सदैव प्रसांगिक गणपति .... नमन आपको बारम्बार.....
लेखक
आज गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर... हम गणपति के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करते हैं... जिसकी स्थापना तमाम विघ्न, बाधाओं, संकटों को दूर कर मंगलकारी मानी जाती है.....।
गणेश मुख के रूप में... हाथी का मस्तक नजर आता है... और इसकी कथा भी याद है... लेकिन पृथ्वी के प्राणियों में सबसे तेज स्मरण शक्ति भी हाथी की मानी जाती है... संभवतः इसी कारण... वे बुद्धि और विवेक के देवता कहे जाते हैं....। उनकी जिस आकृति को हमने स्वीकार किया है.... वो गणपति के रूप में... एक मुखिया हैं... जो अपने आधीन गणों के लालन पालन... शिक्षा दीक्षा.... भरण पोषण इत्यादि की जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं.....।
याद कीजिये उनकी छोटी छोटी आँखें... जो किसी भी प्रकरण का सूक्ष्मता से अध्ययन करने की प्रेरणा देती हैं..... कि जब आप मुखिया के रूप में हों तो चहुँ ओर आपकी दृष्टि पैनी बनी रहे....। ताकि सभी गणों के साथ समान रूप से न्याय हो सके....।
मुँह बड़ा होने के बाद भी जिव्हा छोटी है... जो वाणी और स्वाद दोनों के काम आती है.....। गणों का पति बनने के बाद... वाणी संयमित रहे... और स्वाद लोलुपता से दूर....।
लंबी नाक..... किसी भी संभव खतरे को दूर से सूंघ लेने की शक्ति गणेश की तरह हमारे मुखिया में भी होना जरूरी है.. तभी तो गणपति है.....।
बड़े कान..... सभी की बातों को गौर से सुन लेने की क्षमता अगर मुखिया के पास नहीं है... तो कुछ गणों के साथ उसका निर्णय अन्यायकारी हो सकता है.....।
बड़ा पेट.... सभी के द्वारा कही गई... बातों को पचा लेने की योग्यता भी मुखिया के पास होना आवश्यक है.... । इधर की बात उधर होने से विवाद... बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है।
एक हाथ में अंकुश व पाश..... गणों द्वारा यदा कदा की जाने वाली... अवांछित गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए अंकुश लग जाए.. ऐसी शक्ति भी होना चाहिए और सभी गण मुखिया द्वारा स्थापित नियमों के पाश में बंधे रहे। यह भी एकता के लिए आवश्यक है... उल्लंघन होने पर दंडित करने के लिए... अंकुश है ही.....। साथ ही शत्रुओं पर विजय के काम...भी अंकुश और परशु दोनों आयें....।
एक हाथ में मोदक थाल..... गणपति के उस गुण को दर्शाता है कि... परिवार, समाज, राज्य, संस्था आदि कहीं का भी मुखिया हो... उसको अपने अधीन गणों का भरण पोषण यथा समय.... करते रहना होगा...।
एक हाथ में पुस्तक..... यह तय करती है कि मुखिया की नीतियां... गणों की शिक्षा दीक्षा के लिए... उचित वातावरण का न केवल निर्माण करें... बल्कि यथा योग्य सुविधाएं भी गणों को उपलब्ध कराई जाएं....।
आशीर्वाद की मुद्रा..... वाला हाथ यह बताता है... कि सभी गणों के कल्याण की भावना से... संचालन किया जाए....।
एक पैर पर दूसरा पैर..... गणपति की उस स्थिति का वर्णन करता है... कि मुखिया हमेशा अर्द्ध विश्राम की स्थिति में होता है... कभी , कहाँ , किस के बुलावे पर अथवा... काम से जाना हो तो... गणपति हमेशा तत्पर और तैयार रहे...।
गणपति की इन विशेषताओं से युक्त व्यक्ति ही.. परिवार, समाज, संस्था, राज्य, आदि का मुखिया हो... तभी संकट टलते हैं..... विघ्न दूर होते हैं.... बाधाओं और समस्याओं पर नियंत्रण होता है....। चहुँ ओर मंगल छा जाता है.... इसीलिए गणपति प्रथम पूज्य हैं....।
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आप एमपी मीडिया पाइंट के संपादन को जिस खूबी के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं_वह किसी परिचय का मोहताज नहीं है। बल्कि आने वाली पीड़ी के लिए मील का पत्थर भी।
राजेश शर्मा
लेखक
शैलेश तिवारी
एक शताब्दी.... लंबा समय होता है... किसी सार्वजनिक आयोजन का.... लेकिन एक सौ ग्यारह साल बाद..... यह मौका आया है जब सार्वजनिक उत्सव.... नितांत व्यक्तिगत आयोजन के रूप में ही मनाया जाएगा...। बात दस दिनी गणेश उत्सव के आयोजन की है....। जिसे सन् 1909 में महाराष्ट्र से लोकमान्य तिलक ने.... आज़ादी की लड़ाई के मंच के रूप में शुरू करवाया था..... तब देश में स्वतंत्रता की लहर जाग्रत करने का दिवा स्वप्न उनकी आँखों में तैर रहा था..... अब 2020 में कोरोना महामारी का ग्रहण लगा... इस आयोजन पर...। ... वह भी उस समय जब लोकतांत्रिक देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर... सत्ता का नियंत्रण हो चला है...स्वतंत्र देश की स्वाधीन संस्थाओ के मायने बदल रहे हैं...। सो मोटो जैसे शब्द... व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि का साधन बन रहे हों...., सत्ता के इशारों पर नाचती इन स्वाधीन संस्थाओं में नियम की बात करने वाले... समय से पहले इस्तीफा देकर... कुर्सी छोड़ने पर मजबूर किए जा रहे हों.... गणों की कराह को सुनने के लिए... उसके पति के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती हो... तो गणपति का जिक्र लाज़िमी हो जाता है... जिस गणपति को भारतीय संस्कृति ने प्रथम पूज्य का दर्जा दिया हो... तो वह गणपति केवल भगवान गणेश नही है... वरन गणपति का पद धारण करने वाले वे तमाम लोग हैं... जो कहीं न कहीं.. किसी न किसी रूप में मुखिया का दायित्व संभाल रहे हैं....। उन्हें हमने आज के गणपति का दर्जा दिया है... लेकिन वह गणपति के कर्तव्यों की पूर्ति में... गणेश के गुणों से दूर.. अपनी ढपली... अपनी राग बजाने में व्यस्त हैं... अपने गणों की परेशानियों से बेफिक्र होकर...।आज गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर... हम गणपति के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करते हैं... जिसकी स्थापना तमाम विघ्न, बाधाओं, संकटों को दूर कर मंगलकारी मानी जाती है.....।
गणेश मुख के रूप में... हाथी का मस्तक नजर आता है... और इसकी कथा भी याद है... लेकिन पृथ्वी के प्राणियों में सबसे तेज स्मरण शक्ति भी हाथी की मानी जाती है... संभवतः इसी कारण... वे बुद्धि और विवेक के देवता कहे जाते हैं....। उनकी जिस आकृति को हमने स्वीकार किया है.... वो गणपति के रूप में... एक मुखिया हैं... जो अपने आधीन गणों के लालन पालन... शिक्षा दीक्षा.... भरण पोषण इत्यादि की जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं.....।
याद कीजिये उनकी छोटी छोटी आँखें... जो किसी भी प्रकरण का सूक्ष्मता से अध्ययन करने की प्रेरणा देती हैं..... कि जब आप मुखिया के रूप में हों तो चहुँ ओर आपकी दृष्टि पैनी बनी रहे....। ताकि सभी गणों के साथ समान रूप से न्याय हो सके....।
मुँह बड़ा होने के बाद भी जिव्हा छोटी है... जो वाणी और स्वाद दोनों के काम आती है.....। गणों का पति बनने के बाद... वाणी संयमित रहे... और स्वाद लोलुपता से दूर....।
लंबी नाक..... किसी भी संभव खतरे को दूर से सूंघ लेने की शक्ति गणेश की तरह हमारे मुखिया में भी होना जरूरी है.. तभी तो गणपति है.....।
बड़े कान..... सभी की बातों को गौर से सुन लेने की क्षमता अगर मुखिया के पास नहीं है... तो कुछ गणों के साथ उसका निर्णय अन्यायकारी हो सकता है.....।
बड़ा पेट.... सभी के द्वारा कही गई... बातों को पचा लेने की योग्यता भी मुखिया के पास होना आवश्यक है.... । इधर की बात उधर होने से विवाद... बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है।
एक हाथ में अंकुश व पाश..... गणों द्वारा यदा कदा की जाने वाली... अवांछित गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए अंकुश लग जाए.. ऐसी शक्ति भी होना चाहिए और सभी गण मुखिया द्वारा स्थापित नियमों के पाश में बंधे रहे। यह भी एकता के लिए आवश्यक है... उल्लंघन होने पर दंडित करने के लिए... अंकुश है ही.....। साथ ही शत्रुओं पर विजय के काम...भी अंकुश और परशु दोनों आयें....।
एक हाथ में मोदक थाल..... गणपति के उस गुण को दर्शाता है कि... परिवार, समाज, राज्य, संस्था आदि कहीं का भी मुखिया हो... उसको अपने अधीन गणों का भरण पोषण यथा समय.... करते रहना होगा...।
एक हाथ में पुस्तक..... यह तय करती है कि मुखिया की नीतियां... गणों की शिक्षा दीक्षा के लिए... उचित वातावरण का न केवल निर्माण करें... बल्कि यथा योग्य सुविधाएं भी गणों को उपलब्ध कराई जाएं....।
आशीर्वाद की मुद्रा..... वाला हाथ यह बताता है... कि सभी गणों के कल्याण की भावना से... संचालन किया जाए....।
एक पैर पर दूसरा पैर..... गणपति की उस स्थिति का वर्णन करता है... कि मुखिया हमेशा अर्द्ध विश्राम की स्थिति में होता है... कभी , कहाँ , किस के बुलावे पर अथवा... काम से जाना हो तो... गणपति हमेशा तत्पर और तैयार रहे...।
गणपति की इन विशेषताओं से युक्त व्यक्ति ही.. परिवार, समाज, संस्था, राज्य, आदि का मुखिया हो... तभी संकट टलते हैं..... विघ्न दूर होते हैं.... बाधाओं और समस्याओं पर नियंत्रण होता है....। चहुँ ओर मंगल छा जाता है.... इसीलिए गणपति प्रथम पूज्य हैं....।
शैलेश तिवारी, सीहोर(मध्यप्रदेश)
----------परिचय
लेखक---समसामयिक , प्रसांगिक, आध्यात्मिक विषयों के ज्ञाता हैं। आप पत्रकारिता जगत के भी सशक्त हस्ताक्षर हैं। अनेक पुस्तकें आपकी प्रकाशित हो चुकी हैं । और बता दें कि सादा-जीवन उच्च विचार आपकी विशेष पहचान है।...आप एमपी मीडिया पाइंट के संपादन को जिस खूबी के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं_वह किसी परिचय का मोहताज नहीं है। बल्कि आने वाली पीड़ी के लिए मील का पत्थर भी।
राजेश शर्मा


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