनौतियों, कमियों और नीतियों की दशा और दिशा के ऊपर अपने मानवीय चिंतन से अपने समाज की भलाई के लिए यह रिस्क उठाते हैं, और उठाते रहेंगे। सच्चा साहित्यकार कभी भी अपनी जिम्मेदारी, जागरूकता और समाज की भलाई से मुँह नहीं मोड़ता है। किसी भी रचना का मूल्यांकन करते समय पाठक के लिए भी यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वह रचना को निरपेक्ष रूप से पढ़ें, और तब निष्पक्ष होकर इस बात का मनन भी करें कि क्या इससे देश का कोई फायदा या नुकसान होता है। बहुधा देखने में आता है कि आजकल साहित्यकारों के भी दल बन चुके हैं, और पक्ष-विपक्ष के रूप में उनकी रचनायेँ एक -दूसरे का सामना करती हैं, या उनकी उत्पत्ति केवल और केवल इसी कारण से होती है कि उन्हें भी अपने-अपने पक्ष रखने होते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि यदि हम किसी पक्ष में रहना नहीं भी चाहते हैं, तब भी हमें उसके ऊपर विचार अवश्य करना चाहिए, और हो सकता है कि किन्हीं पूर्वाग्रहों के चलते अपनी एक बनी हुई सोच के कारण, शायद आज हम उस सच्चाई को न समझ पा रहे हों, न देख पा रहे हों।
आज हमारा देश कोरोना जैसी महामारी से दो-दो हाथ कर रहा है। कोरोना के अनेक दुष्परिणाम देश के सामने आए। हमारे देश की अर्थव्यवस्था नीचे की तरफ गई है, और दूसरी तरफ हम इसके दुष्प्रभावों को देखें तो हम पाते हैं कि हमारे देश में अनेक लोगों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है, महंगाई में बढ़ोत्तरी हुई है । आज का साहित्यकार निश्चित तौर पर इन समस्याओं की तरफ अपने समाज का ध्यान आकर्षित करवाना चाहेगा।
हम इसे कोरा सत्ता का विरोध नहीं कह सकते, बल्कि यह समाज की समस्या है, इस पर साहित्यिक, राजनीतिक चिंतन भी जरूरी है, और समाज का चिंतन भी जरूरी है। क्योंकि यह हमारे जीवन से जुड़ा प्रश्न है। दूसरी एक बड़ी समस्या, जो हमारे देश के सामने आई है, वह समस्या है प्राकृतिक आपदाओं की। जब हम इस समस्या की तरफ देखते हैं, तो हम पाते हैं कि हमारे देश के अनेक राज्यों में भारी बारिश के कारण बाढ़ आई है। किसान की उपज का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। बाढ़ के कारण अनेकों मकान टूट गए हैं, लोग बेघरबार हुए हैं, और शासन की मदद लोगों तक बहुत- सी जगहों पर नहीं पहुंच पाई है। देश में बेरोजगारों द्वारा आत्महत्याओं का आंकड़ा बड़ी तेजी से बढ़ा है और किसानों की आत्महत्याओं का भी । बेरोजगारी ने अपराधों को भी बढ़ाया है । ऐसे में उन लोगों के विरोध को जाहिर करना साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी बनती है।
यह सत्ता का विरोध कोई नया नहीं है, और इसका कारण भी है कि कोई भी साहित्यकार पराई पीड़ा से अपने आप को बचा नहीं सकता। उस की रचनाओं का सृजन ही पीड़ा को शब्द देने के साथ शुरू होता है। किसी भी रचना का जन्म शायद गहरे अर्थों में अगर हम देखें तो मन की पीड़ा, आक्रोश और परिस्थितियों से उत्पन्न निराशा और विषाद के कारण ही होता है। अगर ऐसे में हम साहित्यकार की आवाज को दबा देते हैं तो निश्चित तौर पर, हम अपने नागरिकों की आवाज को दबा देते हैं, और यह खामोशी बहुत ही खतरनाक होती है। अक्सर देखने में आया है कि इसके बहुत ही भयानक परिणाम होते हैं। और देश के लिए इस तरह की खामोशी कभी भी अच्छे हालातों की सूचक नहीं होती, क्योंकि अभिव्यक्ति के कारण समाज के अंदर फैला हुआ विद्रोह जब बाहर निकलता है तब शासन भी समस्याओं के प्रति जागरूक होता है। ऐसे में कोई भी साहित्यकार अपने विरोधी स्वरों से सत्ता का विरोधी नहीं बल्कि हितचिंतक होता है, और वह सत्तापक्ष द्वारा किए जा रहे कार्यों के बारे में सोचने को मजबूर करता है, एक मौका उपलब्ध कराता है। इसलिए मेरा मानना है कि साहित्यकारों की चिंताओं के ऊपर राजनीतिक कार्यवाही करना, इस देश को और गहरी समस्याओं की तरफ धकेल देगा।
देश पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। देश की सेना पर सभी भरोसा करते हैं , लेकिन शासन द्वारा दुश्मन का नाम भी न लेना , जनता को बहुत अखरा है। राजनीति के कारण सेना की वेब साइट से चीन के अंदर घुसने की खबर को हटाने का भी विरोध हुआ । इस तरह देश की जनता को गुमराह करना ठीक नहीं है । इस समय देश की जनता का बड़ा हिस्सा अपने अस्तित्व को लेकर चिंता में है , फिर वह दिहाड़ी मजदूर हो, किसान हो, या प्राइवेट नौकरी में । सरकारी संस्थाओं का निजीकरण भी देश के सामने एक बड़ी समस्या है और देश की 85% बहुजन आबादी को ऐसा लगता है कि अब उनकी नौकरी, शिक्षा और खुशहाली के साथ सुरक्षा पर बड़ा आघात हुआ है । शेष 15 प्रतिशत गरीबों के लिए भी महंगी शिक्षा पाना एक टेढ़ी खीर होगी। शासन ने ऐसा किया है, और इसका विरोध भी होना निश्चित है , क्योंकि एक नागरिक के तौर पर सत्ता से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की अपेक्षा नहीं रखी जाएगी तो किस से रखी जाएगी ? यही नहीं बाकी आबादी को यह भी डर साता रहा है कि सत्ता पूँजीपतियों के हाथ नागरिकों की आजादी का सौदा कर रही है, देश की जनता को उनका गुलाम बना रही है, और कंपनीराज का पदार्पण हो रहा है देश में । सरकारी क्षेत्र में सरकारी सम्पत्तियों का लगातार बेचा जाना जनता की आशंकाओं को बढ़ा भी रहा है, और सरकार की कार्यक्षमता पर प्रश्न चिन्ह भी खड़ा कर रहा है। ऐसे में क्या जनता और साहित्यकारों का विरोध नाजायज है?
कोरोना के कारण देश में जनता की आवाज शासकीय नियमों के द्वारा बांधकर बहुत हद तक दबा दी गई है। किसी भी प्रकार का विरोध प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। ऐसे में सोशल मीडिया की और साहित्य की जरूरत दोनों ही बहुत बढ़ जाती हैं । लेकिन मैं यहाँ यह भी कहना चाहूंगा कि सोशल मीडिया के ऊपर एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी भी बनती है कि उसकी भाषा, उसके विचार संयमित भाषा में लिखे हों, उनके अंदर भड़काऊ, देश को हानि पहुंचाने को प्रेरित करती किसी भी बात का उल्लेख नहीं होना चाहिए। किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं होना चाहिए । हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन हमारा देश अभी भी उतना शिक्षित नहीं है, जितना कि स्वस्थ लोकतंत्र के विकास के लिए होना चाहिए । यही कारण है कि हमारे देश की संसद में दागी लोग भी आसानी से पहुंच जाते हैं। इन पर लगाम लगाने के कई कानून संसद ने ही पास करने हैं, लेकिन अपने फायदे के कारण जनता के फायदे को दरकिनार किया गया है। अभी भी देश में महिलाओं के आरक्षण को लेकर, लोकपाल की नियुक्ति को लेकर, संसद में अपराधियों के प्रवेश को रोकने के लिए लाए गए बिल, और इसी तरह के अनेक बहुत जरूरी मुद्दे, अभी भी लटके हुए हैं।
निश्चित तौर पर जो साहित्यकार अपने देश की और अपने देश की जनता की चिंता करते हैं, उसके हितैषी हैं, वे लोग इन मुद्दों पर सत्ता को घेरने का प्रयास करते रहते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे सत्ता के विरोधी हैं, बल्कि वे सत्ता को याद कराते हैं कि सत्ता अपने मूल उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए काम करें, जिसमें वो विफल साबित हो रही है।
यदि साहित्यकारों पर इस तरह के बंधन लाद दिए जाएंगे, कानून की बाढ़ लगाकर, या उन्हें सत्ता का विरोधी बताकर, तो यह साहित्यकार का ही अपमान नहीं है, बल्कि उसके साथ- साथ इस देश के नागरिकों के भविष्य के साथ, और इस देश के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है। सत्ताएँ आती हैं, जाती हैं, यह कोई नई और बड़ी बात नहीं है। राजनीति में कोई भी स्थायी नहीं होता, परिवर्तन के दौर समय-समय पर आते रहते हैं, इसलिए देश के हित को ध्यान में रखते हुए, मैं समझता हूँ की साहित्यकारों पर अनावश्यक बंधन न थोपे जाएं। यह उन्हें अपनी देशभक्ति दिखाने, और जताने से रोकने का काम है और यह कभी भी लोकतन्त्र की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकता।


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