लेखिका
हाँ! उदास हूँ ,ये सोच कर कि
एक नदी जो बहती थी
अविरल सी
वो बेचारी अब सूख रही
सिकुड़ रही
लालची सभ्यता की तरक्की की वेदी पर
वक़्त से पहले ही भेंट चढ़ रही....
हाँ! उदास हूँ,ये सोच कर कि
एक पवित्र धारा बहा कर लाया करती थी
लाखों किसानों के खेतों के लिए
लाखों खुशियाँ अपने साथ,देने को अनाज
पर अब वो सिकुड़ कर,शांत हो रही
अपने बहाव की रफ़्तार के साथ
हाँ! उदास हूँ,सोच कर कि
सरसराहट पवन की,विशालता गगन सी
जो चंचल थी,थी चपला वो
अपने जीवन समर्पण के साथ
वो अपना अस्तित्व खोने की कागर पे है ,
जो ले चुकी है गंदे नाले का रूप
इंसान के बढ़ते क्रूरता के साए में
हाँ! उदास हूँ....
भीगी पलकों के साथ
जो वन-वन बहती थी,देती थी जीवन-दान
अब खो बैठी अपनी निर्मल गूंज को
कटते पेड़ों और होते अवैध निर्माण के शोर में
उसके सुकड़ते बजूद से
पूरी प्रकृति हिल चुकी,
जीवन की कड़ियों बिखरी चुकी
जीवन कसक के साथ
खालीपन पसर चुका
अब पहले सा शीतल प्यार नहीं,
उस बिन जीवन का सार नहीं है
वंचित जीवन बना उसकी धार बिना
एक नदी जो बहती थी
अविरल सी
अब वो बेचारी नदी सूख रही ||
इस मानवीय जीवन में कि
कंक्रीट के जंगल में
कंक्रीट की सड़कों की भरमार तो है
पर मन के खंड
प्राकृतिक के प्रति संवेदनाओं से अब खाली हो चुके हैं ||
कमरे की खुली खिड़की
और दिल के बंद दरवाजे,
कर्कश आवाज़ों का मेला
सब मिल कर भी
हाथों से फिसलते वक़्त को
थाम नहीं पा रहे
काली और खाली होती पृथ्वी या
गूँजती पृथ्वी या खिलखलाते पंछी
अपनी सभ्यता की पीड़ा या
प्राचीन मान्यताओं की टूटन,
उम्र की बोझिल हवा
और दो पीढ़ियों में सोच के अंतर का अंतर भी
दोनों की अपनी ही पहचान खो रहे हैं
फिर भी,
वक़्त की आँधी के आगे
एक फीकी सी मुस्कुराहट
जड़ों और शाखाओं का विद्रोह
विघटन की प्रक्रिया
हमारी ज़िंदगियों पर प्रहार ही तो है
कहीं ये हमारी सभ्यता के अंत का
संकेत तो नहीं ?
बेचारी नदी
हाँ! उदास हूँ ,ये सोच कर कि
एक नदी जो बहती थी
अविरल सी
वो बेचारी अब सूख रही
सिकुड़ रही
लालची सभ्यता की तरक्की की वेदी पर
वक़्त से पहले ही भेंट चढ़ रही....
हाँ! उदास हूँ,ये सोच कर कि
एक पवित्र धारा बहा कर लाया करती थी
लाखों किसानों के खेतों के लिए
लाखों खुशियाँ अपने साथ,देने को अनाज
पर अब वो सिकुड़ कर,शांत हो रही
अपने बहाव की रफ़्तार के साथ
हाँ! उदास हूँ,सोच कर कि
सरसराहट पवन की,विशालता गगन सी
जो चंचल थी,थी चपला वो
अपने जीवन समर्पण के साथ
वो अपना अस्तित्व खोने की कागर पे है ,
जो ले चुकी है गंदे नाले का रूप
इंसान के बढ़ते क्रूरता के साए में
हाँ! उदास हूँ....
भीगी पलकों के साथ
जो वन-वन बहती थी,देती थी जीवन-दान
अब खो बैठी अपनी निर्मल गूंज को
कटते पेड़ों और होते अवैध निर्माण के शोर में
उसके सुकड़ते बजूद से
पूरी प्रकृति हिल चुकी,
जीवन की कड़ियों बिखरी चुकी
जीवन कसक के साथ
खालीपन पसर चुका
अब पहले सा शीतल प्यार नहीं,
उस बिन जीवन का सार नहीं है
वंचित जीवन बना उसकी धार बिना
एक नदी जो बहती थी
अविरल सी
अब वो बेचारी नदी सूख रही ||
सभ्यता का अंत
इस मानवीय जीवन में कि
कंक्रीट के जंगल में
कंक्रीट की सड़कों की भरमार तो है
पर मन के खंड
प्राकृतिक के प्रति संवेदनाओं से अब खाली हो चुके हैं ||
कमरे की खुली खिड़की
और दिल के बंद दरवाजे,
कर्कश आवाज़ों का मेला
सब मिल कर भी
हाथों से फिसलते वक़्त को
थाम नहीं पा रहे
काली और खाली होती पृथ्वी या
गूँजती पृथ्वी या खिलखलाते पंछी
अपनी सभ्यता की पीड़ा या
प्राचीन मान्यताओं की टूटन,
उम्र की बोझिल हवा
और दो पीढ़ियों में सोच के अंतर का अंतर भी
दोनों की अपनी ही पहचान खो रहे हैं
फिर भी,
वक़्त की आँधी के आगे
एक फीकी सी मुस्कुराहट
जड़ों और शाखाओं का विद्रोह
विघटन की प्रक्रिया
हमारी ज़िंदगियों पर प्रहार ही तो है
कहीं ये हमारी सभ्यता के अंत का
संकेत तो नहीं ?


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