लेखिका

संतुलन...(लघुकथा) 


                "किस सोच में डूब गये? ऐसा स्वर्णिम अवसर फिर दुबारा मिले न मिले?" मस्तिष्क उससे प्रश्न कर बैठा.
             "पर जिनकी देह के साथ ऐसा अमानवीय कृत्य करोगे! उनकी नज़रों का सामना कर सकोगे क्या कभी? माफ़ कर पाओगे स्वयं को?" हृदय ने भी उसे झकझोर कर पूछा.
            "तो क्या फिर जीवन भर ऐसे ही एक साधारण से डाक्टर की ज़िन्दगी जीना चाहते हो! अरे, समझते क्यों नहीं! दुआओं से पेट नहीं भरता, और सिर्फ़ तनख़्वाह में ऐशोआराम की ज़िन्दगी नहीं दे सकोगे अपने परिवार को." मस्तिष्क ने समझाने की कोशिश की.
           "किन्तु अंग व्यापार जैसा कुकृत्य करके, यदि तुम अथाह दौलत के ढेर पर बैठ भी गये, तो उसके नीचे दबा हुआ तुम्हारा मानव हृदय स्पंदन कर पायेगा क्या?" हृदय ने थाह लेने की कोशिश की.
           "लेकिन तुम्हारे कुशाग्र मस्तिष्क के कारण ही तुम्हें ये डील आफर की गई है. तुम नहीं करोगे, तो कोई और करेगा. सोच लो..., फैसला तुम्हारे हाथ है." मस्तिष्क ने पुनः प्रयास किया.
           "हाँ, हाँ जानता हूँ, यदि मैं तुम्हारे जैसे कुशाग्र मस्तिष्क का स्वामी हूँ, तो एक विशाल हृदय पर भी आधिपत्य है मेरा. और इसलिये, तुम दोनों पर ही संतुलन बनाकर विवेक से काम लेना होगा मुझे."
           और उसने दृढ़निश्चयी होकर, मानव अंगों की तस्करी करने वाले गिरोह का हिस्सा बनने के बजाय उसे पकड़वाने का फैसला सुना दिया.

  रीता "अदा"

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 परिचय

रीता कुमार  "अदा" देश की राजधानी दिल्ली की रहने वाली हैं। शिक्षा निदेशालय (दिल्ली) के अंतर्गत वरिष्ठ कन्या विद्यालय में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। 
साहित्य में रुचि ने आपको विभिन्न काव्य विधाओं में लिखने के लिए प्रेरित किया तो आपकी लेखनी से लघुकथा, ग़ज़ल, गीत, छंदमुक्त सृजन भी होता रहा। 
 विभिन्न अख़बार, पत्रिकाओं  में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं तथा सांझा संग्रह में रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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 समीक्षा 

संतुलन... उस लघु कथा का नाम है.. जो अक्सर आदमी के दिल और दिमाग में चलने वाले द्वंद को विवेक से संतुलित करने की सीख देती है। दूसरा उस घृणित व्यवसाय का पर्दाफ़ाश भी करती है, जो मानवीय संवेदनाओं की कब्रगाह भी है। जहाँ बात संवेदनाओं की हो वहाँ दिल की सुनी जाए और जहाँ बात तर्क वितर्क की हो वहाँ दिमाग का उपयोग किया जाए। लेकिन द्वंद की स्थिति में संतुलन विवेक से किया जाए। तभी दूर हो पाएंगी सामाजिक विसंगतियां...। कहानी के दो पात्र व्यक्ति के मनोभाव हैं जिनके माध्यम से गागर में सागर भरते हुए लेखिका ने प्रभावी ढंग से कहानी के मर्म को पाठकों तक पहुंचाया है। बहुत बहुत बधाई... रीता कुमार अदा जी....। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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