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पोस्ट बॉक्स नं. 5912
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बहुत सूना लग रहा है अनु को आज। पिछला सप्ताह बेटी शुभ्रा के साथ गुलज़ार रहा शायद इसलिए अकेलापन कटोच रहा है। लेकिन अपने घर-गृहस्थी के साथ बेटियां कब तक साथ रहें।यूँ तो आदत है अकेले रहने की। तीन साल की थी शुभ्रा जब अजय जी नहीं रहे थे। उसके बाद उसकी ही जिम्मेदारियों से फुर्सत नहीं मिली और उम्र का 44वां साल आ गया पता नहीं चला।
उसके जाने के बाद अब घर सूना लगता है और कभी-कभी तन्हाई बहुत रुलाती है।
फोन की घंटी से तंद्रा भंग हुई। शुभ्रा ही थी।
माँ! एक जरूरी बात बतानी थी। ड्रेसिंग टेबल के ड्रावर में एक चाबी रखी है जिसके टैग पर
5912 लिखा है। दरअसल यह आपका पोस्ट बॉक्स नम्बर है जिसे मैंने कुछ प्रतिष्ठित अखबारों में एक विज्ञापन के जवाब के लिए किराये पर लिया है।
विज्ञापन में लिखा है, ''आर्थिक रूप से सम्पन्न 44 वर्षीय विधवा को हमउम्र साथी की तलाश है। कोई जिम्मेदारी नहीं, जाति बंधन नहीं।"
हे भगवान! अब यह कौन सी मुसीबत में डाल गई बेटी... बचपन से शरारती है मगर इस तरह की शैतानी.... गुस्सा भी आ रहा है और हँसी भी। दुनिया की पहली बेटी होगी जो माँ के लिए रिश्ता तलाश रही है। पगली कहीं की।
कॉल बैक किया। शुभ्रा बेटा यह कैसा बचपना है। लोग क्या कहेंगे और सोचेंगे..... भला यह उम्र है शादी-ब्याह की।
क्यों माँ, वो लोग तब क्या सोचते हैं जब एक तन्हा औरत माईग्रेन से छटपटाती है या बीपी ऊपर-नीचे होने पर बिस्तर से उठ नहीं पाती। अब 50+ होते ही यह समस्याएं और बढ़ेंगी और मैं कब-कब आ सकूँगी। ऐसे में यह रिश्ता शादी नहीं सहारा है दो जरूरतमंद लोगों के लिए।
मैंने व शशांक ने काफी सोच विचार कर यह निर्णय लिया है।
अब आप उस पोस्ट बॉक्स में आये जवाब देखना और जो सबसे उपयुक्त लगे उस रिश्ते पर विचार करना।
फोन से बात करके मुलाकात भी हो सकती है और एक-दूसरे से मिलकर आगे की ज़िंदगी का फ़ैसला भी......
अनु ख़ामोशी से सुन रही थी बेटी की बात। गलत कुछ नहीं है मगर अभी भारतीय समाज की सोच इतनी विस्तृत नहीं हुई है कि इस तरह के निर्णय समाज स्वीकार कर सके।
तमाशा बनकर रह जायेगा यह रिश्ता। रहना तो आखिर समाज के बीच ही है।
"क्या सोचने लगीं माँ ?"
"और क्या.... बहुत बड़ी मुश्किल में डाल दिया है शुभ्रा तूने। न जाने कितने पत्र होंगे अब उस बॉक्स में और कितने रिश्तों को मैं समझूँगी.....।"
माँ.... मेरी प्यारी माँ.... समझो बात को। कब तक आप अकेले रहकर गुजारोगी ज़िंदगी। कोई साथी होगा तो आराम से कट जायेगा सफ़र। माँ यही उम्र होती है जब किसी का साथ, सबसे ज्यादा जरूरी लगता है।
अनु की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है। बस उस नम्बर 5912 में ढेर सारे रिश्तों का शोर सुना रहा है। अनगिनत आवाजें पुकार रही हैं उसका नाम और वो उनके बीच घिर गई है।
पता नहीं बेटी व दामाद की सोच कितनी सही कितनी गलत है मगर अब देखना तो होगा उस पोस्ट बॉक्स को। यह नई पीढ़ी भी.......
कुछ देर सोचते रहने के बाद अनु ने कंघा फिराया बालों में और दरवाज़ा बंद कर चल दी पोस्ट आफिस देखने उस बॉक्स को जो बेटी दे गई है जाने क्या सोचकर।
©मुकेश दुबे , सीहोर, मप्र
-----------------------------परिचय
मुकेश दुबे साहित्यकारइनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। नियमित और समसामयिक कहानी लेखन में सिद्धहस्त हैं। आप सीहोर के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल मे व्याख्याता पद पर अपनी सेवा दे रहे हैं।
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समीक्षा
पोस्ट बॉक्स नं 5912..... है तो यह कहानी... जो लिखी है मुकेश दुबे जी ने....। प्रथम दृष्टया कहानी... बीते हुए समय का एक दस्तावेज है.. जो शादी डॉट कॉम या इस प्रकार की अन्य ऑन लाइन संस्थाओं से इतर रिश्तों को खोजने का एक जरिया रहा है... अभी भी प्रचलन में है... लेकिन इंटरनेट की दुनियाँ में खोई युवा पीढी के लिए एक जिज्ञासा भी हो सकती है.... कि क्या जीवन साथी की खोज इस ढंग से भी होती है....। खैर मूल विषय कहानी पर लौटें तो.... बिटिया शुभ्रा... विवाह के बाद अपनी ससुराल चली जाती है... माँ अनु अकेली रह जाती है.... जब वह मायके आती है.... तो माँ का अकेलापन उसको खटकता है... और वह अखबार के मार्फत अपनी माँ के जीवन साथी की खोज के लिए विज्ञापन देती है...। माँ बेटी के लिए रिश्ता खोजे... यह चलन है... लेकिन बेटी माँ के लिए रिश्ता खोजे... यह अपवाद है...। कहानी का ताना बाना इसी बिंदु पर बुना गया है...। माँ का बेटी के भविष्य की चिंता करना... ठीक झरने से पानी का नीचे की तरफ गिरना है... लेकिन जब बेटी माँ के भविष्य को लेकर चिंता करे.... पानी का नीचे से ऊपर के तरफ जाना है.... इसमें ताकत लगती है....मोटर पंप से पानी चढ़ाने जैसी....। उसी ताकत का प्रदर्शन होता है कहानी में....। इसका अप्रत्यक्ष कथ्य यह है कि.... माता पिता का संतान से प्रेम झरने के पानी जैसा होता है... जो प्राकृतिक है... लेकिन संतान भी माँ बाप से उतना ही टूट कर प्रेम करे.... यह काफी मुश्किल है... खास कर उस दौर में.. जिसमें हम सांस ले रहे हैं....। आजकल अपना कैरियर बनाने के लिए युवा माता पिता का सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं....। एकाकी परिवार के चलन ने... माँ बाप को भी एकाकी जीवन जीने को मजबूर कर दिया है....। उसी चिंता को ये कहानी अनकहे रूप से कह जाती है...। आज के समाज की समस्या को... एक कहानी के माध्यम से समाज के सामने न केवल प्रस्तुत किया है... वरन अपने स्तर से उसका समाधान भी दिया है...। समस्या मूलक कथ्य कहना आसान होता है... अगर उसका समाधान भी दिया जाए.... तो यह लेखनी की विस्तृत सोच को व्यक्त करता है....। एक बेहतरीन कथानक के लिए..... बहुत बहुत साधुवाद मुकेश भाई......।
शैलेश तिवारी, संपादक


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